गुरुवार, 9 अगस्त 2012

असम में वो तीन दिन....असम के दंगों की आंखों देखी दास्तां



पता पूछने के भी रुपए मांग रहे थे लोग

1992 के भोपाल दंगों की यादें तो धुंधला चुकीं थीं, लेकिन असम के दंगों ने एक बार फिर इंसानी नफरत की जो तस्वीर दिखाई, वो बड़ी भयावह थी। लोग एक-दूसरे की जान के प्यासे थे। हम लोग कामाख्या के दर्शन के बाद गुवाहटी में बंधक बनकर रह गए। असम पुलिस और सेना के जवानों के मजबूत कंधों ने हमें सुरक्षा का भरोसा दिलाया और फिर गुवाहटी से हमारी सुरक्षित वापसी हो सकी। विदेशियों को शरण देने की नीति ने राष्ट्र के सीने पर ऐसा जख्म लगाया, जिसे कई सालों तक नहीं मिटाया जा सकता। हम आपको बताते हैं असम दंगों की हकीकत और दंगें के समय गुवाहटी में फंसे भोपाल के दर्शनार्थियों के एक दल की (जो कामाख्या देवी के दर्शन के लिए गए थे)आंखों देखी दास्तां बयां करती एक स्पेशल स्टोरी।

प्रमोद त्रिवेदी, भोपाल।
जीवन में वो चार दिन कभी नहीं भूल सकते। हम 10 लोग थे, लेकिन हर एक के मन में डर था। कहीं दंगाई राजधानी की तरफ रूख न कर दें। राजधानी एक्सप्रेस पर पथराव और ट्रेन से लोगों को निकालकर फेंकने की खबर ने परेशानी में इजाफा ही किया था। गुवाहटी के मूल निवासी तो ठीक थे। वो हमें दिलासा देते थे कि सब ठीक हो जाएगा। आप पूरी तरह सुरक्षित हैं। बिहार से काम करने आए बिहारी बाबू भी हम परदेशियों की हालत समझ रहे थे, लेकिन बांग्लादेशियों को तो हम दुश्मन की तरह लग रहे थे। बांग्लादेशी तो हमसे पता पूछने के भी रुपए ले लेते थे। असम दंगों के दौरान गुवाहटी के हालातों को बताते हुए राजेंद्र गुप्ता की हृदय द्रवित हो जाता है। भाजपा झुग्गी झोपड़ी प्रकोष्ठ के जिला संयोजक राजेंद्र गुप्ता कामाख्या देवी के दर्शन के लिए 20 जुलाई को गोवाहटी के लिए रवाना हुए थे। 22 जुलाई को ट्रेन पहुंची और मां कामाख्या के दर्शन भी हुए, लेकिन इसके बाद 23 जुलाई से असम को दंगों की चपेट में ले लिया। इनकी वापसी 24 जुलाई की थी, लेकिन सभी गाड़ियां निरस्त हो गर्इं और ये लोग गुवाहटी में फंसकर रह गए। बमुश्किल 26 जुलाई को सेना ने कड़ी सुरक्षा के बीच दादर-गुवाहटी एक्सप्रेस को असम से निकलवाया, तब जाकर सुरक्षित वापसी हो सकी।

बोडा आदिवासियों के हथियार डालने के बाद तांडव
राजेंद्र गुप्ता बताते हैं कि स्थानीय लोगों से बातचीत के बाद जो हकीकत सामने आई, उसके अनुसार बोडा आदिवासियों के चार नेताओं की हत्या के बाद संघर्ष शुरू हुआ। शुरुआती संघर्ष के बाद बोडा आदिवासियों ने हथियार डाल दिए और संघर्ष रोकने का प्रयास किया। यहीं से दंगों की नींव रखी गई। जब राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी के शपथ समारोह में प्रदेश के मुख्यमंत्री सहित सभी आला अधिकारी दिल्ली रवाना हो चुके थे तो ऐसे समय में बांग्लादेशियों ने बदले की भावना से हमला करना शुरू कर दिया। इसके बाद पहले बोडा आदिवासियों के कत्ल हुए तो बाद में बोडा एकत्रित होकर बांग्लादेशियों के खून के प्यासे हो गए। इसके बाद किसी को नहीं पता था कि मरने वाला कौन है। देश की मीडिया में भले ही मरने वालों की संख्या कम हो, लेकिन स्थानीय मीडिया में मरने वालों की तादात सैकड़ों में थी। कौन किसका घर जला रहा है, इससे किसी को वास्ता नहीं था। बस आंखों में नफरत और बदले की भावना ने पूरे असम को सुलगा दिया।

खून से नहा उठी हरी-भरी वादियां
कमाख्या दर्शन के समय हमारे मन में असम की हरी-भरी वादियों की कल्पना थी। लेकिन असम में जो एक-दूसरे की खून की प्यास और दंगाईयों का तांडव देखा तो मानवता से विश्वास से उठने लगा। दंगें ने हजारों गरीबों को बेघर कर दिया। ऐसे लोगों को बेघर किया जो झोपड़ी बनाने के लिए भी एक-एक पैसा जोड़ते हैं जब तक जाकर उनकी झोपड़ी बन पाती है। ऐसे में बांग्लादेशी और बोडा आदिवासियों का संघर्ष, असम के विकास को दशकों पीछे ले गया।

नेताओं के प्रति नफर
असम में आम आदमी का बस यही कहना था कि जब खुद के लोगों को नहीं बचा सकते थे पड़ोसी देश से आतंकी क्यों आयतित करते हो। बांग्लादेशियों को शरण देना तक तो ठीक था, लेकिन उनको महज राजनीति के लिए हत्याओं का ठेका देना कहां तक उचित था। बोडा आदिवासी अपनी परम्पराओं और गरीबी में भी सूकून से जीवन जी रहे थे। लेकिन राजनीति के लिए शरण देने की नीति ने बोडा आदिवासियों को भी आतंकी बनने पर मजबूर कर दिया। उन्हें अपनी कौम की हिफाजत के लिए आतंकी बनना पड़ा। बोडा आदिवासियों का नेता भी वही बनता है जो ताकत की दम पर अपने लोगों की रक्षा कर सके। ऐसे में हथियार उठाना और हत्याएं करना आम बात हो गई है।

सेना और पुलिस का बेहतर सामंजस्य
भोपाल से गए दर्शनार्थियों के दल ने ऐसे समय पर सेना और पुलिस के व्यवहार की खुले दिल से सराहना की। बताते हैं कि हमारे प्रदेश की पुलिस जहां गाली से शुरू होती है, वहीं असम की पुलिस ने विपरीत परिस्थितियों में भी आपा नहीं खोया। परेशान लोगों के हर सवाल का बड़े इत्मिनान से जबाब देते थे और हर संभव मदद करते थे। सेना ने प्रदेश से बाहरी लोगों को सुरक्षित निकालने के लिए खुद की जान दाव पर लगा दी।
पटरी पर सर्च के बाद निकाली पहली गाड़ी
25 जुलाई को रात 9 बजे रेल्वे ने पहली तसल्ली देने वाली सूचना दी कि एक गाड़ी दादर गुवाहटी को निकाला जाएगा। इसके लिए सेना ने पूरी तैयारियां कर लीं थीं। सबसे पहले इंजन में कुछ बोगियां लगाकर 10 किलोमीटर आगे तक ले जाया गया। इसके बाद ट्रेन को 10 किलोमीटर प्रतिघंटा की रफ्तार से चलाया गया। इंजन के चप्पे-चप्पे पर हथियार बंद सेना के जवान तैनात किए गए। इसके बाद हर बोगी में सीआरपीएफ के जवानों को तैनात किया गया। आगे से पीछे तक ट्रेन को पूरी तरह से लॉक करके और खिड़कियां बंद करके चलाया गया। जब तक असम सीमा में ट्रेन रही, तब तक कड़ी सुरक्षा व्यवस्था में पहली ट्रेन को निकाला गया।
किसी ने की मदद तो कहीं उठाया फायदा
गुवाहटी में दंगों का ज्यादा प्रभाव नहीं था, लेकिन कुछ व्यवसाईयों ने फायदा उठाया तो कुछ ने इंसानियत का परिचय भी दिया। जिस प्रिंस होटल का किराया 600 रुपए प्रतिदिन था उसने 1800 रुपए प्रतिदिन लिए। प्लेन का किराया 8 हजार रुपए प्रति यात्री होता है, लेकिन 22 हजार से कम में कोई सीट नहीं मिल रही थी। यानि एयरलाइन ने भी फायदा उठाया। कई लोग पता पूछने के भी रुपए ले रहे थे। हमने स्टेशन का रास्ता पूछा तो 20 रुपए देने पड़े। हालांकि जो लोग असम के मूल निवासी हैं, उन्होंने बहुत मदद की। हमसे कहा-कहीं मत जाओ। गुवाहटी में रहो, कुछ नहीं होगा। हम लोगों को रहते हमारे मेहमानों को कुछ नहीं हो सकता ऐसी आत्मियता की लगता था कि हम भोपाल में ही हैं। भारत विकास परिषद और स्वामी विवेकानंद, आरएसएस सहित सभी राजनैतिक दल के संगठन लाइन लगाकर लोगों को भोजन बांट रहे थे।

दंगा राष्ट्र पर धब्बा
असम में बड़े पैमाने पर जातीय दंगे को राष्ट्र पर धब्बा करार देते हुए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा कि सभी प्रभावित क्षेत्रों के लोगों के बीच सुरक्षा की भावना भरी जानी चाहिए और उन्होंने प्रभावित लोगों के लिए 300 करोड़ रूपए के विशेष राहत पैकेज की घोषणा की है। जातीय दंगे में बाल बाल बचे लोगों का दुख दर्द बांटने के लिए यहां पहुंचने पर सिंह ने कहा कि यह (जातीय हिंसा) नहीं होना चाहिए था। यह हमारे राष्ट्र पर धब्बा है। बोडो जनजाति और प्रवासियों के बीच व्यापक संघर्ष से कई लोग मारे गए हैं और बहुत से लोगों को अपना घर बार छोड़कर शिविरों में शरण लेना पड़ा है। राहत शिविरों में दंगा प्रभावितों से मिलने के बाद सिंह ने कहा, हाल की घटनाओं ने बड़ी संख्या में लोगों को जो दर्द और पीड़ा दी है उससे हम सभी दुखी हैं। जो जातीय संघर्ष संघर्ष हुआ, वह बिल्कुल अस्वीकार्य है और उसे अवश्य ही रूकना चाहिए। प्रधानमंत्री ने कहा कि केंद्र सभी प्रभावित क्षेत्रों में सुरक्षा की भावना पैदा करने के लिए राज्य सरकार के साथ मिलकर काम करेगा ताकि पीड़ित अपने घर लौटें और उन्हें यह मालूम हो कि उनका जीवन और जीविका सुरक्षित है। उन्होंने कहा, हम सब एक जन और एक राष्ट्र हैं तथा हमें इसी तरह एक साथ रहना है। हमें पूरे इलाके में निश्चित तौर पर अमन और शांति बहाल करनी चाहिए और मैं आप सभी से यह सुनिश्चित करने के लिए सरकार के साथ मिलकर काम करने का आव्हान करता हूं।उन्होंने कहा कि यह समय मरहम लगाने का है। सिंह ने छह प्रभावित जिलों के प्रभावित लोगों के राहत एवं पुनर्वास के लिए 100 करोड़ रूपए, प्रभावित क्षेत्रों में विकास कार्यक्रम के लिए विशेष योजना सहायता के रूप में 100 करोड़ रूपए तथा इंदिरा आवास योजना के तहत 100 करोड़ रूपए की घोषणा की। उन्होंने कहा कि उन लोगों को 30-30 हजार रूपए दिए जाएंगे जिनके मकान पूरी तरह नष्ट हो गए हैं। प्रधानमंत्री राहत कोष के तहत उन लोगों को 20-20 हजार रूपए दिए जाएंगे जिनके मकान आंशिक रूप से क्षतिग्रस्त हुए हैं। सिंह ने कहा कि हिंसा में मारे गए लोगों के परिवारों को दो दो लाख रूपए तथा घायलों को 50 हजार रूपए दिए जाएंगे। प्रधानमंत्री ने संघर्ष के कारणों के हल की आवश्यकता पर बल दिया और कहा, यदि संघर्ष की साजिश रची गयी या उसे हवा दी गयी तो दोषी निश्चित रूप से दंडित किए जाएंगे। केंद्र सरकार यह सुनिश्चित करने के लिए राज्य सरकार के साथ मिलकर काम करेगी। उन्होंने कहा कि इन दुखभरी घटनाओं से प्रभावित लोगों के जीवन में सामान्य स्थिति लाने के लिए केंद्र राज्य सरकार के साथ मिलकर काम करेगा। यह एक ऐसा कार्य है जिसे देश में हम सभी को साथ मिलकर पूरा करना चाहिए। सिंह ने कहा, हिंसा को नियंत्रित करने में शुरू में कुछ दिक्कतें आयीं लेकिन केंद्र एवं असम सरकारें स्थिति सामान्य बनाने तथा प्रभावितों को मरहम लगाने के लिए सभी उपाय करेगी। समय की मांग है कि उन लोगों को मरहम लगाया जाए जिन्हें भारी नुकसान हुआ है। यह पूछे जाने पर कि किस कारण से यह समस्या सामने आई, प्रधानमंत्री ने कहा, यह जटिल विषय है और जब स्थिति सामान्य हो जायेगी तब हम स्थिति की समीक्षा करेंगे। उन्होंने कहा कि यह समय एक दूसरे पर अंगुलियां उठाने का नहीं है।

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