दादा का विकल्प कहां से मिलेगा?
*कांग्रेस-भाजपा के पास नहीं है संजय जगताप का विकल्प
नगर पालिका के चुनाव नजदीक हैं। ऐसे में कांग्रेस हो या भाजपा, जीतने वाले उम्मीदवारों पर चर्चा होना और उनमें जीतने की संभावनाएं तलाशना लाजमी है। हो सकता है कि समाचार प्रकाशित होने तक आरक्षण हो जाए और समीकरण बदल जाएं, लेकिन एक बात तो तय है। वो है कांग्रेस और भाजपा के लिए सबसे बड़ी चुनौती है दत्तु भैया का परिवार। इतिहास गवाह है चाहे दिग्विजय सिंह का प्रभाव रहा हो या भगवा गढ़, दत्तु भैया परिवार के सामने हमेशा चारों खाने चित्त हुआ है। कुछ दशकों पहले दत्तु भैया ने ताल ठोंककर निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर विजय हासिल की थी तो पिछले चुनाव में उनकी बहू श्रीमती सुनंदा संजय जगताप ने कांग्रेस-भाजपा के तमाम समीकरण उलट कर रख दिए थे। ऐसे में प्रदेश में सत्ताधारी भाजपा के पास अपनी साख बचाने का एक ही विकल्प है संजय जगताप यानि दादा की ससम्मान घर वापसी। ऐसा नहीं है कि भाजपा के पास उम्मीदवारों को टोटा हो, लेकिन दादा के सामने नगर पालिका चुनाव जीतने की ताकत किसी भी उम्मीदवार या मोदी-शिवराज फैक्टर में नहीं दिखती। इसका कारण ऐसा नहीं है कि दत्तु भैया का परिवार किसी राज घराने से संबंध रखता हो या किसी दूसरी दुनिया से आया हो। इसका कारण है राजनीतिक ईमानदारी और नेतृत्व की अपार क्षमता। नेतृत्व से तात्पर्य केवल अपने दल के लोगों से नहीं वरन् आम आदमी को साथ लेकर चलने से है। यही कारण है कि नगरपालिका के 18 वार्डों में भले ही 8 पार्षद कांग्रेस के हों, लेकिन क्षेत्र के विकास में दादा ने कभी बदले की भावना से काम नहीं किया। इतना ही नहीं एक परिवार के मुखिया की तरह राजनीतिक विरोधियों की गलतियों को भी दादा ने हमेशा नजरअंदाज किया। यही कारण है कि प्रदेश सहित राजगढ़-ब्यावरा में भी भगवा फहरा रहा है लेकिन ब्यावरा नगरपालिका अध्यक्ष की कुर्सी केे लिए राजधानी में बैठे शीर्ष नेतृत्व के पास भी विकल्प नजर नहीं आ रहा है।
-भाजपा के पास विकल्प
भाजपा और दत्तु भैया के परिवार का पुराना नाता है। दत्तु भैया के खून में भाजपा और भगवा बसते हैं। ये अलग बात है कि राजनीतिक भेदभाव के कारण इन्होंने पार्टी छोड़ी, लेकिन ये भी सच है कि एक बुलावे पर इनकी घर वापिसी भी हुई। ऐसे में अगर व्यक्तिगत रंजिश को भुला दिया जाए तो भाजपा के पास संजय जगताप से बेहतर विकल्प नहीं है। सबसे बड़ी बात भाजपा के नेता इनसे भितरघात करेंगे तो भी नुकसान नहीं पहुंचा पाएंगें। लेकिन भाजपा और दादा के बीच सेतू का काम कौन करेगा? संगठन के पदाधिकारी और आरएसएस के लोग अगर ईमानदारी से चाहेंगे तो दादा की घर वापिसी संभव है।
कांग्रेस क्या कर सकती है?
अगर ब्यावरा नगरपालिका की बात की जा रही है तो स्वाभिक तौर पर कांग्रेस उम्मीदवार की बात भी करना उचित होगा। राजा का गढ़ टूट चुका है। कांग्रेस की स्थिति बेहतर भी नहीं कही जा सकती। लेकिन फिर भी कुछ उम्मीदवार ऐसे हैं जिनका पुराना रिकार्ड बेहतर रहा है। इसमें पूर्व अध्यक्ष दिलीप शिवहरे ही ऐसे उम्मीदवार हैं जो बहुत कम मतों से पराजित हुए। हलांकि कांग्रेसी खेमे की गुटबाजी उन्हें चित्त करती रही है। दिलीप शिवहरे कहते हैं कि व्यक्तिगत तौर पर संजय दादा मेरे बहुत अच्छे मित्र हैं। राजनीतिक तौर पर अगर चुनाव में मौका मिलता है तो कड़ा लेकर स्वच्छ मुकाबला होगा। किसी भी उम्मीदवार से व्यक्तिगत रंजिश नहीं होती। चुनावी मैदान के बाद सभी पारिवारिक सदस्य होते हैं।
कमजोरी भी है दादा में
ऐसा नहीं है कि दादा में कोई कमजोरी नहीं है। लेकिन उनका बड़प्पन तमाम कमजोरियों पर भारी पड़ता है। दादा की सबसे बड़ी कमजोरी है राजनीतिक विरोधियों को भी पनपने देना। पिछले पांच सालों का इतिहास उठाकर देखें तो दादा ने 18 पार्षदों को बराबर आगे बढऩे का मौका दिया। दादा से पहले अध्यक्ष की अनुमति के बिना नगर पालिका में पत्ता नहीं हिलता था लेकिन दादा के समय पार्षदों को अपने वार्ड की समस्या के लिए दादा की तरफ से फ्री हैंड रहा। ये पार्षद सक्षम होने के बाद अध्यक्ष पद की दावेदारी भी कर सकते हैं। दूसरी कमजोरी है लाव लश्कर तैयार नहीं करना। दादा के पास अपार जनसमर्थन भले ही हो, लेकिन जब वो भाजपा में थे तब भी उनके पास भाजपा संगठन के पदाधिकारियों का बड़ा खेमा नहीं था। खेमेबाजी में माहिर न होने के कारण पार्टी उन्हें नजरअंदाज करती रही और उन्हें मजबूरन निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव मैदान में कूदना पड़ा।
ताकत भी कम नहीं
कमजोरी के बाद दादा की ताकत की बात करें तो वो है आम जनता से सीधा संवाद। हाईप्रोफाइल छवि को छोड़कर हमेशा एक ही तरह से रहना। दूसरी बात है विरोधियों का भी विरोध नहीं करना। इसका उदाहरण हैं कांग्रेसी पार्षद। तमाम कांग्रेसी पार्षद खुलकर कहते हैं कि अध्यक्ष पद के लिए दादा से अच्छा उम्मीदवार नहीं है। और अगर सीट सामान्य रही तो फिर से दादा ही अध्यक्ष बनेंगे। तीसरी ताकत है ईमानदारी। नगर पालिका को काजल की कोठरी कहा जाता है। इनके पहले के तमाम अध्यक्ष बेशक ईमानदार रहे होंगे, लेकिन उनकी पार्टी के लोगों ने ही कठघरे में खड़ा किया। लेकिन पिछले पांच सालों में एक बार भी दादा पर किसी तरह का आरोप नहीं लगा। चौथी बात है दलगत राजनीति से ऊपर उठकर कार्य करना। बेशक दादा निर्दलीय अध्यक्ष थे लेकिन उनकी पृष्ठभूमि भगवा है। ऐसे में उन्हें भाजपा-कांग्रेस में भेदभाव करना चाहिए था। पूर्व अध्यक्षों ने तो भेदभाव खुलकर किया था। लेकिन दादा के समय में ऐसा नहीं हुआ।
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