शनिवार, 16 अगस्त 2014

क्या ऐसा रेल बजट कभी सुना है?

अच्छे दिन रहे हों या बुरे दिन। किसी भी पार्टी की सरकार रही हो। लेकिन क्या किसी को भी याद है कि ऐसा रेल बजट कभी पेश हुआ हो? संभवत: हर स्वतंत्र सोच वाले व्यक्ति का एक ही जबाव होगा- नहीं। लोकसभा में तो हमारे चुने गए माननीय बैठकर लाइव देख रहे थे और ताली ठोंक रहे थे, लेकिन बाकी लोगों ने टीवी और पेपर के माध्यम से बजट को पूरा समझा और पढ़ा। खूब मंथन किया। लेकिन एक बात बजट के कई दिनों बाद तक समझ नहीं आया कि रेल बजट में किसको क्या मिला? हम मान लें कि हमारे देश में जनरल टिकिट पर यात्रा करने वाले सबसे ज्यादा हैं तो उनका जरूर ध्यान रखा गया होगा? लेकिन जबाव एक ही है नहीं। चलिए गरीबों को छोडि़ए, बिजनेसमैन के लिए तो कुछ होगा ही, वो तो किराया भी खूब चुकाते हैं और टैक्स भी देते हैं। लेकिन यहां भी एक ही जबाव है नहीं। हो सकता है ट्रेनों में वेटिंग मैनेज करने के लिए कोई योजना आई हो, लेकिन यहां भी सरकार फिसड्डी।
अब आगे बढ़ते हैं और देखते हैं कि स्टेशन पर शायद सुविधाओं में तो कुछ इजाफा हुआ होगा तो फिर भी जबाव आता है- नहीं। तो फिर इस बजट में बुलेट ट्रेन के सपने के अलावा क्या है? हमने केवल कुछ प्रदेशों के मुखियाओं से दोस्ती निभाते हुए कुछ एक ट्रेनों की घोषणा तो मध्यप्रदेश जैसे प्रदेश से दुश्मनी निभाते हुए ठेंगा दिखाया है। माना कि मध्यप्रदेश में शिवराज सिंह से मोदी जी की नहीं बनती, सुषमा स्वराज भी मोदी को खटकती हैं तो इसका मतलब मध्यप्रदेश को ट्रेन नहीं दी तो ठीक, इज्जत रखने के लिए कुछ घोषणाओं का झुंनझुना ही दे देते।
मतलब साफ है कि हम स्टेशन पर यात्री को साफ पीने का पानी भी नहीं दे पाए। जनरल के यात्रियों को जानवरों की तरह यात्रा करने की मजबूरी अभी भी रहेगी। जिस मॉडल स्टेशन अहमदाबाद की बात करते हैं, उस स्टेशन पर नलों में खारा पानी आता है। गर्मियों में नलों से उबलते पानी के समान गर्म पानी निकलता है। तो फिर हम किस विकास और बदलाव की बात सोचें। पैसेंजर ट्रेन में बैठने के बाद यात्रा पूरी होने की कोई गारंटी नहीं होती है। ट्रेन दुर्घटना के बाद जनरल यात्रियों को मुआवजा न देना पड़े, इसके लिए मृतकों की जेबों से टिकट निकाल लिया जाता है।
विश्व में मंदी का दौर है। विश्व के लगभग सभी देश मंदी से जूझ रहे हैं। लेकिन हिंदुस्तान न तो अमरिका की तरह हर बेरोजगार को 30 हजार रुपए महीना भत्ता देता है और न ही आंख बंद करके होम लोन देता है। अमरीका भले ही थोक में हजारों लोगों को नौकरी से निकाल देता हो, लेकिन हमारे देश में ऐसे हालात न कभी बने हैं और न ही बनने की संभावना दिखती है। ऐसे में हिंदुस्तान के हालात बेहतर कहे जा सकते हैं। खैर, फिलहाल हम रेल मंत्रालय की बात करें तो यह कमाने का जरिया नहीं है, बल्कि लोगों को आम सुविधा मुहैया कराने वाला स्वास्थ्य, सड़क, बिजली, पानी की तरह का एक विभाग है। इसमें न तो पहले कभी फायदे का गणित देखा गया और न ही अब देखा जाना चाहिए। फिर रेल मंत्रालय कंगाल या लखपति कहे जाने का सवाल ही नहीं उठता है। ऐसे में रेलमंत्री के बयान पर तरस ही आता है कि रेल मंत्रालय के पास पैसा नहीं है। ठीक है अगर रेल मंत्रालय के पास पैसा नहीं है तो फिर हमने बढ़ा-चढ़ाकर घोषणाएं कैसे कर दीं? हम पहले से चल रही टे्रनों को समय पर चला नहीं पा रहे हैं और बात करते हैं बुलेट ट्रेन की। हमारे पास अंग्रेजों के जमाने के रेल पुल हैं और कई ट्रेक इतने पुराने हो गए हैं कि टे्रेन रेंगने को मजबूर हो जाती हैं। कई क्षेत्रों में रेल लाइन नहीं हैं और कई क्षेत्र ऐसे भी हैं जहां सिंगल लाइन से काम चला रहे हैं। ऐसे में हम बात करते हैं बुलेट ट्रेन की। ये सही है कि देश में विकास के लिए बुलेट ट्रेन चाहिए, लेकिन बुलेट ट्रेन के लिए ट्रेक कहां से आएगा। जाहिर है न तो ट्रेक होगा और न ही बुलेट टे्रन चलेगी। माना कि कभी विदेशी निवेश से बुलेट ट्रेन चलाने में सफल भी हो गए तो इसमें यात्रा कौन कर पाएगा? पूंजीपति या आम आदमी? वो आम लोग तो कतई यात्रा नहीं कर सकेंगे जो बमुश्किल जनरल का टिकिट खरीद पाते हैं।  जाहिर है केवल पूंजीपति और वो जनप्रतिनिधि जो सरकार के खर्चे पर यात्रा करते हैं। यानि आम आदमी के लिए कुछ भी नहीं। किराया तो हम पहले ही 14 फीसदी से ज्यादा बढ़ा चुके हैं, लेकिन स्टेशनों पर पीने के पानी की सुविधा भी नहीं दे सके।

अहमदाबाद कैसा मॉडल
बड़े जोर-शोर से कहा जा रहा है कि अहमदाबाद की तरह स्टेशनों पर सुविधाएं बढ़ाई जाएंगीं। लेकिन जो लोग अहमदाबाद स्टेशन देखकर आए हैं वे बता सकते हैं कि स्टेशन के पानी को पचाना हर किसी के बस की बात नहीं है। इस स्टेशन के नलों से पीने का पानी खारा निकलता है। साफ-सफाई से लेकर किसी भी क्षेत्र की बात की जाए तो आम स्टेशनों की तरह ही है। ऐसे मॉडल से विकास की बात करें तो फिर तो हो गया विकास।
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ऐसी कैसी दुश्मनी
कहते हैं कि राजनीति में स्थायी दोस्त और दुश्मन नहीं होते। अब आडवाणी, सुषमा को ही ले लो। मजबूरन मोदी का नेतृत्व स्वीकारना ही पड़ा। लेकिन मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री की लोकप्रियता मोदी को गले नहीं उतर रही है। ऐसे में विदिशा सांसद सुषमा स्वराज भी मध्यप्रदेश से चुनकर आईं हैं, तो दुश्मनी पक्की वाली हो गई। यही कारण है कि रेल बजट में मध्यप्रदेश को पूरी तरह दरकिनार किया गया। इतने बुरे हालात तो यूपीए शासनकाल में भी नहीं रहे। दरअसल मोदी ने गुजरात में रिपीट होने के बाद पीएम पद का सपना देखा तो शिवराज ने ही देखा। ऐसे में संघ के समर्थन के कारण भले ही मोदी बाजी मार ले गए हों, लेकिन शिवराज से बदला लेने के लिए मध्यप्रदेश से पक्षपात की बात कुछ अजीब है। जनता की बात की जाए तो 29 में से 27 सीटें भाजपा की झोली में गईं। कम से कम जनता के वोटों का ध्यान तो रखना ही था, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

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