शनिवार, 16 अगस्त 2014

क्षत्रपों का किला ममता शक्ति के सामने विध्वंश

 15 अगस्त विशेष

दिग्गी के अभेद किले को एक वार में किया नेस्तानाबूद
क्षत्रपों को खूब लड़ी मर्दानी की तर्ज पर चटाई धूल
राजगढ़ लोकसभा में चाचौंड़ा विधायक ममता मीणा ने भारी जीत दर्ज करके बनाया इतिहास

भोपाल।
बेशक 15 अगस्त के दिन हम आजाद हुए थे, लेकिन 1947 से अब तक महिला सशक्तिकरण के प्रयास किए जा रहे हैं। महिलाओं को अब तक कमजोर माना जाता है तो ऐसे में कुछ ऐसी महिलाएं भी रहीं हैं, जो केवल अपनी शक्ति और सामर्थ के कारण पहचान बना चुकीं हैं। इसी लिए आजादी की इस बेला पर हम ऐसी ही महिला की बात करेंगे, जिनने सही मायनों में रजबाड़ों के शासन का अंत कर दिया और तमाम कयासों को दरकिनार करते हुए जनता का राज कायम किया।
जहां छोटे राजा और बड़े राजा की तूती बोलती हो। विरोधी उम्मीदवार में इन क्षत्रपों का डर सिर चढ़कर बोलता हो। यहां तक कि विरोधी उम्मीदवारों को हाथ पकड़कर पोलिंग बूथ से बाहर निकाल देते हों। जब पूरे प्रदेश में उमा भारती की लहर चल रही थी, तब भी इस विधानसभा में भगवा नहीं लहरा सका था। जीहां, हम उस विधानसभा की बात कर रहे हैं जहां से कांग्रेज अजेय रही है। इसकी विधानसभा की सीमा पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के गृह नगर राघौगढ़ से सटी है। इस विधानसभा के बारे में कहा जाता था कि राजा अपने किसी भी कारिंदे को खड़ा कर दें, जीत निश्चित होती थी। ऐसी तमाम कहानियां चौपालों पर रोज सुनने मिलती थीं। लेकिन किसी ने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि एक महिला झांसी की रानी की तर्ज पर चुनावी रण में शौर्य दिखाते हुए क्षत्रपों के गढ़ को पूरी तरह विध्वंस कर देगी। उस महिला का नाम है श्रीमती ममता रघुवीर सिंह मीणा। एक किसान की बेटी ने तमाम कयासों को दरकिनार करते हुए ऐतिहासिक मतो से इस विधानसभा से जीत हासिल की। जहां से मुख्यमंत्री रहते दिग्विजय सिंह लगभग 20 हजार मतों से जीत सके थे, उस विधानसभा से इस किसान की बेटी ने 34901 मतों से विरोधी को शिकस्त दी। संभवत: कई दशकों में इतने भारी मतो से जीतने वाली ये इकलौती उम्मीदवार थीं। यहां बता दें कि यहां पहले बेशक जातीय समीकरण हावी रहते हों, लेकिन इस चुनाव में जातीय समीकरण की कोई जगह नहीं थी। क्योंकि कांग्रेस से जो उम्मीदवार थे वो कांग्रेस के कद्दावर विधायक शिवनारायण मीणा थे। अपने विरोधी से लगभग दोगुने मत प्राप्त करने वाली ममता मीणा ने हर मोर्चे पर कांग्रेस को शिकस्त दी।

-कभी महिला को नहीं मिली कमान
कांग्रेस हो या भाजपा। कभी भी किसी पार्टी ने महिला को कमान सौंपने की हिम्मत नहीं दिखाई थी। 2008 के चुनाव में पहली बार भाजपा ने ममता मीणा को टिकट दिया। यहां बता दें कि भाजपा ने भी न तो उनका राजतिलक किया था और न ही उनके पुरखों की राजनीतिक विरासत का उत्तराधिकारी बनाया था। बल्कि जिला पंचायत चुनाव में निर्दलीय अध्यक्ष बनने की कुव्वत को देखते हुए ममता मीणा को टिकिट दिया था। ममता मीणा के पहले चाचौंड़ा विधानसभा सीट पर भाजपा उम्मीदवार की हालत खासी खराब रहती थी। उम्मीदवार न तो धन बल से टिक पाता था और न ही बाहूबल से। वहीं किले की राजनीति के कारण पहले से ही उम्मीदवार की हालत खस्ता होती थी। ये सच है कि घर के विरोधियों की चालें सही से न समझने के कारण इन्हें मामूली अंतर से 2008 में परायज मिली थी, लेकिन शिकस्त के बाद एक खूंखार घायल योद्धा की तरह इनने 2013 में वापसी की। इनके शौर्य के आगे न तो भिरतघाती टिक सके और न ही विरोधी।

-लक्ष्मीबाई के बाद फिर मिली महिला से मात
इतिहास गवाह है कि लक्ष्मीबाई से ग्वालियर महाराजा को युद्ध में घूल चटा दी थी। उस समय अंग्रेजों के सहारे से भले ही उन्हें ग्वालियर का शासन मिला हो, लेकिन एक महिला की शक्ति के कारण उन्हें भागना पड़ा था। उसी इतिहास को ममता मीणा ने दोहराया था जिला पंचायत चुनाव के समय। जिला पंचायत अध्यक्ष बनने में भी इनने राजा-महाराजा के तमाम समीकरण फेल कर दिए थे। कांग्रेस के जिला पंचायत सदस्यों की संख्या अध्यक्ष बनने के लिए पर्याप्त थी। इन सदस्यों में कुछ राजा केे समर्थक थे तो कुछ ग्वालियर महाराजा के। लेकिन राजा-महाराजा की रस्साकस्सी में अपने राजनीतिक कौशल और नेतृत्व क्षमता दिखाते हुए इस किसान की बेटी ने अध्यक्ष पद पर कब्जा जमाया और सफलता पूर्वक 5 साल तक किसानों की तकलीफ को दूर किया।

-शुरूआत से ही तीखे तेवर
जहां ममता मीणा के सामने राजनीति के चाणक्य और गुरू कहे जाने वाले राजनीतिज्ञ थे तो ममता मीणा ने राजनीति में कदम रखा था। न तो अनुभव और न ही उम्र। लेकिन धुरंधर को हमेशा मुंह की खानी पड़ी। कारण राजनीति की चालों की भले ही पूरी समझ न हो, लेकिन महिला के अंदर जो दूसरे के दुखों को दूर करने की क्षमता होती है वो शुरू से ही थी। उन्हें राजनीति नहीं करना थी, लोगों को क्षत्रपों के आतंक और पक्षपात से मुक्त करवाना था। न किसी का डर था और न मन में पद का लालच। ये अलग बात है कि बिना शक्ति के तो ईश्वर भी रक्षा नहीं कर सकते। तभी जिला पंचायत के बाद विधानसभा में तमाम पासें पलट दिए।
(श्री प्रमोद त्रिवेदी के ब्लॉग भूतझोलकिया से साभार)

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