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शनिवार, 11 अगस्त 2012

फिर भी हम हैं हिंदुस्तानी.. 15 अगस्त 2012 विशेष



विशेष सम्पादकीय.....प्रमोद त्रिवेदी


हमारे देश की आजादी को 65 साल पूरे हो गए। यानि पूरी आवाम(बांग्लादेशी शरणार्थियों और आतंकवादियों सहित) 65 साल से आजादी की सांस ले रही है। इसी के साथ ही देश की आजादी और कर्णधारों के कर्मों को कोसने के  भी इतने ही वर्ष हो चुके हैं। मुझे नहीं लगता कि ऐसा भी कोई दिन रहा हो, जब किसी दिन देश के हालात को लेकर नेताओं को न कोसा गया हो। सीधी सी बात है कि लोग आधा खाली गिलास कह रहे हैं। आधा भरा कह देंगे तो उन्हें लगता है कि देश के साथ गद्दारी होगी। खैर ये पुरानी बात हुई। अब हमें नई बात करनी है और वो ये है कि हमें ये देखना है कि तमाम बाधाओं के बाद भी हमारा देश ने क्या नया किया? इस देश में क्या अच्छा है जो विदेशियों के सामने अब भी विश्व गुरू मानने पर विवश करता है। सोचो, यदि चीन जैसे हालात हो जाएं। हमें बोलने के लिए भी इजाजत लेनी पड़े तो हम कहते हैं फिर कैसी आजादी। हमें ऐसे देश और उसके संविधान पर हमें गुमान होना चाहिए, जहां राष्ट्रपति चुनाव के बाद भी हम सर्वोच्च पद पर आसीन होने वाले के खिलाफ बोलते हैं और हमारे खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं होती। किसी दूसरे देश में इतना बोलते ही एक ही सजा मुकर्रर होती और वो है फांसी। ये तो एक उदाहरण है। याद करो जेसीका लाल हत्याकांड या पूर्व डीजीपी राठौड़ का मामला। पूरा देश सर्वोच्च न्यायायिक शक्ति यानि कोर्ट के फैसले के खिलाफ सड़कों पर उतर आता है। हमारे संविधान में न्यायालय के फैसले पर आम आदमी को टिप्पणी का अधिकार नहीं है, लेकिन ये भारत जैसे देश में ही हो सकता है कि लोगों ने कानून तोड़ा फिर भी उनकी बात सुनी गई। लोगों की भावनाओं को देखते हुए दोनों मामलों में देश की जनता की भावना को तरजीह देते हुए फैसले बदले गए। ये हैं स्वतंत्रता के मायने। रही भ्रष्टाचार, भुखमरी, अपराध या आतंकवाद की बात तो पूरे विश्व में एक देश का नाम बताओ जहां ये समस्याएं न हों। नहीं बता सकेंगे तो हमें फिर अहसान फरामोश की तरह अपने देश के उन सपूतों के बलिदान को व्यर्थ नहीं बताना चाहिए जो हमें ऐसी आजादी देने के लिए हंसते-हंसते शहीद हो गए। हमें ऐसा देश विरासत में मिला है जिसकी अच्छाई को गिरवाएं तो उम्र कम पड़ जाए। हम अपने देश को चलाने वाली सरकार को भी अर्श से फर्स पर पहुंचा सकते हैं। ये शक्ति हिंदुस्तान जैसे देश में ही आम आदमी के हाथ में हो सकती है। हम क्यों रोएं, जबकि सब हमारे हाथ में है। गलती कर भी देंगे तो हमारे देश का संविधान हमें बार-बार गलती सुधारने का मौका देता है। हमें नकारात्मक बातों को भुलाकर देश की सकारात्मक ताकत को पहचानना होगा। हमारा देश महान था, है और रहेगा। बस दिल से देश की अच्छाईयों को याद करो और शहीदों की याद सहेज लो। यही देश के प्रति वफादारी होगी और शहीदों को सच्ची श्रद्धांजली।
जय हिंद


गुरुवार, 9 अगस्त 2012

बलिदान को पहचानो...जीते जागते इतिहास हैं स्वतंत्रता संग्राम सेनानी



सदियों तक विदेशी मुगलों के बाद अंग्रेजों से आजादी छीनने वाले जांबाजों का बलिदान बेमिसाल है। उनने स्वतंत्र और समृद्ध राष्ट्र के सपने के साथ अपना सबकुछ न्यौछाबर कर दिया। लेकिन आजादी के 65 साल बीतने के बाद भी हम कई मायनों में गुलामी से मुक्त नहीं हो सके हैं। साथ ही जिनने आजादी की लड़ाई लड़ी, उन्हें भुलाते जा रहे हैं। चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारी से कम पेंशन और इलाज के लिए लम्बी लाइनें उनकी आत्मा पर ऐसा घाव बनाती हैं जो अंग्रेजों के जुल्मों से कहीं ज्यादा हैं। हलांकि मध्यप्रदेश सरकार ने स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के जख्मों पर मरहम लगाते हुए दिसम्बर 2011 में सम्मानजनक पेंशन राशि शुरु कर दी है। स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के बलिदान और सरकार की अनदेखी को फोकस करती एक स्टोरी।

प्रमोद त्रिवेदी, भोपाल।

भारत का स्वतंत्रता संग्राम इतिहास का ऐसा पन्ना है, जो कई मायनों में बेमिसाल है। आजादी के सिपाहियों की बहादुरी और त्याग की वजह से ही आज हम आजाद भारत में सांस ले पा रहे हैं। 1857 से शुरू हुआ स्वतंत्रता संग्राम 1947 तक चला। इसमें कई पीढ़ियों का संघर्ष और बलिदान शामिल है। देश को आजाद कराने के लिए इस लड़ाई में जिन लोगों ने हिस्सा लिया, वे आज खुद को कोस रहे हैं। आए दिन भ्रष्टाचार, किसानों द्वारा आत्महत्या, नक्सलियों का बढ़ता प्रभाव, गरीब और अमीर में बढ़ता फासला, सांप्रदायिक दंगे, हिंसा और नेताओं के नित नए फरेब देखकर उनका कलेजा बैठ जाता है। उन्होंने जिस आजादी के लिए अंग्रेजों से लड़ाई की, वह तो कहीं नजर नहीं आती।
 स्वतंत्रता सेनानी बूढ़े हो गए हैं। हालात यह हैं कि समाज और सरकार की तरफ से उन्हें कोई सहूलियत नहीं मिल रही है। ज्यादातर सेनानियों को घर वालों ने भी छोड़ दिया है। बेटा साथ नहीं रहता है। समाज और सरकार ने उनका तिरस्कार कर दिया है। वे पैसे-पैसे के लिए मोहताज हो गए हैं। सरकार की तरफ से उन्हें पेंशन मिलती है। शर्मनाक बात यह है कि पेंशन की राशि इतनी कम है कि बताने में भी शर्म आती है। आजादी की लड़ाई में शामिल होने वाले इन देशभक्तों को हम किसी फोर्थ क्लास कर्मचारी के वेतन से भी कम पैसे देते हैं।
घटा त्याग और बलिदान का महत्व 
आजादी के 65 सालों बाद भी हम देश के प्रति उनके त्याग और योगदान का महत्व समझ नहीं पा रहे हैं। हम उन्हें सम्मान देने और उनका हक दिलाने के बजाए उन्हें अपमानित कर रहे हैं। मई, 2010 में केंद्र सरकार द्वारा अदालत को बताया गया कि देश भर में करीब एक लाख सत्तर हजार स्वतंत्रता सेनानी हैं। हालांकि यह आंकड़ा सरकारी दस्तावेजों पर आधारित है। हर महीने यह संख्या बदलती रहती है, क्योंकि इन सेनानियों की उम्र इतनी हो चुकी है कि लगभग हर महीने कुछ की मौत हो जाती है। इनमें से करीब 60 हजार स्वतंत्रता सेनानियों को केंद्र सरकार द्वारा पेंशन मिल रही है, बाकी को राज्यों द्वारा पेंशन की व्यवस्था है। पेंशन वितरण के मामले में हर राज्य का अपना नियम है, पेंशन राशि भी अलग-अलग है। केंद्र सरकार, स्वतंत्रता सेनानियों को 12400 रुपए देती है। वह स्वतंत्रता सेनानी योजना के तहत कुल 785 करोड़ रुपए खर्च करती है। उधर हरियाणा के मुख्यमंत्री ने दो साल पहले 15 अगस्त को स्वतंत्रता सेनानियों की पेंशन राशि छह हजार से बढ़ाकर ग्यारह हजार रुपए कर दी। इसी तरह कर्नाटक सरकार ने यह पेंशन 3 हजार से बढ़ाकर 4 हजार रुपए कर दी है। दिल्ली में स्वतंत्रता सेनानियों की पेंशन साढ़े तीन हजार से बढ़ाकर साढ़े चार हजार रुपए कर दी गई है। हैरानी की बात यह है कि दिल्ली में 1998 से ही स्वतंत्रता सेनानियों को पेंशन देने की योजना शुरू की गई थी, लेकिन आज भी यहां पेंशन राशि अन्य राज्यों के मुकाबले काफी कम है। तमिलनाडू में पिछले साल मुख्यमंत्री ने सेनानियों को मिलने वाली पेंशन 4 हजार से बढ़ाकर 5 हजार रुपए कर दी। सरकार स्वतंत्रता सेनानियों की मदद के बड़े-बड़े दावे करती है। उन्हें आर्थिक सहायता के तौर पर पेंशन और विभिन्न क्षेत्रों में आरक्षण देने की बात करती है, लेकिन सच तो यह है कि न जाने कितने स्वतंत्रता सेनानी आज भी गुमनामी और गरीबी की जिंदगी जी रहे हैं। कई तो अपने हक की लड़ाई लड़ते-लड़ते इस दुनिया से ही विदा हो गए। सबसे ज्यादा शर्मनाक बात तो यह है कि कई स्वतंत्रता सेनानियों ने खुद को स्वतंत्रता सेनानी साबित करने में अपनी शेष जिंदगी गुजार दी। अधिकारियों की मनमानी और व्यवस्था में व्याप्त भ्रष्टाचार की वजह से कई फर्जी लोग खुद को स्वतंत्रता सेनानी घोषित कर सरकारी सुविधाओं का फायदा उठा रहे हैं और असली स्वतंत्रता सेनानी दस्तावेजों में अपना नाम दर्ज कराने के लिए तरस रहे हैं। ताज्जुब की बात तो यह है कि फर्जी लोगों में कई तो ऐसे हैं, जो आजादी के समय पैदा ही नहीं हुए थे या फिर उनकी उम्र चार-पांच साल के आसपास रही होगी। ऐसे मामलों में जो लोग पकड़े जाते हैं, उनकी पेंशन रोक दी जाती है। लेकिन सवाल यह खड़ा होता है कि जो अधिकारी बिना जांच-पड़ताल किए फर्जी प्रमाणपत्र पर दस्तखत करके असली स्वतंत्रता सेनानियों का हक मारते हैं, उन्हें कोई सजा क्यों नहीं मिलती? सुप्रीम कोर्ट स्वतंत्रता सेनानियों की बदहाली पर अफसोस जताता है और इसके लिए सरकार की लालफीताशाही को जिम्मेदार बताता है, लेकिन क्या इतना काफी है? गौर करने वाली बात है कि पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि देश के ज्यादातर स्वतंत्रता सेनानी गरीबी और भुखमरी की जिंदगी बिताने पर मजबूर हैं, सरकार की तरफ से दी जाने वाली पेंशन उनके लिए किसी खैरात से कम नहीं है। इस बात से साबित हो जाता है कि देश का सर्वोच्च न्यायालय भी जानता है कि सरकार स्वतंत्रता सेनानियों की अनदेखी कर रही है। बात सिर्फ पेंशन और आरक्षण की नहीं है, बात है उनके त्याग और संघर्ष के महत्व को समझने की। स्वतंत्रता संग्राम के जो सिपाही आज जिंदा हैं, उन्हें क्या वही भारत नजर आता है, जिसके लिए वे लड़े थे?
आजादी के मायने भूल रही नई पीढ़ी
जिस देश को आजाद कराने के लिए इन सिपाहियों ने लाठियां और गोलियां खाईं, वह देश आज गांधी, नेहरू और सुभाष चंद्र बोस को सिर्फ उनके जन्मदिन पर याद करता है। नई पीढ़ी तो आजादी के दीवानों के बलिदान के साथ-साथ आजादी के मायने भी भूल चुकी है। जिन लोगों की वजह से आज हम खुली हवा में सांस ले रहे हैं, उन्हें हमने सम्मानित करना तो दूर, बदहाली के दलदल में छोड़ दिया है। उनके अनुभव से सीखना तो दूर, समारोहों में उन्हें बोलने का भी मौका नहीं दिया जाता। हम शायद भूल रहे हैं कि ये साधारण लोग नहीं हैं, जीते-जागते इतिहास हैं। लेकिन हम इतने निष्ठुर और संवेदनहीन हो गए हैं कि इनकी अहमियत को समझने की अक्ल हमारे अंदर नहीं बची। वरना हम इन्हें दर-दर की ठोकरें खाने को मजबूर न होने देते। जिन लोगों ने देश को आजाद कराने में अपनी जवानी लुटा दी, आज हालत यह है कि उन्हें सचिवालयों में प्रवेश के लिए घंटों लाइन में खड़े होकर पास बनवाना पड़ता है। सबसे बड़ी समस्या इलाज कराने की है। अब इनकी वो उम्र नहीं है कि अस्पतालों में लाइन लग कर अपना इलाज करवा सकें। जो स्वतंत्रता सेनानी गांव में रहते हैं उनकी हालत और भी खराब है। सरकार कम से कम इतना तो कर सकती थी कि डाक्टरों को उनके घर भेज कर उनका हालचाल पूछ सकती थी। उन्हें सरकार से विशेष कुछ नहीं चाहिए, लेकिन सरकार देश का मान रख लें तो उनकी आत्मा तृप्त हो जाएगी।
00मध्यप्रदेश में दिल्ली से बेहतर हालात
दिसम्बर 2011 में मंत्री परिषद की बैठक में मध्य प्रदेश में स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की मासिक पेंशन राशि में वृद्धि की अधिसूचना जारी कर दी गई है। राज्य सरकार द्वारा आज जारी अधिसूचना में मध्यप्रदेश स्वतंत्रता संग्राम सैनिक सम्मान-निधि नियम 1972 में संशोधन किया गया है। इसके अनुसार अब स्वतंत्रता सेनानी प्रतिमाह 15 हजार रुपए राज्य निधि प्राप्त कर सकेंगे। इसी तरह मध्यप्रदेश स्वतंत्रता संग्राम सैनिक चिकित्सा सहायता अनुदान नियम 1986 में किये गये संशोधन के फलस्वरूप अब स्वतंत्रता संग्राम सेनानी को गंभीर रोगों जैसे कैंसर, हार्ट-सर्जरी, किडनी रिप्लेसमेंट, स्पाइनल सर्जरी, घुटना जोड़ बदलना, हिप बदलने, न्यूरो सर्जरी, प्रोस्टेट सर्जरी, टीबी कृत्रिम अंग लगाने जैसे उपचार के लिये चिकित्सा सहायता राशि प्राप्त होगी। यह सहायता संबंधित जिले के मुख्य चिकित्सा अधिकारी के प्रमाणीकरण के आधार पर मंजूर की जाएगी।