शुक्रवार, 10 अगस्त 2012

एक डॉक्टर से नहीं हो सकेगा परिवार का इलाज


  • प्रदेशभर के मेडिकल कॉलेजों का मामला, एमसीआई ने दिया था प्रस्ताव, विशेषज्ञता चिकित्सा को दी जा रही वरीयता
  •  नहीं है फेमिली डॉक्टर का कोर्स 
इंट्रो:
एमसीआई चाहता है कि एक ही डॉक्टर सभी बीमारियों के इलाज में एक्सपर्ट हो यानि डॉक्टर फेमिली मेडीसिन का कोर्स करें, लेकिन प्रदेश के किसी भी सरकारी मेडीकल कॉलेज में फेमिली मेडीसिन का कोर्स शुरु नहीं किया गया है। ऐसे में विशेषज्ञता कोर्स के चलते मरीजों को हर इलाज के लिए अलग-अलग डॉक्टर को फीस देना होती है। इसके साथ ही कई गंभीर बीमारियों की जानकारी मरीज को बहुत बाद में मिल पाती है और उसका समय पर इलाज नहीं हो पाता। खासकर ग्रामीण क्षेत्रों की चिकित्सा सुविधा में फेमिली मेडीसिन का कोर्स बहुत कारगर साबित हो सकता है।

 प्रमोद त्रिवेदी, भोपाल।

पुराने समय की बात है कि पहले एक ही डॉक्टर सभी रोगों का इलाज कर लेता था। फेमिली डॉक्टर का चलन था और फेमिली डॉक्टर को हर बीमारी के इलाज में महारत हासिल थी। वह आवश्यकता होने पर ही विशेषज्ञ का सहारा लेता था। लेकिन अब विशेषज्ञ डॉक्टर अधिक हो गए हैं और वे केवल एक ही रोग का इलाज कर पाते हैं। इससे अलग-अलग रोगों के लिए विभिन्न विशेषज्ञों के पास जाना पड़ रहा है। सभी रोगों का इलाज करने वाला डॉक्टर फेमिली डॉक्टर की श्रेणी में आता है। एमसीआई ने भी इसे गंभीरता से लेते हुए फेमिली मेडिसिन कोर्स शुरू करने का प्रस्ताव रखा है। इसके बावजूद अभी तक प्रदेश के किसी सरकारी मेडिकल कॉलेज में फेमिली मेडिसिन कोर्स को शुरू नहीं किया गया।
प्रदेश में फेमिली मेडिसिन कोर्स को तवज्जो नहीं दी जा रही है। जबकि इससे उलट मेडिकल क्षेत्र में विशेषज्ञता कोर्स को ही वरीयता दी जा रही है। इस कारण से अच्छे फिजिशियन लाने की अवधारणा धूमिल होती नजर आ रही है। वर्तमान में यह कोर्स केवल एक निजी मेडिकल कॉलेज में चल रहा है।

00गांवों में चिकित्सा सुविधा में मील का पत्थर
ग्रामीण क्षेत्रों में चिकित्सा सुविधा का अभाव रहता है। अधिकांश ग्रामीण क्षेत्रों में केवल सरकारी अस्पताल की ही सुविधा है और इन्हीं अस्पतालों के सहारे इन क्षेत्र की चिकित्सा व्यवस्था निर्भर है। ऐसे क्षेत्रों के लिए एमबीबीएस के बाद फेमिली मेडीसिन का कोर्स बहुत उपयोगी साबित होगा। ग्रामीण क्षेत्र के डॉक्टर को सभी क्षेत्र की चिकित्सा में महारत हासिल होगी तो वह गांव में रहकर मरीजों का समुचित उपचार कर सकेगा। खासकर गांव के लोगों को बीमारी में ये भी पता नहीं होता कि उन्हें किस डॉक्टर से मिलना चाहिए। पता भी हो तो उनकी हैसियत ऐसी नहीं होती कि वह मोटी फीस देकर इलाज करा सके या डॉक्टर की बताई महंगी जांच करा सकें। ऐसे में ग्रामीण क्षेत्रों के डॉक्टर का फेमिली मेडीसिन का कोर्स ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्थाओं में मील का पत्थर साबित हो सकता है।

00मृत्यु दर के आंकड़ों में होगी कमी
बीमारी के कारण हुई मौतों में 80 फीसदी का कारण होता है समय पर मरीज को बीमारी की जानकारी न मिल पाना। अगर फेमिली मेडीसिन डॉक्टर होंगे तो मरीज की बीमारी समझ आ सकेगी और समय पर उसका इलाज हो सकेगा। मध्यप्रदेश में 80 फीसदी से ज्यादा जिले ऐसे हैं जिनमें महानगरों तक पहुंचने में काफी वक्त लगता है और काफी खर्च भी वहन करना पड़ता है। इसके अलावा आने-जाने के लिए आसानी से पब्लिक ट्रांसपोर्ट की सुविधा भी नहीं है। खासकर आदिवासी और पिछड़े जिले में ये बहुत बड़ी समस्या है। ऐसे क्षेत्रों में सरकारी अस्पतालों में डॉक्टर होते भी हैं तो उन्हें सभी बीमारियों के इलाज की जानकारी नहीं होती। ऐसे क्षेत्रों के लिए फेमिली मेडीसिन डॉक्टर होने से स्वास्थ्य सुविधाओं में इजाफा होगा और लोगों को बेहतर इलाज घर के करीब ही मिल सकेगा।

क्या है फेमिली मेडिसिन

  • एमबीबीएस के बाद दो से तीन साल का कोर्स करने का प्रस्ताव एमसीआई ने रखा था।
  • फेमिली मेडिसिन में सामुदायिक चिकित्सा शिक्षा, शिशु रोग, स्त्री रोग, मेडिसिन चिकित्सा पढ़ाने का प्रावधान है।
  • इस कोर्स को करने के बाद एक ही डॉक्टर विभिन्न रोगों के मरीज एक साथदेख सकता है।
  • मरीजों को विशेषज्ञ चिकित्सक के पास जाने की आवश्यकता नहीं होगी।
  • एमबीबीएस के बाद इस विशेष कोर्स करने के कारण वह डॉक्टर फेमिली मेडिसिन का विशेषज्ञ कहलाएगा।
  • गांवों में अलग-अलग रोगों के लिए विशेषज्ञ डॉक्टर्स की आवश्यकता नहीं होगी।


अभी यह हो रहा है


  • एमबीबीएस के बाद केवल विशेषज्ञता के पीजी कोर्स को दी जा रही वरीयता।
  • मरीज फिजिशियन की जगह विशेषज्ञ डॉक्टरों से कराने में दिखा रहे उत्सुकता।
  • मरीजों की जेब हो रही ढीली।
  • मरीजों को यह जानकारी नहीं होती कि वे किस रोग के लिए किस विशेषज्ञ डॉक्टरों से मिलें। यह सलाह फेमिली फिजिशियन ही दे सकता है। 




एमसीआई ने फेमिली मेडिसिन कोर्स का प्रस्ताव रखा था लेकिन अभी तक इसे प्रदेश के किसी मेडिकल कॉलेज में शुरू नहीं किया है। इस कोर्स के शुरू होने से विशेषज्ञ डॉक्टर को चार विधा का ज्ञान हो सकेगा और मरीजों को फायदा मिलेगा।
डॉ.प्रदीप कसार अधीक्षक,मेडिकल अस्पताल, जबलपुर

फेमिली मेडिसिन कोर्स शुरू होने के बारे में सुना था। लेकिन यह अभी तक शुरू नहीं किया गया है। इस कोर्स के शुरू होने से चिकित्सा क्षेत्र में बेहतर परिणाम मिलेंगे। कई बीमारियां फेमिली फिजिशियन सेटिल कर सकता है। इस कोर्स के आने से और बेहतर फेमिली फिजिशियन मिलेंगे। जिससे मरीजों को आवश्यकता होने पर ही कंस्टलटेंट के पास जाना पड़ेगा। कई बीमारियों का इलाज फेमिली फिजिशियन खुद ही कर देगा और बेहतर सलाह दे सकेगा।
डॉ.एमसी डॉवर फिजिशियन

मंद हुई मानसून की रफ्तार


 भोपाल। पिछले कुछ दिनों से प्रदेश में तेज रफ्तार से जारी वर्षा से आज प्रदेशवासियों को कुछ राहत मिली। भोपाल, खरगोन, बैतूल, रायसेन, देवास और धार में स्थिति सामान्य हो चली है। रायसेन के दौबाखेड़ी गाँव में सेना ने पहुँचकर 107 लोगों को राहत शिविरों तक पहुँचा दिया है। यहाँ भी बाढ़ का पानी उतर चुका है। बाढ़ प्रभावितों को चिकित्सा दलों द्वारा निरंतर उपचार की सुविधा भी उपलब्ध करवाई जा रही है। अब तक प्रदेश के 16 जिलों में सामान्य से अधिक, 24 जिलों में सामान्य और 10 जिलों में सामान्य से कम वर्षा दर्ज की गई है। वर्षा और बाढ़ से 27 जन-हानि, 270 पशु-हानि होने के साथ ही 4,298 मकान को क्षति पहुँची है।
होशंगाबाद में सेठानी घाट का जल-स्तर 947.60 फीट पर पहुँच गया है। सेना की मदद से 300 लोगों को 4 राहत शिविर में सुरक्षित पहुँचाया गया है। सीहोर में 15 राहत शिविर खोले गये हैं, जिनमें 800 लोगों को ठहराया गया है। इसी तरह हरदा में 4 राहत शिविर में 400 लोगों को, विदिशा में 5 राहत शिविर में 500 लोगों को ठहराया गया है। धार जिले में 3 शिविर में 200 लोगों को शिफ्ट किया गया है। प्रदेश में कुल 31 राहत शिविर में 2200 प्रभावितों को ठहराया गया है।
प्रदेश में अति वर्षा और बाढ़ से 27 जन-हानि हुई हैं। जिनमें से उज्जैन और देवास में 3-3, दमोह, बैतूल और छिन्दवाड़ा में 2-2, सीहोर, धार, सिवनी और रतलाम में एक-एक, होशंगाबाद और भोपाल में 5-5 शामिल हैं। पशु-हानि में सीहोर जिले में 239, देवास में 6, धार में 2, नरसिंहपुर में एक और छिन्दवाड़ा के 22 पशु शामिल हैं।
वर्षा से देवास जिले में सर्वाधिक 3,338 मकानों को क्षति हुई है। इसके अलावा उज्जैन में 27, नरसिंहपुर में 500, खरगोन में 396, सिवनी में 35 और बैतूल में 2 मकान को क्षति पहुँची है।

हर छात्र को मिलेगा रोजगार




  • 48 लाख को प्रशिक्षण से मिलेगा रोजगार
  • रोेजगार मिले ऐसी आईटीआई की होगी स्थापना
  •  बेटियों को वर्तमान आवश्यकताओं के अनुसार रोजगार देने वाली शिक्षा के लिए भी अलग आईटीआई की व्यवस्था


प्रदेश के हर विद्यार्थी को ऐसी शिक्षा दी जाएगी, जिससे पढ़ाई के बाद उसे रोजगार के लिए परेशान न होना पड़ा। यानि हर छात्र को रोजगार मूलक प्रशिक्षण देकर कुशल श्रमिक की श्रेणी में तैयार किया जाएगा। इसके लिए सरकार के आला अधिकारी नई आईटीआई की स्थापना के लिए कार्ययोजना तैयार कर रहे हैं। इसके साथ ही बेटियों के लिए वर्तमान आवश्यकताओं वाले रोजगार में प्रशिक्षित करने वाली अलग से आईटीआई खोली जा रहीं हैं। 


प्रमोद त्रिवेदी, भोपाल। प्रदेश में लोगों को रोजगार से जोड़ने के लिए कौशल विकास कार्यक्रम के अन्तर्गत 12वीं योजना में 48 लाख लोगों को रोजगार मूलक प्रशिक्षण दिया जाएगा। अगले साल ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में 15 लाख लोगों को तकनीकी क्षेत्र में प्रशिक्षण देने का लक्ष्य तय किया गया है। कौशल विकास के माध्यम से रोजगार निर्माण कार्य को गति देने के लिए मुख्यमंत्री कौशल विकास योजना बनाई जा रही है। सितम्बर माह के दूसरे हफ्ते में भोपाल में एनएसडीसी और भारतीय उद्योग परिसंघ द्वारा संयुक्त रूप से स्किल समिट का आयोजन किया जा रहा है।

लक्ष्य को पूरा करने के लिए मुख्यमंत्री श्री शिवराजसिंह चौहान ने तकनीकी शिक्षा एवं कौशल विकास योजनाओं की समीक्षा करते हुए औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थानों में उद्योगों की जरूरत के मुताबिक विषय पढ़ाने एवं पाठ्यक्रम तैयार करने के निर्देश दिए हैं। उन्होंने संबंधित अधिकारियों को प्रत्एक ब्लॉक में एक आईटीआई स्थापित करने की योजना बनाने के निर्देश देते हुए कहा कि बेटियों के लिए वर्तमान परिदृश्य के अनुकूल ट्रेड पढ़ाने की व्यवस्था करें। उन्होंने कहा कि आईटीआई में प्रशिक्षित युवाओं को कहां और किस प्रकार का रोजगार मिला इसका विस्तृत अध्ययन होना चाहिए।
श्री चौहान ने औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थानों के भवनों के निर्माण को तेजी से पूरा करने के निर्देश देते हुए कहा कि इस कार्य में विलम्ब होने पर संबंधित एजेन्सी के विरूद्ध कार्रवाई की जाएगी। प्रशिक्षण की गुणवत्ता बढ़ाने के उपायों की चर्चा करते हुए श्री चौहान ने सभी पॉलीटेक्निक एवं औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थानों में स्मार्ट क्लास रूम अवधारणा लागू करने के निर्देश दिए। उन्होंने व्यावसायिक परीक्षा मंडल द्वारा चयनित उम्मीदवारों की पदस्थापना में पुलिस सत्यापन में होने वाले विलम्ब को देखते हुए इसे लोक सेवा गारंटी अधिनियम के दायरे में लाने का विचार करने को कहा। परंपरागत कौशल को बढ़ावा देने और नई जरूरतों के हिसाब से इसे निखारने तथा गांवों में कौशल संपन्न मानव संसाधन उपलब्ध करने की कार्य योजना बनाने के निर्देश दिए। बैठक में बताया गया कि कौशल विकास केन्द्रों में प्रथम बैच में 4902 प्रशिक्षार्थी है। साल में कुल तीन बैच होंगे। श्योपुर, बुरहानपुर, बड़वानी और राजगढ़ आईटीआई को आदर्श आईटीआई बनाया गया है।


गुरुवार, 9 अगस्त 2012

एक कटाक्ष लेकिन यथार्थ सत्य----पापा ये कांग्रेस क्या है?


एक कटाक्ष लेकिन यथार्थ सत्य

बच्चे ने पूछा कि पापा ये कांग्रेस, भाजपा और समाजवादी पार्टी में क्या अंतर है। मैंने कहा बेटे पढ़ाई पर ध्यान दो। अभी तुम्हारी उम्र फालतू बातों की नहीं है। बेटे ने फिर कहा तो टीवी पर अन्ना क्यों चिल्ला रहे हैं कि सबको जागना होगा, आगे आना होगा। मैं बेटे की आदत जानता था। वो मानता नहीं और फिर टेबल याद नहीं करता। मार खाता लेकिन टेबल याद नहीं करता। कर भी लेता तो एक घंटे बाद दिमाग से डिलीट कर देता। मैंने कहा बताऊंगा तो फिर पढ़ाई करोगो। बोला पूरा 20 तक टेबल सुन लेना। मैंने कहा ये गांधी जी के तीन बंदरों की तरह है। एक केवल बोलता ही बोलता है और इतना बोलता है कि तर्क और कुतर्क का अंतर समाप्त हो जाता है। भले ही हिंदू मर रहे हों, लेकिन हमेशा कहेंगे कि हमने दूसरे धर्म के लोगों को काट डाला। उसे भाजपा कहते हैं। अब बताते हैं कि कांग्रेस क्या है? जो चुपचाप गंगा सहित सारी नदियों का पानी डकार जाए और फिर भी ऐसा मुंह बनाए कि प्यासे हैं। दूसरे देशों में घुसपैठ करा दे और कहे कि हमारे देश में आतंकवादी घुस रहे हैं। न तर्क का जबाब देते और न कुतर्क का। बस आपस में गुड़मुड़ होकर अतीत बनते जा रहे हैं। असम दंगों में सैंकड़ों बांग्लादेशियों को मरवा दिया लेकिन मजाल क्या कि एक बार भी मुंह से निकल जाए कि हमने बोडो का समर्थन किया। अब बात करते हैं समाजवादी पाटी की। तो जो एक प्रदेश में बैठ कर पूरे देश में माफियाओं को ताकतवर बना दे और समाज में उनकी तूती बुलवा दे, वो है समाजवादी पार्टी। पूरे देश में कहीं भी, कुछ भी कर दो। समाजवादी पार्टी के राज में आपका कोई बाल भी बांका नहीं कर सकता। इतिहास गवाह है पूरे प्रदेश में इनके पठ्ठे पले हैं। यूपी के गुण्डे भी पूरे देश में शरण लेते हैं और पूरे देश के आतंकी यूपी में ठप्पे से रहते हैं। इसे समझने के लिए मैंने बेटे को अजय देवगन की अपहरण दिखा दी। बेटा बोला तो पापा अब टेबिल याद करके क्या करूंगा। ये तीनों मिल गए तो फिर आपके राम भी नहीं बचा सकेंगे। क्योंकि ये तीनों कहते हैं कि भगवान इनके साथ है। मैंने कहा बेटा पढ़ ले मैं पासपोर्ट बनवा दूंगा तो दूसरे देश में बैठकर अपने देश की सेवा करना। उसने कहा कैसे? मैंने कहा पायलट बनकर। वो खुश हो गया कि इन तीनों पार्टियों से पायलट बनकर बच जाऊंगा। मैं भी अपनी तनख्याय का चेक लगाने बैंक चला गया।

असम में वो तीन दिन....असम के दंगों की आंखों देखी दास्तां



पता पूछने के भी रुपए मांग रहे थे लोग

1992 के भोपाल दंगों की यादें तो धुंधला चुकीं थीं, लेकिन असम के दंगों ने एक बार फिर इंसानी नफरत की जो तस्वीर दिखाई, वो बड़ी भयावह थी। लोग एक-दूसरे की जान के प्यासे थे। हम लोग कामाख्या के दर्शन के बाद गुवाहटी में बंधक बनकर रह गए। असम पुलिस और सेना के जवानों के मजबूत कंधों ने हमें सुरक्षा का भरोसा दिलाया और फिर गुवाहटी से हमारी सुरक्षित वापसी हो सकी। विदेशियों को शरण देने की नीति ने राष्ट्र के सीने पर ऐसा जख्म लगाया, जिसे कई सालों तक नहीं मिटाया जा सकता। हम आपको बताते हैं असम दंगों की हकीकत और दंगें के समय गुवाहटी में फंसे भोपाल के दर्शनार्थियों के एक दल की (जो कामाख्या देवी के दर्शन के लिए गए थे)आंखों देखी दास्तां बयां करती एक स्पेशल स्टोरी।

प्रमोद त्रिवेदी, भोपाल।
जीवन में वो चार दिन कभी नहीं भूल सकते। हम 10 लोग थे, लेकिन हर एक के मन में डर था। कहीं दंगाई राजधानी की तरफ रूख न कर दें। राजधानी एक्सप्रेस पर पथराव और ट्रेन से लोगों को निकालकर फेंकने की खबर ने परेशानी में इजाफा ही किया था। गुवाहटी के मूल निवासी तो ठीक थे। वो हमें दिलासा देते थे कि सब ठीक हो जाएगा। आप पूरी तरह सुरक्षित हैं। बिहार से काम करने आए बिहारी बाबू भी हम परदेशियों की हालत समझ रहे थे, लेकिन बांग्लादेशियों को तो हम दुश्मन की तरह लग रहे थे। बांग्लादेशी तो हमसे पता पूछने के भी रुपए ले लेते थे। असम दंगों के दौरान गुवाहटी के हालातों को बताते हुए राजेंद्र गुप्ता की हृदय द्रवित हो जाता है। भाजपा झुग्गी झोपड़ी प्रकोष्ठ के जिला संयोजक राजेंद्र गुप्ता कामाख्या देवी के दर्शन के लिए 20 जुलाई को गोवाहटी के लिए रवाना हुए थे। 22 जुलाई को ट्रेन पहुंची और मां कामाख्या के दर्शन भी हुए, लेकिन इसके बाद 23 जुलाई से असम को दंगों की चपेट में ले लिया। इनकी वापसी 24 जुलाई की थी, लेकिन सभी गाड़ियां निरस्त हो गर्इं और ये लोग गुवाहटी में फंसकर रह गए। बमुश्किल 26 जुलाई को सेना ने कड़ी सुरक्षा के बीच दादर-गुवाहटी एक्सप्रेस को असम से निकलवाया, तब जाकर सुरक्षित वापसी हो सकी।

बोडा आदिवासियों के हथियार डालने के बाद तांडव
राजेंद्र गुप्ता बताते हैं कि स्थानीय लोगों से बातचीत के बाद जो हकीकत सामने आई, उसके अनुसार बोडा आदिवासियों के चार नेताओं की हत्या के बाद संघर्ष शुरू हुआ। शुरुआती संघर्ष के बाद बोडा आदिवासियों ने हथियार डाल दिए और संघर्ष रोकने का प्रयास किया। यहीं से दंगों की नींव रखी गई। जब राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी के शपथ समारोह में प्रदेश के मुख्यमंत्री सहित सभी आला अधिकारी दिल्ली रवाना हो चुके थे तो ऐसे समय में बांग्लादेशियों ने बदले की भावना से हमला करना शुरू कर दिया। इसके बाद पहले बोडा आदिवासियों के कत्ल हुए तो बाद में बोडा एकत्रित होकर बांग्लादेशियों के खून के प्यासे हो गए। इसके बाद किसी को नहीं पता था कि मरने वाला कौन है। देश की मीडिया में भले ही मरने वालों की संख्या कम हो, लेकिन स्थानीय मीडिया में मरने वालों की तादात सैकड़ों में थी। कौन किसका घर जला रहा है, इससे किसी को वास्ता नहीं था। बस आंखों में नफरत और बदले की भावना ने पूरे असम को सुलगा दिया।

खून से नहा उठी हरी-भरी वादियां
कमाख्या दर्शन के समय हमारे मन में असम की हरी-भरी वादियों की कल्पना थी। लेकिन असम में जो एक-दूसरे की खून की प्यास और दंगाईयों का तांडव देखा तो मानवता से विश्वास से उठने लगा। दंगें ने हजारों गरीबों को बेघर कर दिया। ऐसे लोगों को बेघर किया जो झोपड़ी बनाने के लिए भी एक-एक पैसा जोड़ते हैं जब तक जाकर उनकी झोपड़ी बन पाती है। ऐसे में बांग्लादेशी और बोडा आदिवासियों का संघर्ष, असम के विकास को दशकों पीछे ले गया।

नेताओं के प्रति नफरत
असम में आम आदमी का बस यही कहना था कि जब खुद के लोगों को नहीं बचा सकते थे पड़ोसी देश से आतंकी क्यों आयतित करते हो। बांग्लादेशियों को शरण देना तक तो ठीक था, लेकिन उनको महज राजनीति के लिए हत्याओं का ठेका देना कहां तक उचित था। बोडा आदिवासी अपनी परम्पराओं और गरीबी में भी सूकून से जीवन जी रहे थे। लेकिन राजनीति के लिए शरण देने की नीति ने बोडा आदिवासियों को भी आतंकी बनने पर मजबूर कर दिया। उन्हें अपनी कौम की हिफाजत के लिए आतंकी बनना पड़ा। बोडा आदिवासियों का नेता भी वही बनता है जो ताकत की दम पर अपने लोगों की रक्षा कर सके। ऐसे में हथियार उठाना और हत्याएं करना आम बात हो गई है।

सेना और पुलिस का बेहतर सामंजस्य
भोपाल से गए दर्शनार्थियों के दल ने ऐसे समय पर सेना और पुलिस के व्यवहार की खुले दिल से सराहना की। बताते हैं कि हमारे प्रदेश की पुलिस जहां गाली से शुरू होती है, वहीं असम की पुलिस ने विपरीत परिस्थितियों में भी आपा नहीं खोया। परेशान लोगों के हर सवाल का बड़े इत्मिनान से जबाब देते थे और हर संभव मदद करते थे। सेना ने प्रदेश से बाहरी लोगों को सुरक्षित निकालने के लिए खुद की जान दाव पर लगा दी।
पटरी पर सर्च के बाद निकाली पहली गाड़ी
25 जुलाई को रात 9 बजे रेल्वे ने पहली तसल्ली देने वाली सूचना दी कि एक गाड़ी दादर गुवाहटी को निकाला जाएगा। इसके लिए सेना ने पूरी तैयारियां कर लीं थीं। सबसे पहले इंजन में कुछ बोगियां लगाकर 10 किलोमीटर आगे तक ले जाया गया। इसके बाद ट्रेन को 10 किलोमीटर प्रतिघंटा की रफ्तार से चलाया गया। इंजन के चप्पे-चप्पे पर हथियार बंद सेना के जवान तैनात किए गए। इसके बाद हर बोगी में सीआरपीएफ के जवानों को तैनात किया गया। आगे से पीछे तक ट्रेन को पूरी तरह से लॉक करके और खिड़कियां बंद करके चलाया गया। जब तक असम सीमा में ट्रेन रही, तब तक कड़ी सुरक्षा व्यवस्था में पहली ट्रेन को निकाला गया।
किसी ने की मदद तो कहीं उठाया फायदा
गुवाहटी में दंगों का ज्यादा प्रभाव नहीं था, लेकिन कुछ व्यवसाईयों ने फायदा उठाया तो कुछ ने इंसानियत का परिचय भी दिया। जिस प्रिंस होटल का किराया 600 रुपए प्रतिदिन था उसने 1800 रुपए प्रतिदिन लिए। प्लेन का किराया 8 हजार रुपए प्रति यात्री होता है, लेकिन 22 हजार से कम में कोई सीट नहीं मिल रही थी। यानि एयरलाइन ने भी फायदा उठाया। कई लोग पता पूछने के भी रुपए ले रहे थे। हमने स्टेशन का रास्ता पूछा तो 20 रुपए देने पड़े। हालांकि जो लोग असम के मूल निवासी हैं, उन्होंने बहुत मदद की। हमसे कहा-कहीं मत जाओ। गुवाहटी में रहो, कुछ नहीं होगा। हम लोगों को रहते हमारे मेहमानों को कुछ नहीं हो सकता ऐसी आत्मियता की लगता था कि हम भोपाल में ही हैं। भारत विकास परिषद और स्वामी विवेकानंद, आरएसएस सहित सभी राजनैतिक दल के संगठन लाइन लगाकर लोगों को भोजन बांट रहे थे।

दंगा राष्ट्र पर धब्बा
असम में बड़े पैमाने पर जातीय दंगे को राष्ट्र पर धब्बा करार देते हुए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा कि सभी प्रभावित क्षेत्रों के लोगों के बीच सुरक्षा की भावना भरी जानी चाहिए और उन्होंने प्रभावित लोगों के लिए 300 करोड़ रूपए के विशेष राहत पैकेज की घोषणा की है। जातीय दंगे में बाल बाल बचे लोगों का दुख दर्द बांटने के लिए यहां पहुंचने पर सिंह ने कहा कि यह (जातीय हिंसा) नहीं होना चाहिए था। यह हमारे राष्ट्र पर धब्बा है। बोडो जनजाति और प्रवासियों के बीच व्यापक संघर्ष से कई लोग मारे गए हैं और बहुत से लोगों को अपना घर बार छोड़कर शिविरों में शरण लेना पड़ा है। राहत शिविरों में दंगा प्रभावितों से मिलने के बाद सिंह ने कहा, हाल की घटनाओं ने बड़ी संख्या में लोगों को जो दर्द और पीड़ा दी है उससे हम सभी दुखी हैं। जो जातीय संघर्ष संघर्ष हुआ, वह बिल्कुल अस्वीकार्य है और उसे अवश्य ही रूकना चाहिए। प्रधानमंत्री ने कहा कि केंद्र सभी प्रभावित क्षेत्रों में सुरक्षा की भावना पैदा करने के लिए राज्य सरकार के साथ मिलकर काम करेगा ताकि पीड़ित अपने घर लौटें और उन्हें यह मालूम हो कि उनका जीवन और जीविका सुरक्षित है। उन्होंने कहा, हम सब एक जन और एक राष्ट्र हैं तथा हमें इसी तरह एक साथ रहना है। हमें पूरे इलाके में निश्चित तौर पर अमन और शांति बहाल करनी चाहिए और मैं आप सभी से यह सुनिश्चित करने के लिए सरकार के साथ मिलकर काम करने का आव्हान करता हूं।उन्होंने कहा कि यह समय मरहम लगाने का है। सिंह ने छह प्रभावित जिलों के प्रभावित लोगों के राहत एवं पुनर्वास के लिए 100 करोड़ रूपए, प्रभावित क्षेत्रों में विकास कार्यक्रम के लिए विशेष योजना सहायता के रूप में 100 करोड़ रूपए तथा इंदिरा आवास योजना के तहत 100 करोड़ रूपए की घोषणा की। उन्होंने कहा कि उन लोगों को 30-30 हजार रूपए दिए जाएंगे जिनके मकान पूरी तरह नष्ट हो गए हैं। प्रधानमंत्री राहत कोष के तहत उन लोगों को 20-20 हजार रूपए दिए जाएंगे जिनके मकान आंशिक रूप से क्षतिग्रस्त हुए हैं। सिंह ने कहा कि हिंसा में मारे गए लोगों के परिवारों को दो दो लाख रूपए तथा घायलों को 50 हजार रूपए दिए जाएंगे। प्रधानमंत्री ने संघर्ष के कारणों के हल की आवश्यकता पर बल दिया और कहा, यदि संघर्ष की साजिश रची गयी या उसे हवा दी गयी तो दोषी निश्चित रूप से दंडित किए जाएंगे। केंद्र सरकार यह सुनिश्चित करने के लिए राज्य सरकार के साथ मिलकर काम करेगी। उन्होंने कहा कि इन दुखभरी घटनाओं से प्रभावित लोगों के जीवन में सामान्य स्थिति लाने के लिए केंद्र राज्य सरकार के साथ मिलकर काम करेगा। यह एक ऐसा कार्य है जिसे देश में हम सभी को साथ मिलकर पूरा करना चाहिए। सिंह ने कहा, हिंसा को नियंत्रित करने में शुरू में कुछ दिक्कतें आयीं लेकिन केंद्र एवं असम सरकारें स्थिति सामान्य बनाने तथा प्रभावितों को मरहम लगाने के लिए सभी उपाय करेगी। समय की मांग है कि उन लोगों को मरहम लगाया जाए जिन्हें भारी नुकसान हुआ है। यह पूछे जाने पर कि किस कारण से यह समस्या सामने आई, प्रधानमंत्री ने कहा, यह जटिल विषय है और जब स्थिति सामान्य हो जायेगी तब हम स्थिति की समीक्षा करेंगे। उन्होंने कहा कि यह समय एक दूसरे पर अंगुलियां उठाने का नहीं है।