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शनिवार, 16 अगस्त 2014

व्यापमं घोटाला या शिवराज घोटाला या भाजपा घोटाला

पाइंटर:

अगर युवा भविष्य हैं तो मध्यप्रदेश का भविष्य हो गया बर्बाद
व्यापमं घोटाला- दो दशक पहले अंकुरित बीज एक दशक में वट वृक्ष बन गया
पीएमटी हो या सरकारी नौकरियां, लाखों होनहार युवाओं का भविष्य बर्बाद
बोफोर्स, टूजी, कोयला से भी बड़ा शिवराज (व्यापमं) घोटाला
युवा पुकार रहे- अन्ना अब तुम कहां हो, अब हमें भी विकल्प बता दो
इस घोटाले में भविष्य बर्बादी का आंकलन संभव नहीं है

इंट्रो:

किसान की 4 महीने की मेहनत की फसल देखकर हमारे सीएम रोने लगते हैं। उन्हें गले लगाते हैं।  मुआवजा देते हैं। लेकिन उनकी सरकार के व्यापमं घोटाले में लाखों छात्रों का पूरा जीवन बर्बाद हो गया। यहां फसल नहीं पूरा खेत ही तबाह हो गया। लेकिन न तो मुखिया की आंख में आंसू हैं और न ही उन परीक्षार्थियों को गले लगाया गया जिन्हें कड़ी मेहनत के बाद भी डॉक्टर बनने के लिए दाखिला नहीं मिला या कई सालों की मेहनत के बाद बेरोजगार रह गए। खुद को बचाने के चक्कर में सरकार ये भी भूल गई कि एक बार इनके जीवन बर्बादी का कुछ आंकलन तो करना चाहिए था। इनकी पीर (पीड़ा) कम करने का कोई तो रास्ता निकालना था। देश के इतिहास में न तो व्यापमं जैसा लाखों युवाएं के भविष्य को बर्बाद करने वाला घोटाला हुआ है न ही ऐसी उम्मीद करनी चाहिए। 


भोपाल। पिछले कुछ सालों में केंद्र और राज्य में इतनी गड़बडिय़ां-घोटालों के खुलासे हुए कि लोगों ने ज्यादा ध्यान देना ही बंद कर दिया। राजीव सरकार के बोफोर्स कांड की गूंज आज भी सुनाई देती है।
अटल सरकार में जब तहलका डॉट कॉम ने रक्षा घोटाले का खुलासा किया था तो बड़ा हंगामा हुआ था। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष बंगारू लक्ष्मण ने जब केवल एक लाख रुपए की रिश्वत ही बड़े मान से स्वीकार की थी तब भी लोगों को आश्चर्य हुआ था। इसके बाद कांग्रेस शासनकाल के टूजी, कॉमनवेल्थ गेम्स और कैग की मनमानी का कोयला घोटाला(कैग की मनमानी इसलिए क्योंकि अगर कोयला खदानें चालू होती तो इतना नुकसान होता यानि नुकसान या घोटाला होने से बच गया)। घोटाला कोई भी हो, देश का नुकसान तो होता ही है, लेकिन घोटाले की प्रकृति बताती है कि उससे सीधे तौर पर किसको नुकसान होता है। इन घोटालों की दो खासियत थीं। पहली- इनकी राशि हजारों करोड़ में आंकी गई। दूसरी-इनका आम आदमी की जिंदगी से सीधा कोई संबंध नहीं था। यानि आजाद भारत के किसी भी घोटाले से सीधे तौर पर आम आदमी का भविष्य बर्बाद नहीं हो सकता था।
लेकिन हमारे देश का एक ऐसा प्रदेश है जहां घोटाले की न तो रकम आंकी जा सकती और न ही गंभीरता। सबसे बड़ी बात है बर्बादी। तो इस घोटाले में रुपयों की नहीं भविष्य की बर्बादी हुई है। वो भविष्य भी देश के नौजवानों का, युवाओं का। दुर्भाग्य ये है कि ये घोटाला ऐसे प्रदेश में हुआ जो देश का हृदय स्थल कहा जाता है। यानि अपना मध्यप्रदेश। व्यवसायिक परीक्षा मंडल और नेताओं की मिली भगत का घोटाला। इससे डॉक्टर बनने का सपना देखने वाले और मेहनत की दम पर परीक्षा की तैयारी कर नौकरी हासिल करने वाले युवाओं का जीवन तबाह हो गया। इसके जिम्मेदार हैं हमारे प्रदेश के खेवनहार, जिन्हें हम दो दशक से सत्ता की बागडोर सौंपते चले आ रहे हैं। वो कांग्रेस के भी हैं और भाजपा के भी। कुछ नेता-अधिकारी गिरफ्तार हो गए तो कुछ छात्रों के साथ उनके अभिभावकों को भी पकड़ लिया गया। लेकिन 2009 से घोटाले को दबाने की कोशिश करने वाले नेताओं की गिरेबान पर हाथ डालने की आज भी किसी में हिम्मत नहीं है।

शुरूआत तो 20 साल पुरानी है
व्यापमं घोटाला भले ही 5 साल पहले से उजागर होना शुरू हुआ हो, लेकिन इसकी नींव तो करीबन दो दशक पहले कांग्रेस शासनकाल में रखी जा चुकी थी। ये बात अलग है कि उस समय इतनी सावधानी रखी जाती थी कि पकड़े न जाएं। दूसरी बात बड़ी रकम ली जाती थी लेकिन केवल रसूखदार अफसरों के माध्यम से। डेंटिस्ट डॉ. अनुराग साहू बताते हैं कि ऐसे छात्र पीएमटी में पास हो जाते थे तो 12 वीं में बमुश्किल पास हो सके हों। हमें बड़ा आश्चर्य होता था। हमारे जैसे सैंकड़ों छात्र कड़ी मेहनत के बाद भी पीएमटी में कम नंबर के कारण डेंटिस्ट या पशु चिकित्सक बने। जाहिर है कांग्रेस हर बात में कोर्ट जाती है लेकिन व्यापमं घोटाले में सीबीआई जांच के लिए कोर्ट नहीं गई। दिग्गी ने हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीस को पत्र तो लिखा, लेकिन एक साल बाद भी व्यापमं घोटाले की सीबीआई जांच के लिए कोई पत्र या याचिका नहीं लगा रहे हैं। ऐसा क्यों? परते जब उधड़ती हैं तो कई राज खुद व खुद बाहर आ जाते हैं। ये भी हो सकता है कि कई लोग 10 साल की नौकरी के बाद पकड़े जाएं। नीयत साफ किसी की भी नहीं है, इसीलिए आरोप केवल बयानों तक सीमित हैं।

एक कसम पहले भी खाई थी
मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को पूर्व राज्यसभा सांसद रघुनंदन शर्मा ने घोषणावीर कहा था। श्री चौहान का कसमे-वादों का इतिहास भी पुराना है। उन्होंने नर्मदा जल में कमर-कमर तक पानी में खड़े रहकर कसम खाई थी कि आजीवन कुंवारे रहकर प्रदेश की जनता की सेवा करेंगे। खैर नर्मदा का पानी बह गया तो कसम भी बह गई। लेकिन अभी  विधानसभा में भी एक कसम खा गए। अगर व्यापमं घोटाले में उनका या उनके परिवार का कोई भी सदस्य दोषी होगा तो वो सन्यास ले लेंगे। उनके मंत्री मण्डल परिवार का तो नहीं कहा होगा, वरना सन्यास हो गया होता। लेकिन जब हर बात में दागी होने का सबूत मांगते हैं तो अपनी ईमानदारी का भी सबूत दें। सीधे 20 साल की सीबीआई जांच और जांच एजेंसी को हर तरह से मदद। फिर पता चलेगा कि सन्यास का क्या हश्र होगा?

आखिर मिश्रा ने क्यों नहीं बचाया
डम्पर घोटाले को उजागर करने में जनसम्पर्क विभाग के एक अधिकारी की महती भूमिका थी। वो अधिकारी उस समय पूर्व उपमुख्यमंत्री दिवंगत श्रीमती जमुना देवी के स्टाफ में था। बाद में लक्ष्मीकांत शर्मा ने खनिज के मामले में उलझने पर इस अधिकारी को अपने स्टॉफ में पदस्थ किया। उस समय जमना देवी ने इस कर्मचारी के लिए रूठ कर सरकार को गाड़ी और स्टॉफ वापिस कर दिया था। इस अधिकारी ने अपने मीडिया में पाले गए गुर्गों के जरिए पहले खनिज मामले में छपने वाली खबरों के
मामले में राजीनामा करवाया और फिर इस अहसान का अहसास दिलाकर खूब दोहन किया। इस अधिकारी के बारे में बता दें कि ये बाबू से भर्ती हुआ और आईएएस अवार्ड के लिए इसका नाम राज्य सरकार ने भेजा था। ये अलग बात है कि मामला अभी पेंडिंग में है। व्यापमं घोटाले में जो खास बात उभरकर आ रही है वो है कि इस अधिकारी को लक्ष्मीकांत शर्मा के स्टाफ में शामिल होने के बाद भी इस घोटाले की भनक कैसे नहीं लगी? अगर भनक लगी भी तो फिर इस बार मंत्री की मदद क्यों नहीं कर पाया? और अगर मदद कर भी दी तो खुद का दामन कैसे बचाया? लक्ष्मीकांत शर्मा से जुड़े सूत्र बताते हैं कि इस अधिकारी ने अपना पाला बहुत पहले बदल लिया था।

युवा भविष्य का क्या हो सकता है मुआवजा?
सरकार के नुमाइंदों ने जो भी किया हो, लेकिन युवाओं के भविष्य बर्बादी पर पुख्ता कदम उठाने की आवश्यकता है। जब किसी दुर्घटना पर मुआवजा दिया जाता है तो भविष्य बर्बादी पर क्यों नहीं? ये सही है कि व्यापमं घोटाले की भरपाई कभी भी संभव नहीं होगी, लेकिन उस समय परीक्षा में बैठे और घोटालेबाजों के कारण पिछडऩे वाले युवाओं को नौकरी देने जैसा कदम उठाया जा सकता है। लेकिन ये उस समय हो पाएगा, जब सीएम खुद को बचाने में ताकत न लगाकर युवाओं के भविष्य पर फोकस करें।


युवा चाहते हैं इन सवालों का जबाव

पहला सवाल- यह सही है कि केंद्र के टूजी, कॉमनवेल्थ, कोयला घोटाले के लिए कांग्रेस सरकार, प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और कांग्रेस की राष्ट्रीय अध्यक्ष सोनिया गांधी जिम्मेदार थीं तो व्यापमं घोटाले के लिए भाजपा, मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और पूर्व प्रदेश अध्यक्ष प्रभात झा, वर्तमान प्रदेश अध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर और सत्ता का कंट्रोलर संघ अपनी जिम्मेदारी से क्यों भाग रहे हैं। विपक्षी पार्टी कांग्रेस भी सही सवाल दागने में चुप क्यों?
दूसरा सवाल- अगर सत्ता के मुखिया को घोटाले में किसी बात का डर नहीं था तो 2009 में जानकारी होने के बाद किसी सक्षम एजेंसी को जांच क्यों नहीं सौंपी? फिर से उसी व्यापमं में 2012 में बड़े स्तर पर गड़बड़ी का इंतजाम किया गया और फिर इंतजार दुश्मनों को ठिकाने लगाने का। 2014 तक किस बात का इंतजार किया? 2013 में जब सरकार के वरिष्ठ मंत्रियों की संलिप्तता सामने आ गई तो सीधे सीबीआई जांच की मांग क्यों नहीं की गई। मतलब साफ था। पहले सबूत मिटाओ, फिर सीबीआई को जांच सौंपो। वहीं कांग्रेस के दिग्गी राजा तो हर बात पर सीबीआई जांच की पैरवी करते हैं तो शुरू से सीबीआई जांच के लिए
खुद की सरकार यानि केंद्र सरकार से अनुरोध क्यों नहीं किया? साफ बात है कि यहां शिवराज और दिग्विजय सिंह की अंदरूनी यारी थी।
तीसरा सवाल- अगर लक्ष्मीकांत शर्मा को दोषी माना गया था और केवल पीए के बयान और सूची भेजने से उन्हें गिरफ्तार किया गया तो पीए तो शिवराज सिंह चौहान का भी गिरफ्तार हुआ। फिर लक्ष्मीकांत दोषी तो सीएम कैसे निर्दोष?
चौथा सवाल- अगर लक्ष्मीकांत शुरू से दोषी थे तो उन्हें गिरफ्तार क्यों नहीं किया गया? कोर्ट से उनके संबंध में आदेश लेने की प्रक्रिया क्यों अपनाई गई?
पांचवा सवाल- पिछले 10 सालों में जिन युवाओं का भविष्य बर्बाद हुआ, उनके लिए सरकार के पास कोई भी योजना क्यों नहीं? जो योग्य होने के बाद भी पीएमटी में चुने नहीं जा सके या जो योग्य होने के बाद भी नौकरी नहीं पा सके, उनके भविष्य के मामले में भाजपा मौन क्यों?
छठवा सवाल-प्रदेश सरकार के अधीन जांच एजेंसी कैसे निष्पक्ष जांच कर सकती है? जब सीबीआई पर आरोप लग सकते हैं तो एसटीएफ के अधिकारियों को तो कम से कम 5 साल सरकार के साथ ही गुजारने हैं। ऐसे में निष्पक्ष जांच आयोग का गठन समय रहते क्यों नहीं किया गया?

सबसे बड़ा और अहम सवाल- अगर मंत्रीमंडल का मुखिया सीएम तो अपने मंत्रियों के घोटाले का जिम्मेदार कौन? अगर शिवराज बहुत भावुक हैं और किसान की एक साल की फसल बर्बाद होने पर रो पड़ते हैं, प्रकृति की नाइंसाफी पर आंसू बहाते हैं और मुआवजा की घोषणा करते हैं तो फिर उनके मंत्रियों और अधिकारियों की करतूत से युवाओं के पूरे जीवन बर्बाद होने पर कोई मुआवजा क्यों नहीं? युवाओं के भविष्य को बर्बाद करके उनके मां-बाप को तीर्थ कराने से कौन सा पाप धुलेगा।

सोमवार, 20 अगस्त 2012

पूर्वजों की यादों की तरह सहेंजेगे पुरातन स्मारकें- लक्ष्मीकांत शर्मा





  • पुरातन स्मारकें हमारे पूर्वजों की धरोहर की तरह होती हैं। हम इन्हें सहेजने और संरक्षित करने के लिए वचनवद्ध हैं। इस काम में न तो कोताही बरती जाएगी और न ही धन- संसाधनों की कमी आने दी जाएगी। मध्यप्रदेश के पुरातात्विक स्मारकों के संरक्षण के लिए 13 वें वित्त आयोग द्वारा 175 करोड़ रुपये स्वीकृत किए गए हैं। इस राशि से प्रदेश के पुरातात्विक स्मारकों एवं धरोहरों का संरक्षण एवं संवर्धन किया जाएगा। संस्कृति मंत्री लक्ष्मीकांत शर्मा ने यह बात स्वराज भवन में  'The Grandeur of Granite Shiva-Yogini Temples of Vyas Bhadora'' पुस्तक के विमोचन अवसर पर कही। लेखक वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी श्री अशोक शाह हैं।                                                                           


प्रमोद त्रिवेदी, भोपाल

संस्कृति मंत्री ने कहा कि व्यास भदौरा और आशापुरी मंदिर समूह को पर्यटन के मानचित्र पर लाने के प्रयास किए जाएंगे। उन्होंने बताया कि व्यास भदौरा और आशापुरी में मंदिरों का जीर्णोद्धार करवाया जा रहा है। उन मंदिरों के अतिरिक्त अन्य स्मारकों के विकास के लिए डीपीआर ौयार करवाया गया है। श्री शर्मा ने श्री अशोक शाह के कार्यों की सराहना करते हुए कहा कि विभाग हमेशा उनका सहयोग लेता रहेगा। श्री शर्मा ने कहा कि व्यास भदौरा के मंदिरों की सबसे बड़ी विशेषता, उनका ग्रेनाइट पत्थरों से निर्माण है।

पुस्तक के लेखक श्री अशोक शाह ने बताया कि ग्राम व्यास भदौरा छतरपुर जिले की चन्दला उप-तहसील में स्थित है। राज्य शासन द्वारा यहाँ के 13 मंदिर समूह में से दो मंदिर को वर्ष 1990 में राज्य संरक्षित स्मारक घोषित किया गया है। यहाँ के जीर्ण-शीर्ण मंदिरों का पुनरूद्धार किया जा रहा है। मंदिरों के शिल्प को देखने के बाद यह ज्ञात हुआ है कि व्यास भदौरा के मंदिर खजुराहो में निर्मित मंदिरों के पूर्व बनाए गये थे। ऊँची जगती पर बने मंदिर क्रमांक एक और दो पूर्वाभिमुख होते हुए शिव को समर्पित है। संभवत: यह पहला मंदिर समूह होगा जो तीन तरफ सोपान योजना से युक्त है। कठोर ग्रेनाईट पत्थरों से निर्मित इन मंदिरों को बनवाने में अधिक श्रम लगा होगा, यही कारण है कि बाद में चन्देलों ने ग्रेनाईट के पत्थरों से मंदिर नहीं बनवाया। संभवत: व्यास भदौरा के मंदिर समूह चन्देलों के मूर्ति एवं मंदिर निर्माण के शिल्प की कहानी के प्रथम सोपान हैं।

पुस्तक में चार अध्याय हैं, जिनमें भूमिका, ऐतिहासिक जानकारी मंदिर स्थापत्य के विकास की गाथा तथा कला एवं प्रतिमा विज्ञान के बारे में सारगर्भित जानकारी उपलब्ध है। पुस्तक में 71 बहुरंगी छायाचित्र भी हैं। कार्यक्रम में संचालक खेल एवं युवा कल्याण डॉ. शैलेन्द्र श्रीवास्तव और संचालक संस्कृति श्रीराम तिवारी भी उपस्थित थे। 

शनिवार, 11 अगस्त 2012

उच्च शिक्षा में कीर्तिमान....एक क्लिक और मिल जाता है प्रवेश



  • पारदर्शी शिक्षा के लिए आॅन लाइन प्रवेश प्रक्रिया

प्रमोद त्रिवेदी


मध्यप्रदेश के हर वर्ग के विद्यार्थी को शिक्षा मिले और उसे महाविद्यालयों की मनमानी से जूझना न पड़े। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने अपने विद्यालयीन समय के अनुभवों के आधार पर विद्यार्थियों को ई प्रवेश यानि आॅन लाइन एडमीशन की सौगात देने का बीड़ा उठाया। इस कार्य में उनके उद्देश्य में सहभागी बने उच्चशिक्षा मंत्री लक्ष्मीकांत शर्मा। नतीजन आज पूरे भारत में मध्यप्रदेश ऐसा पहला राज्य है जहां एक क्लिक पर 24 घंटे कभी भी छात्र को 9 कॉलेजों में एडमीशन के लिए चयन करने का अधिकार मिल गया है। 

भोपाल। मध्यप्रदेश सरकार ने उच्च शिक्षा में प्रवेश के लिए भटकते विद्यार्थिओं और उनके परिजनों का दर्द बड़े नजदीक से महसूस किया। उन्होंने उच्च शिक्षा के लिए विद्यार्थियों की सुविधा के लिए ऐसा ऐतिहासिक कदम उठाया जो कि पूरे देश के लिए मिशाल बन गया। लम्बी लाइनों में लगने और एडमीशन के लिए कॉलेजों के चक्कर काटने से लेकर सीटों की स्थिति जानने का बेहद जटिल काम पर पूरी तरह विराम लग गया। घर बैठे चौबीसों घंटें कभी भी विद्यार्थी आॅन लाइन आवेदन कर सकता है। उसे प्रवेश के लिए 9 कॉलेजों में से चुनने की सुविधा मिल गई। आॅन लाइन कॉलेजों की सीटों और कोर्स की जानकारी भी मिल रही है। कहीं कोई गड़बड़ नहीं। सब कुछ आंखों के सामने। ऐसी पारदर्शिता कि विद्यार्थियों को स्वर्णिम भविष्य सपना न लगे बल्कि हकीकत में तब्दील होता दिखे। मुख्यमंत्री के इस प्रयास में उच्च शिक्षा विभाग के तमाम अफसरों ने खुद उच्च शिक्षा मंत्री लक्ष्मीकांत शर्मा की मॉनिटरिंग में कार्य किया और नतीजा आॅन लाइन एडमीशन की सहूलियत के साथ सामने है।

ई प्रवेश ने किया प्रवेश आसान

  • विद्यार्थियों की सुविधा और बेहतर पारदर्शिता के लिए 2012-13 में मध्यप्रदेश के महाविद्यालयों में प्रवेश के लिए आॅनलाइन प्रवेश प्रक्रिया को अपनाया जा रहा है। इस व्यवस्था को लागू करने वाला मध्यप्रदेश देश का पहला राज्य है।
  • आॅन लाइन से विभिन्न महाविद्यालयों के पाठ्यक्रमों की जानकारी एक क्लिक पर उपलब्ध हो रही है। विद्यार्थिओं और अभिभावकों को अलग-अलग महाविद्यालय में आवेदन करने की परेशानी से मुक्ति मिली है।
  • इस प्रक्रिया से सभी को प्रवेश के समान अवसर मिले और प्रवेश प्रक्रिया भी पूरी तरह पारदर्शी हो गई।
  • इससे घर बैठे विद्यार्थियों को 24 घंटे प्रवेश की सुविधा मिली।
  • केवल 50 रुपए प्रति महाविद्यालय शुल्क पर विद्यार्थियों को 9 महाविद्यालयों में प्रवेश के लिए चयन करने का अवसर मिला।

पहले उच्च शिक्षा में सेमेस्टर सिस्टम की सौगात
 महाविद्यालयीन परीक्षाओं में गड़बड़ी ,अध्ययन के लिए कालेजों में सुविधाओं से जूझते विद्यार्थी। यह सब बीते दिनों की बात हो गई है। अब महाविद्यालय सरकारी हो या निजी। उच्च शिक्षा के क्षेत्र में लागू सेमेस्टर पद्धति ने अध्ययन व अध्यापन दोनों की दशा व दिशा में व्यापक बदलाव किया है। दैनिक हाजिरी ,प्रायोगिक शिक्षा पर जोर व साल में दो बार परीक्षा से न केवल महाविद्यालयों में छात्रों की उपस्थिति बढ़ी बल्कि उन्हें अध्ययन नोट्स,प्रेक्टिकल फाइल्स तैयार करने के लिए बाध्य होना पड़ा। शैक्षणिक कैलेण्डर के अनुसार तय समय में पाठ्यक्रम पूरा करने की बाध्यता ने महाविद्यालयों में पढ़ाई के प्रति रुझान पैदा किया। बिगड़ी हुई व्यवस्था में सुधार कर इसे नए सांचे में ढालना आसान नहीं है,लेकिन राज्य शासन के मजबूत इरादे से उच्च शिक्षा में यह बदलाव संभव हुआ। इसका श्रेय पूरी तरह मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और उच्च शिक्षा मंत्री लक्ष्मीकांत शर्मा को जाता है जिन्होंने सेमेस्टर सिस्टम को लागू करने में कोई कसर बाकी नहीं रखी।
हजार करोड़ की नई योजना
 उच्च शिक्षा के क्षेत्र में और अधिक सुधार के लिए राज्य सरकार अब विश्व बैंक की मदद से नई सुधार योजना लागू करने की तैयारी में है। इस पर एक हजार करोड़ रुपए खर्च होगें। यह पहला मौका है जब उच्च शिक्षा में अधोसंरचना विकास पर इतनी बड़ी राशि व्यय करने का निर्णय लिया गया। बताया जाता है कि विश्व बैंक ने भी इस मामले में अपनी सैद्धांतिक सहमति दे दी। आर्थिक सहायता संबंधी औपचारिकताओं की पूर्ति के लिए  दो बार उच्च स्तरीय बैठके भी हुर्इं। इस राशि से प्रस्तावित दस नए महाविद्यालयों समेत सभी 24 भवन विहीन कालेजों के लिए भवन व छात्रावास तैयार किए जाएंगे। यही नहीं चुनिंदा महाविद्यालयों में राष्ट्रीय स्तर का पुस्तकालय व प्रयोगशालाओं की भी स्थापना होगी।
संशोधित अधिनियम यानि नया आयाम
 शिक्षा व्यवस्था में और अधिक सुधार के लिए राज्य शासन विश्वविद्यालय अधिनियम में संशोधन करने की तैयारी में भी है। नई व्यवस्था के तहत शिक्षा सत्र एक जुलाई से अनिवार्य रूप से शुरू करने, प्राचार्यों के रिक्त पदों की पूर्ति, सेमेस्टर पद्धति को और अधिक मजबूत बनाना, शोध के लिए बजट की अतिरिक्त व्यवस्था, शिक्षा ऋण गारंटी योजना का सरलीकरण, प्रतिभावान व अभावग्रस्त विद्यार्थियों की मदद के लिए पचास करोड़ रुपए की निधि की स्थापना ,जिला स्तर के सभी आईटीआई को आदर्श संस्थान बनाना, आदिवासी बहुल क्षेत्र झाबुआ,शहडोल व नौगांव में नए इंजीनियरिंग कालेजों की स्थापना आदि कार्य शामिल हैं।