शनिवार, 16 अगस्त 2014

व्यापमं घोटाला या शिवराज घोटाला या भाजपा घोटाला

पाइंटर:

अगर युवा भविष्य हैं तो मध्यप्रदेश का भविष्य हो गया बर्बाद
व्यापमं घोटाला- दो दशक पहले अंकुरित बीज एक दशक में वट वृक्ष बन गया
पीएमटी हो या सरकारी नौकरियां, लाखों होनहार युवाओं का भविष्य बर्बाद
बोफोर्स, टूजी, कोयला से भी बड़ा शिवराज (व्यापमं) घोटाला
युवा पुकार रहे- अन्ना अब तुम कहां हो, अब हमें भी विकल्प बता दो
इस घोटाले में भविष्य बर्बादी का आंकलन संभव नहीं है

इंट्रो:

किसान की 4 महीने की मेहनत की फसल देखकर हमारे सीएम रोने लगते हैं। उन्हें गले लगाते हैं।  मुआवजा देते हैं। लेकिन उनकी सरकार के व्यापमं घोटाले में लाखों छात्रों का पूरा जीवन बर्बाद हो गया। यहां फसल नहीं पूरा खेत ही तबाह हो गया। लेकिन न तो मुखिया की आंख में आंसू हैं और न ही उन परीक्षार्थियों को गले लगाया गया जिन्हें कड़ी मेहनत के बाद भी डॉक्टर बनने के लिए दाखिला नहीं मिला या कई सालों की मेहनत के बाद बेरोजगार रह गए। खुद को बचाने के चक्कर में सरकार ये भी भूल गई कि एक बार इनके जीवन बर्बादी का कुछ आंकलन तो करना चाहिए था। इनकी पीर (पीड़ा) कम करने का कोई तो रास्ता निकालना था। देश के इतिहास में न तो व्यापमं जैसा लाखों युवाएं के भविष्य को बर्बाद करने वाला घोटाला हुआ है न ही ऐसी उम्मीद करनी चाहिए। 


भोपाल। पिछले कुछ सालों में केंद्र और राज्य में इतनी गड़बडिय़ां-घोटालों के खुलासे हुए कि लोगों ने ज्यादा ध्यान देना ही बंद कर दिया। राजीव सरकार के बोफोर्स कांड की गूंज आज भी सुनाई देती है।
अटल सरकार में जब तहलका डॉट कॉम ने रक्षा घोटाले का खुलासा किया था तो बड़ा हंगामा हुआ था। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष बंगारू लक्ष्मण ने जब केवल एक लाख रुपए की रिश्वत ही बड़े मान से स्वीकार की थी तब भी लोगों को आश्चर्य हुआ था। इसके बाद कांग्रेस शासनकाल के टूजी, कॉमनवेल्थ गेम्स और कैग की मनमानी का कोयला घोटाला(कैग की मनमानी इसलिए क्योंकि अगर कोयला खदानें चालू होती तो इतना नुकसान होता यानि नुकसान या घोटाला होने से बच गया)। घोटाला कोई भी हो, देश का नुकसान तो होता ही है, लेकिन घोटाले की प्रकृति बताती है कि उससे सीधे तौर पर किसको नुकसान होता है। इन घोटालों की दो खासियत थीं। पहली- इनकी राशि हजारों करोड़ में आंकी गई। दूसरी-इनका आम आदमी की जिंदगी से सीधा कोई संबंध नहीं था। यानि आजाद भारत के किसी भी घोटाले से सीधे तौर पर आम आदमी का भविष्य बर्बाद नहीं हो सकता था।
लेकिन हमारे देश का एक ऐसा प्रदेश है जहां घोटाले की न तो रकम आंकी जा सकती और न ही गंभीरता। सबसे बड़ी बात है बर्बादी। तो इस घोटाले में रुपयों की नहीं भविष्य की बर्बादी हुई है। वो भविष्य भी देश के नौजवानों का, युवाओं का। दुर्भाग्य ये है कि ये घोटाला ऐसे प्रदेश में हुआ जो देश का हृदय स्थल कहा जाता है। यानि अपना मध्यप्रदेश। व्यवसायिक परीक्षा मंडल और नेताओं की मिली भगत का घोटाला। इससे डॉक्टर बनने का सपना देखने वाले और मेहनत की दम पर परीक्षा की तैयारी कर नौकरी हासिल करने वाले युवाओं का जीवन तबाह हो गया। इसके जिम्मेदार हैं हमारे प्रदेश के खेवनहार, जिन्हें हम दो दशक से सत्ता की बागडोर सौंपते चले आ रहे हैं। वो कांग्रेस के भी हैं और भाजपा के भी। कुछ नेता-अधिकारी गिरफ्तार हो गए तो कुछ छात्रों के साथ उनके अभिभावकों को भी पकड़ लिया गया। लेकिन 2009 से घोटाले को दबाने की कोशिश करने वाले नेताओं की गिरेबान पर हाथ डालने की आज भी किसी में हिम्मत नहीं है।

शुरूआत तो 20 साल पुरानी है
व्यापमं घोटाला भले ही 5 साल पहले से उजागर होना शुरू हुआ हो, लेकिन इसकी नींव तो करीबन दो दशक पहले कांग्रेस शासनकाल में रखी जा चुकी थी। ये बात अलग है कि उस समय इतनी सावधानी रखी जाती थी कि पकड़े न जाएं। दूसरी बात बड़ी रकम ली जाती थी लेकिन केवल रसूखदार अफसरों के माध्यम से। डेंटिस्ट डॉ. अनुराग साहू बताते हैं कि ऐसे छात्र पीएमटी में पास हो जाते थे तो 12 वीं में बमुश्किल पास हो सके हों। हमें बड़ा आश्चर्य होता था। हमारे जैसे सैंकड़ों छात्र कड़ी मेहनत के बाद भी पीएमटी में कम नंबर के कारण डेंटिस्ट या पशु चिकित्सक बने। जाहिर है कांग्रेस हर बात में कोर्ट जाती है लेकिन व्यापमं घोटाले में सीबीआई जांच के लिए कोर्ट नहीं गई। दिग्गी ने हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीस को पत्र तो लिखा, लेकिन एक साल बाद भी व्यापमं घोटाले की सीबीआई जांच के लिए कोई पत्र या याचिका नहीं लगा रहे हैं। ऐसा क्यों? परते जब उधड़ती हैं तो कई राज खुद व खुद बाहर आ जाते हैं। ये भी हो सकता है कि कई लोग 10 साल की नौकरी के बाद पकड़े जाएं। नीयत साफ किसी की भी नहीं है, इसीलिए आरोप केवल बयानों तक सीमित हैं।

एक कसम पहले भी खाई थी
मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को पूर्व राज्यसभा सांसद रघुनंदन शर्मा ने घोषणावीर कहा था। श्री चौहान का कसमे-वादों का इतिहास भी पुराना है। उन्होंने नर्मदा जल में कमर-कमर तक पानी में खड़े रहकर कसम खाई थी कि आजीवन कुंवारे रहकर प्रदेश की जनता की सेवा करेंगे। खैर नर्मदा का पानी बह गया तो कसम भी बह गई। लेकिन अभी  विधानसभा में भी एक कसम खा गए। अगर व्यापमं घोटाले में उनका या उनके परिवार का कोई भी सदस्य दोषी होगा तो वो सन्यास ले लेंगे। उनके मंत्री मण्डल परिवार का तो नहीं कहा होगा, वरना सन्यास हो गया होता। लेकिन जब हर बात में दागी होने का सबूत मांगते हैं तो अपनी ईमानदारी का भी सबूत दें। सीधे 20 साल की सीबीआई जांच और जांच एजेंसी को हर तरह से मदद। फिर पता चलेगा कि सन्यास का क्या हश्र होगा?

आखिर मिश्रा ने क्यों नहीं बचाया
डम्पर घोटाले को उजागर करने में जनसम्पर्क विभाग के एक अधिकारी की महती भूमिका थी। वो अधिकारी उस समय पूर्व उपमुख्यमंत्री दिवंगत श्रीमती जमुना देवी के स्टाफ में था। बाद में लक्ष्मीकांत शर्मा ने खनिज के मामले में उलझने पर इस अधिकारी को अपने स्टॉफ में पदस्थ किया। उस समय जमना देवी ने इस कर्मचारी के लिए रूठ कर सरकार को गाड़ी और स्टॉफ वापिस कर दिया था। इस अधिकारी ने अपने मीडिया में पाले गए गुर्गों के जरिए पहले खनिज मामले में छपने वाली खबरों के
मामले में राजीनामा करवाया और फिर इस अहसान का अहसास दिलाकर खूब दोहन किया। इस अधिकारी के बारे में बता दें कि ये बाबू से भर्ती हुआ और आईएएस अवार्ड के लिए इसका नाम राज्य सरकार ने भेजा था। ये अलग बात है कि मामला अभी पेंडिंग में है। व्यापमं घोटाले में जो खास बात उभरकर आ रही है वो है कि इस अधिकारी को लक्ष्मीकांत शर्मा के स्टाफ में शामिल होने के बाद भी इस घोटाले की भनक कैसे नहीं लगी? अगर भनक लगी भी तो फिर इस बार मंत्री की मदद क्यों नहीं कर पाया? और अगर मदद कर भी दी तो खुद का दामन कैसे बचाया? लक्ष्मीकांत शर्मा से जुड़े सूत्र बताते हैं कि इस अधिकारी ने अपना पाला बहुत पहले बदल लिया था।

युवा भविष्य का क्या हो सकता है मुआवजा?
सरकार के नुमाइंदों ने जो भी किया हो, लेकिन युवाओं के भविष्य बर्बादी पर पुख्ता कदम उठाने की आवश्यकता है। जब किसी दुर्घटना पर मुआवजा दिया जाता है तो भविष्य बर्बादी पर क्यों नहीं? ये सही है कि व्यापमं घोटाले की भरपाई कभी भी संभव नहीं होगी, लेकिन उस समय परीक्षा में बैठे और घोटालेबाजों के कारण पिछडऩे वाले युवाओं को नौकरी देने जैसा कदम उठाया जा सकता है। लेकिन ये उस समय हो पाएगा, जब सीएम खुद को बचाने में ताकत न लगाकर युवाओं के भविष्य पर फोकस करें।


युवा चाहते हैं इन सवालों का जबाव

पहला सवाल- यह सही है कि केंद्र के टूजी, कॉमनवेल्थ, कोयला घोटाले के लिए कांग्रेस सरकार, प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और कांग्रेस की राष्ट्रीय अध्यक्ष सोनिया गांधी जिम्मेदार थीं तो व्यापमं घोटाले के लिए भाजपा, मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और पूर्व प्रदेश अध्यक्ष प्रभात झा, वर्तमान प्रदेश अध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर और सत्ता का कंट्रोलर संघ अपनी जिम्मेदारी से क्यों भाग रहे हैं। विपक्षी पार्टी कांग्रेस भी सही सवाल दागने में चुप क्यों?
दूसरा सवाल- अगर सत्ता के मुखिया को घोटाले में किसी बात का डर नहीं था तो 2009 में जानकारी होने के बाद किसी सक्षम एजेंसी को जांच क्यों नहीं सौंपी? फिर से उसी व्यापमं में 2012 में बड़े स्तर पर गड़बड़ी का इंतजाम किया गया और फिर इंतजार दुश्मनों को ठिकाने लगाने का। 2014 तक किस बात का इंतजार किया? 2013 में जब सरकार के वरिष्ठ मंत्रियों की संलिप्तता सामने आ गई तो सीधे सीबीआई जांच की मांग क्यों नहीं की गई। मतलब साफ था। पहले सबूत मिटाओ, फिर सीबीआई को जांच सौंपो। वहीं कांग्रेस के दिग्गी राजा तो हर बात पर सीबीआई जांच की पैरवी करते हैं तो शुरू से सीबीआई जांच के लिए
खुद की सरकार यानि केंद्र सरकार से अनुरोध क्यों नहीं किया? साफ बात है कि यहां शिवराज और दिग्विजय सिंह की अंदरूनी यारी थी।
तीसरा सवाल- अगर लक्ष्मीकांत शर्मा को दोषी माना गया था और केवल पीए के बयान और सूची भेजने से उन्हें गिरफ्तार किया गया तो पीए तो शिवराज सिंह चौहान का भी गिरफ्तार हुआ। फिर लक्ष्मीकांत दोषी तो सीएम कैसे निर्दोष?
चौथा सवाल- अगर लक्ष्मीकांत शुरू से दोषी थे तो उन्हें गिरफ्तार क्यों नहीं किया गया? कोर्ट से उनके संबंध में आदेश लेने की प्रक्रिया क्यों अपनाई गई?
पांचवा सवाल- पिछले 10 सालों में जिन युवाओं का भविष्य बर्बाद हुआ, उनके लिए सरकार के पास कोई भी योजना क्यों नहीं? जो योग्य होने के बाद भी पीएमटी में चुने नहीं जा सके या जो योग्य होने के बाद भी नौकरी नहीं पा सके, उनके भविष्य के मामले में भाजपा मौन क्यों?
छठवा सवाल-प्रदेश सरकार के अधीन जांच एजेंसी कैसे निष्पक्ष जांच कर सकती है? जब सीबीआई पर आरोप लग सकते हैं तो एसटीएफ के अधिकारियों को तो कम से कम 5 साल सरकार के साथ ही गुजारने हैं। ऐसे में निष्पक्ष जांच आयोग का गठन समय रहते क्यों नहीं किया गया?

सबसे बड़ा और अहम सवाल- अगर मंत्रीमंडल का मुखिया सीएम तो अपने मंत्रियों के घोटाले का जिम्मेदार कौन? अगर शिवराज बहुत भावुक हैं और किसान की एक साल की फसल बर्बाद होने पर रो पड़ते हैं, प्रकृति की नाइंसाफी पर आंसू बहाते हैं और मुआवजा की घोषणा करते हैं तो फिर उनके मंत्रियों और अधिकारियों की करतूत से युवाओं के पूरे जीवन बर्बाद होने पर कोई मुआवजा क्यों नहीं? युवाओं के भविष्य को बर्बाद करके उनके मां-बाप को तीर्थ कराने से कौन सा पाप धुलेगा।

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