सोमवार, 13 अगस्त 2012

दुर्भाग्य...घोषणा की पहली ट्रेन भी 8 माह बाद चलेगी



 पहली ट्रेन बेंगलुरु एक्सप्रेस
रेल बजट में मध्यप्रदेश को तीन ट्रेनों की सौगात मिली, लेकिन अभी तक एक भी शुरू नहीं हो सकी है। यह घोषणाएं तृणमूल कांगे्रस के कोटे से मंत्री रहे दिनेश त्रिवेदी ने की थी। दिनेश त्रिवेदी ने सामान्य श्रेणी के किराए में कुछ पैसों की बढ़ोतरी की थी, जो जनता को तो रास आई लेकिन तृणमूल की महात्वाकांक्षा को रास नहीं। परिणाम में एक घटिया राजनीतिक घटनाक्रम के चलते रेल मंत्री दिनेश त्रिवेदी को हटाकर ममता बनर्जी के पिठ्ठु मुकुल राय को रेल मंत्रालय के पद से नवाजा गया। ये वही मुकुल राय हैं जो एक ट्रेन दुर्घटना का जायजा लेने गए तो ट्रेन से उतरने के लिए जूतों के नीचे कालीन बिछाई गई। एक दुर्घटना के बाद प्रधानमंत्री के कहने पर भी जायजा लेने नहीं गए। ममता बनर्जी और मुकुल राय के पास रेल मंत्रालय से संबंधित न तो कोई योजना थी और न ही कोई सौगात। मुकुल राय ने ममता के आदेश पर सामान्य श्रेणी की बढोतरी रद्द कर बाकी सब पहले की तरह दिनेश त्रिवेदी की घोषणाओं पर अमल किया। इतना ही नहीं तत्काल टिकिट में आम आदमी की परेशानी दूर करने और दलालों का हस्तक्षेप खत्म करने में भी दिनेश त्रिवेदी की कार्ययोजना ही लागू की गई। लेकिन दिनेश त्रिवेदी की घोषणा वाली ट्रेनों को समय पर नहीं चलाया जा सका। इसका कारण है मुकुल राय की अनुभव हीनता और ममता का अडंगा। ऐसे में जो डबल डेकर जुलाई में शुरू होती, वो जनवरी से पहले शुरू नहीं हो सकती। सब जानते हैं कि अफसर भी मंत्री की ताकत और समझ देखकर काम करते हैं। रेल मंत्रालय भी अपवाद नहीं हो सकता। खैर घोषणा के बाद तो केवल इंतजार ही किया जा सकता है। फिलहाल रेल मंत्रालय में भूतझोलकिया के उच्च पदस्थ सूत्रों का कहना है कि  रेल बजट में मिली तीन ट्रेनों में से सबसे पहले इंदौर-यशवंतपुर (बेंगलुरू) एक्सप्रेस चलाई जाएगी। इसके बाद इंदौर-भोपाल/हबीबगंज डबल डेकर एसी एक्सप्रेस और इंदौर-रीवा एक्सप्रेस का नंबर आएगा। माना जा रहा है कि यदि कोई अड़ंगा नहीं आया तो अक्टूबर या नवंबर तक यशवंतपुर एक्सप्रेस चला दी जाएगी। रेलवे बोर्ड यशवंतपुर एक्सप्रेस के लिए कोच फैक्टरी कपूरथला को रैक बनाने का आॅर्डर दे चुका है। उच्च पदस्थ अधिकारी के अनुसार सबसे पहले इंदौर को यशवंतपुर एक्सप्रेस ट्रेन मिलने की ज्यादा संभावना है। इसके बाद भोपाल/हबीबगंज डबल डेकर एसी एक्सप्रेस और रीवा एक्सप्रेस मिलेगी। यशवंतपुर एक्सप्रेस को एलएचबी रैक से चलाया जाना है। रेलवे बोर्ड के आदेश के बाद रेल कोच फैक्टरी में 19 एलएचबी कोच तैयार किए जा रहे हैं। सितंबर अंत तक रैक तैयार हो जाएगा। फिर रेलवे बोर्ड के निर्देश के बाद कभी भी ट्रेन चलाई जा सकती है। एलएचबी रैक तीव्र गति से दौड़ सकता है। आरामदायक और सुंदर होने के साथ इसके डिब्बे दुर्घटना के दौरान एक-दूसरे पर नहीं चढ़ते।


वकीलों को चाहिए सुरक्षा


खतरनाक अपराधियों की पैरवी करने वाले वकीलों को भी सुरक्षा की दरकार है। मुख्यमंत्री ने वकीलों की पंचायत में वकीलों की सुरक्षा के लिए कानून बनाने के लॉलीपॉप भी दिया है। लेकिन वकीलों के लिए उत्तरप्रदेश की तरह पेंशन योजना और वकीलों के लिए कॉलोनी काटने के लिए जमीन देने की मांग को विनम्रता से ठुकरा दिया। न्यायाधीसों को अपनी दलीलों से संतुष्ट करने वाले और अपनी बात को मनवाने वाले वकील राजनेता के सामने अपनी बात को नहीं रख सके या राजनीति की बिसात पर खरे नहीं उतर सके, ये कोई नहीं बता सका।
 वकील पंचायत में वकीलों से संवाद करते हुए   मुख्यमंत्री  

प्रमोद त्रिवेदी, भोपाल।

संविधान सम्मत बातों को मनवाने में माहिर और दलीलों से छक्के छुड़ाने वाले वकीलों पर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह भारी पड़े। मुख्यमंत्री ने वहीं घोषणाएं की जो उनके नौकरशाहों ने वकील महापंचायत के लिए तैयार कर रखी थीं। वकीलों ने भी पूरे दिमाग का इस्तेमाल करते हुए सरकार के मुखिया की बात पर हां में हां कर दी। राज्य अधिवक्ता परिषद, भाजपा विधि प्रकोष्ठ, हाईकोर्ट और अन्य संघों की पुरजोर मांग पर मुख्यमंत्री ने वकील सुरक्षा कानून लागू करने पर रजामंदी जाहिर की। उन्होंने कहा कि मुकदमे लड़ने वाले वकीलों को कोई छुरी-चाकू मारकर चला जाए यह बर्दाश्त नहीं होगा। इसके लिए कानून मंत्री, प्रमुख सचिव विधि और राज्य अधिवक्ता परिषद के अध्यक्ष को कानूनी पहलूओं का परीक्षण करने के निर्देश मंच से दिए। मुख्यमंत्री ने कहा कि वकालत की तरफ युवाओं को प्रोत्साहित करने सरकार आर्थिक मदद मुहैया कराएगा। इसके लिए स्टेट बार काउंसिल में पंजीयन (सनद) कराने वालों को एकमुश्त 12 हजार रुपए दिए जाएंगे। इससे वह टेबल, कुर्सी सहित अन्य जरूरी सामग्री खरीद सकेगा। इसके साथ ही वकील की मृत्यु होने पर उनके परिजनों को बार काउंसिल के साथ सरकार भी एक लाख रुपए देगी। इलाज में आने वाले खर्च के बोझ से वकीलों को राहत देने के लिए बार कल्याण कोष को एक करोड़ रुपए दिए जाएंगे।
यह घोषणाएं मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने अपने निवास में हुई पहली वकील पंचायत में की। वकीलों से खचाखच भरे मुख्यमंत्री निवास के पांडाल में हुई पंचायत में मुख्यमंत्री ने कहा कि वकील की मृत्यु हो जाने पर पूरा परिवार तकलीफों का सामना करता है। राज्य अधिवक्ता परिषद ऐसे परिवारों को अपनी ओर से एक लाख रुपए देती है। लेकिन, इतने से कुछ नहीं होता है इसलिए तय किया गया है कि सरकार भी अपनी ओर से एक लाख रुपए पीड़ित परिवार को देगी। इसी तरह बड़ी बीमारियों का महंगा इलाज कराना सबके बस की बात नहीं है।

ये रहीं घोषणाएं


  • सनद लेने वालों को एकमुश्त दिए जाएँगे बारह हजार रुपए



  • वकीलों के इलाज के लिए कल्याण कोष को मिलेंगे 1 करोड़



  • नोटरी के लिए न्यूनतम आयु सीमा होगी कम



  • सरकारी वकीलों का बढ़ेगा मानदेय



  • अभिभाषक कक्ष का बिजली बिल चुकाएगी सरकार



  • वकीलों के लिए पुस्तकालय की बनेगी योजना

इन मांगों के साथ निराश लौटे वकील


  • वकीलों की कॉलोनी के लिए भूमि।



  • बुजुर्ग वकीलों के लिए पेंशन।



  • बार काउंसिल अध्यक्ष को मंत्री का दर्जा।



  • ग्वालियर में सीबीआई कोर्ट की स्थापना।



  • टोल टैक्स में छूट।



  • घरों में प्रेक्टिस करने पर कमर्शियल टैक्स में छूट।




संसोधन के साथ आएगा लॉ कमीशन
मुख्यमंत्री ने ऐलान किया कि 10 साल से मरा हुआ पड़ा लॉ कमीशन को फिर से जिंदा किया जाएगा। इसके अध्यक्ष की नियुक्ति जल्द होगी। ये बरसों पुराने कानूनों का अध्ययन करके रिपोर्ट देगा। इसके आधार पर व्यवहारिक संशोधन होंगे।

शनिवार, 11 अगस्त 2012

फिर भी हम हैं हिंदुस्तानी.. 15 अगस्त 2012 विशेष



विशेष सम्पादकीय.....प्रमोद त्रिवेदी


हमारे देश की आजादी को 65 साल पूरे हो गए। यानि पूरी आवाम(बांग्लादेशी शरणार्थियों और आतंकवादियों सहित) 65 साल से आजादी की सांस ले रही है। इसी के साथ ही देश की आजादी और कर्णधारों के कर्मों को कोसने के  भी इतने ही वर्ष हो चुके हैं। मुझे नहीं लगता कि ऐसा भी कोई दिन रहा हो, जब किसी दिन देश के हालात को लेकर नेताओं को न कोसा गया हो। सीधी सी बात है कि लोग आधा खाली गिलास कह रहे हैं। आधा भरा कह देंगे तो उन्हें लगता है कि देश के साथ गद्दारी होगी। खैर ये पुरानी बात हुई। अब हमें नई बात करनी है और वो ये है कि हमें ये देखना है कि तमाम बाधाओं के बाद भी हमारा देश ने क्या नया किया? इस देश में क्या अच्छा है जो विदेशियों के सामने अब भी विश्व गुरू मानने पर विवश करता है। सोचो, यदि चीन जैसे हालात हो जाएं। हमें बोलने के लिए भी इजाजत लेनी पड़े तो हम कहते हैं फिर कैसी आजादी। हमें ऐसे देश और उसके संविधान पर हमें गुमान होना चाहिए, जहां राष्ट्रपति चुनाव के बाद भी हम सर्वोच्च पद पर आसीन होने वाले के खिलाफ बोलते हैं और हमारे खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं होती। किसी दूसरे देश में इतना बोलते ही एक ही सजा मुकर्रर होती और वो है फांसी। ये तो एक उदाहरण है। याद करो जेसीका लाल हत्याकांड या पूर्व डीजीपी राठौड़ का मामला। पूरा देश सर्वोच्च न्यायायिक शक्ति यानि कोर्ट के फैसले के खिलाफ सड़कों पर उतर आता है। हमारे संविधान में न्यायालय के फैसले पर आम आदमी को टिप्पणी का अधिकार नहीं है, लेकिन ये भारत जैसे देश में ही हो सकता है कि लोगों ने कानून तोड़ा फिर भी उनकी बात सुनी गई। लोगों की भावनाओं को देखते हुए दोनों मामलों में देश की जनता की भावना को तरजीह देते हुए फैसले बदले गए। ये हैं स्वतंत्रता के मायने। रही भ्रष्टाचार, भुखमरी, अपराध या आतंकवाद की बात तो पूरे विश्व में एक देश का नाम बताओ जहां ये समस्याएं न हों। नहीं बता सकेंगे तो हमें फिर अहसान फरामोश की तरह अपने देश के उन सपूतों के बलिदान को व्यर्थ नहीं बताना चाहिए जो हमें ऐसी आजादी देने के लिए हंसते-हंसते शहीद हो गए। हमें ऐसा देश विरासत में मिला है जिसकी अच्छाई को गिरवाएं तो उम्र कम पड़ जाए। हम अपने देश को चलाने वाली सरकार को भी अर्श से फर्स पर पहुंचा सकते हैं। ये शक्ति हिंदुस्तान जैसे देश में ही आम आदमी के हाथ में हो सकती है। हम क्यों रोएं, जबकि सब हमारे हाथ में है। गलती कर भी देंगे तो हमारे देश का संविधान हमें बार-बार गलती सुधारने का मौका देता है। हमें नकारात्मक बातों को भुलाकर देश की सकारात्मक ताकत को पहचानना होगा। हमारा देश महान था, है और रहेगा। बस दिल से देश की अच्छाईयों को याद करो और शहीदों की याद सहेज लो। यही देश के प्रति वफादारी होगी और शहीदों को सच्ची श्रद्धांजली।
जय हिंद


स्टाफ खोजते रहोगे सीआईडी में


तीन दशक पहले स्वीकृत स्टाफ से चल रहा काम 
इंट्रो:
संसाधनों के अभाव और उपेक्षा के चलते अपराध अनुसंधान विभाग यानि सीआईडी अस्तित्वहीन होता जा रहा है। सीआईडी की शुरुआत से लेकर इसकी शाखाओं को अलग किया गया, लेकिन बल और संसाधनों में कोई बदलाव नहीं हुआ। जबकि सीआईडी से अलग हुई शाखाएं स्वतंत्र रूप से बल और संसाधनों में सीआईडी से कई गुना आगे निकल गर्इं। सीआईडी में पदस्थ आला अफसरों ने भी अपनी पदस्थापना को लूप लाइन मानकर किसी तरह के बदलाव का प्रयास नहीं किया और ये विभाग केवल विधानसभा के लिए आंकड़ें इकत्रित करने तक सीमित हो गया। फिलहाल सीआईडी के आला अधिकारियों ने सीआईडी को सुदृढ़ बनाने के लिए 1500 कर्मचारियों का बल और वाहन आदि तमाम तरह के संसाधनों की योजना बनाकर शासन को सौंपी है। गृह मंत्रालय ने भी सीआईडी की उपयोगिता को बढ़ाने और मजबूती के लिए हरी झंडी दे दी है। 
प्रमोद त्रिवेदी, भोपाल
तीन दशक पहले अपराधों का ग्राफ कम था और उस ग्राफ के मुकाबले सीआईडी के पास पर्याप्त अमला था। लेकिन समय के साथ अपराधों का ग्राफ बढ़ता गया, लेकिन सीआईडी की उपयोगिता को कम कर दिया गया। अजाक विभाग, एसटीएफ, साइबर क्राइम विभाग, स्टेट क्राइम रिकार्ड ब्यूरो को सीआईडी से अलग कर स्वतंत्र विभाग बना दिए गए। इन स्वतंत्र बनाए गए विभागों को हर तरह की सुविधा और अमला दिया गया, लेकिन सीआईडी तीन दशक पुराने अमले से ही काम चला रहा है। पिछले दो दशक से सीआईडी का काम केवल विधानसभा सत्र के लिए जानकारी उपलब्ध कराना और कुछ राजनीतिक मामलों की जांच करना सीमित हो गया है। संसाधनों के अभाव में अफसर भी सीआईडी में पदस्थापना को लूप लाइन समझने लगे और विभाग की दशा सुधारने में रुचि नहीं ली। परिणाम में सीआईडी का स्तर दिनों-दिन गिरता गया। सीआईडी के हालत इतने बदतर हैं कि किसी इंवेस्टीगेशन के लिए इंस्पेक्टर स्तर तक के कर्मचारियों पर कोई वाहन नहीं हैं। वहीं एसपी, डीआईजी को भी घटिया स्तर के वाहन दिए गए हैं। परिणाम में सीआईडी का नेटवर्क भी खत्म होता गया और कई आपराधिक घटनाओं के मामले में अन्य प्रदेशों के खुफिया विभाग को जानकारी हो गई, लेकिन प्रदेश में सीआईडी को कानों-कान खबर नहीं हुई। बरहहाल अब अधिकारियों ने सीआईडी के स्वरूप बदलने की दिशा में प्रयास तेज कर दिए हैं। सीआईडी की उपयोगिता को समझते हुए गृह विभाग ने भी सीआईडी की योजना को अमली जामा पहनाने के लिए स्वीकृति देने का मन बना लिया है।
00समय निकाला और चले गए
करीबन तीन दशकों से भी ज्यादा समय से संसाधनों और अमले के लिए जूझ रहे सीआईडी की दशा सुधारने की किसी ने कोशिश नहीं की। जो भी अधिकारी आए, वो लूपलाइन समझकर नौकरी करते रहे और चले गए। समझा जा सकता है कि तीन दशक में पहली बार एडीजी ने सीआईडी को मजबूत करने के लिए योजना बनाई। ऐसी स्थिति के चलते सीआईडी से अलग हुर्इं एसटीएफ जैसी सेल तो मजबूत होती गर्इं, लेकिन सीआईडी कमजोर। शाखाआें ने स्वतंत्र रूप से अपना अस्तित्व बनाया, लेकिन सीआईडी केवल आंकड़े एकट्ठा करने वाली विंग बनकर रह गई। यही कारण है कि पिछले कई सालों में सीआईडी के नाम कोई उपलब्धि नहीं है, जिसमें किसी भी मामले में सीआईडी ने सराहनीय कार्य किया हो। सीआईडी के जिला मुख्यालयों पर भी इंस्पेक्टर तैनात हैं, लेकिन वे केवल मुख्यालय को आंकड़े भेजने का काम करते हैं। वाहन आदि संसाधनों के अभाव में उनका नेटवर्क भी खत्म हो गया है।
00ये होगा बदलाव!
सीआईडी में फिलहाल कुल स्टाफ की संख्या 300 है। एडीजी सीआईडी ने विभाग का काम बढ़ाने और मजबूती के लिए अतिरिक्त 1500 का स्टॉफ मांगा है। इसमें डीएसपी स्तर के अधिकारियों की संख्या ज्यादा है, जो क्राइम इंवेस्टीगेशन में माहिर होंगे। इसके अलावा विभाग को तकनीकि रूप से सक्षम बनाने के लिए उपकरण और हथियार भी योजना में शामिल हैं। सीआईडी के पास वाहन नहीं हैं। योजना में इंस्पेक्टर लेबल से लेकर उच्च अधिकारियों के लिए अच्छे वाहन उपलब्ध होंगे। फील्ड में काम करने पर अफसरों का मनोबल बढ़ेगा और सफलता मिलने पर सराहना भी मिलेगी।
00सीआईडी में बनेगी स्पेशल इंवेस्टीगेशन सेल
सीआईडी में अमला मिलने के बाद कई स्पेशल विंग बनेगी। इसमें स्पेशल इंस्वेस्टीगेशन विंग भी होगी, जिसमें चुनिंदा अधिकारी काम करेंगे। ये अंधे कत्ल से लेकर व्हाइट कालर क्रिमिनल और आर्थिक क्राइम पर नकेल कसने का काम करेंगे।
00अंधे कत्ल के लिए कोई विंग नहीं
फिलहाल प्रदेश में अंधे कत्लों को सुलझाने के लिए कोई स्पेशल सेल नहीं है। ऐसे में हर साल कई अंधे कत्लों के अपराधी पकड़े नहीं जाते हैं। थाने के पास सुरक्षा व्यवस्था का इतना बोझ होता है कि वे पुराने केस और अंधे कत्ल पर काम नहीं कर पाते हैं। ऐसे में सीआईडी में अंधे कत्लों को सुलझाने के लिए एक विंग बनाने की दिशा में कार्ययोजना बनाई गई है।
00वर्सन
विभाग की जरूरतों और संसाधनों के साथ क्राइम इंवेस्टीगेशन विंग की मजबूत करने के लिए काम शुरु हो गया है। सीआईडी को मजबूत बनाने के लिए योजना बनाकर डीजीपी और गृह विभाग को सौंपी गई है। उच्चाधिकारियों और गृह विभाग का रूख सकारात्मक है और हमारी योजना से सहमत होते हुए सभी सहयोग कर रहे हैं। पहले पदस्थ रहे अधिकारियों के योजना नहीं बनाने पर जबाब देना मुश्किल है। फिलहाल सीआईडी का नेटवर्क मजबूत करने और हर जिले में वाहन और स्टाफ तैनात करने की योजना बनाई गई है। हर बड़े अपराध पर सीआईडी अफसर भी स्वतंत्र रूप से जांच करेंगे। इससे थानों पर बोझ भी कम होगा और क्राइम कंट्रोल करने में मदद मिलेगी। शीघ्र ही योजना पर काम शुरु होने की उम्मीद है।
एमआर कृष्णा, एडीजी, सीआईडी



00फैक्ट फाइल

  • सीआईडी में कुल अधिकारी-कर्मचारियों की संख्या लगभग 300 है। सीआईडी को प्रदेश में सुदृढ़ बनाने के लिए कम से कम 1500 कर्मचारी-अधिकारियों का स्टाफ चाहिए।
  • वर्तमान में सीआईडी में पदस्थ इंस्पेक्टरों के पास विभाग का कोई वाहन नहीं है। इसके अलावा डीएसपी लेवल से लेकर उच्च अधिकारियों के पास भी सीमित संसाधन हैं। जबकि पुलिस विभाग की अन्य शाखाओं में समान कैडर के अधिकारियों के पास भरपूर सुविधा है। सीआईडी इंस्पेक्टर विवेचना के दौरान निजी वाहन का इस्तेमाल करते हैं।
  • 1976 में सीआईडी की शुरुआत से लेकर स्वीकृत बल में कोई बढ़ोतरी नहीं हुई। जबकि जनसंख्या से लेकर क्राइम में करीबन 400 फीसदी की बढ़ोतरी हो चुकी है।
  • सीआईडी की शुरुआत से लेकर वर्तमान तक सीआईडी की शाखाओं में कोई वृद्धि नहीं हुई, बल्कि इसकी शाखाओं को काटकर अन्य शाखाएं बना दी गर्इं। सीआईडी की शाखाओं को स्वतंत्र रूप से तमाम संसाधन मुहैया कराए गए, लेकिन सीआईडी की हालत में कोई बदलाव नहीं आया।
  • शुरुआत में सीआईडी में आईजी विभाग प्रमुख थे। इसके बाद एडीजी को नियुक्त किया गया, लेकिन किसी भी अधिकारी ने सीआईडी को सुदृढ़ बनाने प्रभावी कदम नहीं उठाए। अधिकांश अधिकारी ने सीआईडी प्रमुख के पद को लूप लाइन समझा और नौकरी का समय निकाला। किसी भी अधिकारी ने लिखित तौर पर कोई योजना नहीं बनाई। योजना बनाने और डीजीपी से लेकर शासन को भेजने के कोई भी दस्तावेज सीआईडी के पास नहीं होना इस बात का प्रमाण है।
  • विधानसभा के सभी सत्रों में जानकारी का जिम्मा सीआईडी विभाग के पास होता है। विभाग का तमाम अमला विधानसभा के लिए जानकारी एकत्रित करने और भेजने में लग जाता है। इसमें हर साल सीआईडी विभाग के तकरीबन 9 माह लग जाते हैं। इस मान से केवल 3 महीने सीआईडी को क्राइम इंस्वेटीगेशन में मिलते हैं।
  • किसी भी अपराध की जानकारी मिलने पर थाना प्रभारी, उच्च अधिकारियों को जानकारी देता है लेकिन सीआईडी को तत्काल जानकारी देने का कोई नियम नहीं है। ऐसे में सीआईडी अधिकारी मौके पर नहीं पहुंच पाते और सीआईडी को जांच सौंपी जाती है तब तक सबूत मिट चुके होते हैं।
  • साइबर क्राइम विभाग, स्टेट क्राइम रिकार्ड ब्यूरो, एसटीएफ, नारकोटिक्स सेल, आदिमजाति कल्याण पहले सीआईडी में शामिल थे। बाद में इनको सीआईडी से अलग करके स्वतंत्र विभाग बना दिए गए। इन तमाम विभागों की संरचना और संसाधन बहुत बेहतर हैं, जबकि सीआईडी की स्थिति नहीं बदली।

उच्च शिक्षा में कीर्तिमान....एक क्लिक और मिल जाता है प्रवेश



  • पारदर्शी शिक्षा के लिए आॅन लाइन प्रवेश प्रक्रिया

प्रमोद त्रिवेदी


मध्यप्रदेश के हर वर्ग के विद्यार्थी को शिक्षा मिले और उसे महाविद्यालयों की मनमानी से जूझना न पड़े। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने अपने विद्यालयीन समय के अनुभवों के आधार पर विद्यार्थियों को ई प्रवेश यानि आॅन लाइन एडमीशन की सौगात देने का बीड़ा उठाया। इस कार्य में उनके उद्देश्य में सहभागी बने उच्चशिक्षा मंत्री लक्ष्मीकांत शर्मा। नतीजन आज पूरे भारत में मध्यप्रदेश ऐसा पहला राज्य है जहां एक क्लिक पर 24 घंटे कभी भी छात्र को 9 कॉलेजों में एडमीशन के लिए चयन करने का अधिकार मिल गया है। 

भोपाल। मध्यप्रदेश सरकार ने उच्च शिक्षा में प्रवेश के लिए भटकते विद्यार्थिओं और उनके परिजनों का दर्द बड़े नजदीक से महसूस किया। उन्होंने उच्च शिक्षा के लिए विद्यार्थियों की सुविधा के लिए ऐसा ऐतिहासिक कदम उठाया जो कि पूरे देश के लिए मिशाल बन गया। लम्बी लाइनों में लगने और एडमीशन के लिए कॉलेजों के चक्कर काटने से लेकर सीटों की स्थिति जानने का बेहद जटिल काम पर पूरी तरह विराम लग गया। घर बैठे चौबीसों घंटें कभी भी विद्यार्थी आॅन लाइन आवेदन कर सकता है। उसे प्रवेश के लिए 9 कॉलेजों में से चुनने की सुविधा मिल गई। आॅन लाइन कॉलेजों की सीटों और कोर्स की जानकारी भी मिल रही है। कहीं कोई गड़बड़ नहीं। सब कुछ आंखों के सामने। ऐसी पारदर्शिता कि विद्यार्थियों को स्वर्णिम भविष्य सपना न लगे बल्कि हकीकत में तब्दील होता दिखे। मुख्यमंत्री के इस प्रयास में उच्च शिक्षा विभाग के तमाम अफसरों ने खुद उच्च शिक्षा मंत्री लक्ष्मीकांत शर्मा की मॉनिटरिंग में कार्य किया और नतीजा आॅन लाइन एडमीशन की सहूलियत के साथ सामने है।

ई प्रवेश ने किया प्रवेश आसान

  • विद्यार्थियों की सुविधा और बेहतर पारदर्शिता के लिए 2012-13 में मध्यप्रदेश के महाविद्यालयों में प्रवेश के लिए आॅनलाइन प्रवेश प्रक्रिया को अपनाया जा रहा है। इस व्यवस्था को लागू करने वाला मध्यप्रदेश देश का पहला राज्य है।
  • आॅन लाइन से विभिन्न महाविद्यालयों के पाठ्यक्रमों की जानकारी एक क्लिक पर उपलब्ध हो रही है। विद्यार्थिओं और अभिभावकों को अलग-अलग महाविद्यालय में आवेदन करने की परेशानी से मुक्ति मिली है।
  • इस प्रक्रिया से सभी को प्रवेश के समान अवसर मिले और प्रवेश प्रक्रिया भी पूरी तरह पारदर्शी हो गई।
  • इससे घर बैठे विद्यार्थियों को 24 घंटे प्रवेश की सुविधा मिली।
  • केवल 50 रुपए प्रति महाविद्यालय शुल्क पर विद्यार्थियों को 9 महाविद्यालयों में प्रवेश के लिए चयन करने का अवसर मिला।

पहले उच्च शिक्षा में सेमेस्टर सिस्टम की सौगात
 महाविद्यालयीन परीक्षाओं में गड़बड़ी ,अध्ययन के लिए कालेजों में सुविधाओं से जूझते विद्यार्थी। यह सब बीते दिनों की बात हो गई है। अब महाविद्यालय सरकारी हो या निजी। उच्च शिक्षा के क्षेत्र में लागू सेमेस्टर पद्धति ने अध्ययन व अध्यापन दोनों की दशा व दिशा में व्यापक बदलाव किया है। दैनिक हाजिरी ,प्रायोगिक शिक्षा पर जोर व साल में दो बार परीक्षा से न केवल महाविद्यालयों में छात्रों की उपस्थिति बढ़ी बल्कि उन्हें अध्ययन नोट्स,प्रेक्टिकल फाइल्स तैयार करने के लिए बाध्य होना पड़ा। शैक्षणिक कैलेण्डर के अनुसार तय समय में पाठ्यक्रम पूरा करने की बाध्यता ने महाविद्यालयों में पढ़ाई के प्रति रुझान पैदा किया। बिगड़ी हुई व्यवस्था में सुधार कर इसे नए सांचे में ढालना आसान नहीं है,लेकिन राज्य शासन के मजबूत इरादे से उच्च शिक्षा में यह बदलाव संभव हुआ। इसका श्रेय पूरी तरह मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और उच्च शिक्षा मंत्री लक्ष्मीकांत शर्मा को जाता है जिन्होंने सेमेस्टर सिस्टम को लागू करने में कोई कसर बाकी नहीं रखी।
हजार करोड़ की नई योजना
 उच्च शिक्षा के क्षेत्र में और अधिक सुधार के लिए राज्य सरकार अब विश्व बैंक की मदद से नई सुधार योजना लागू करने की तैयारी में है। इस पर एक हजार करोड़ रुपए खर्च होगें। यह पहला मौका है जब उच्च शिक्षा में अधोसंरचना विकास पर इतनी बड़ी राशि व्यय करने का निर्णय लिया गया। बताया जाता है कि विश्व बैंक ने भी इस मामले में अपनी सैद्धांतिक सहमति दे दी। आर्थिक सहायता संबंधी औपचारिकताओं की पूर्ति के लिए  दो बार उच्च स्तरीय बैठके भी हुर्इं। इस राशि से प्रस्तावित दस नए महाविद्यालयों समेत सभी 24 भवन विहीन कालेजों के लिए भवन व छात्रावास तैयार किए जाएंगे। यही नहीं चुनिंदा महाविद्यालयों में राष्ट्रीय स्तर का पुस्तकालय व प्रयोगशालाओं की भी स्थापना होगी।
संशोधित अधिनियम यानि नया आयाम
 शिक्षा व्यवस्था में और अधिक सुधार के लिए राज्य शासन विश्वविद्यालय अधिनियम में संशोधन करने की तैयारी में भी है। नई व्यवस्था के तहत शिक्षा सत्र एक जुलाई से अनिवार्य रूप से शुरू करने, प्राचार्यों के रिक्त पदों की पूर्ति, सेमेस्टर पद्धति को और अधिक मजबूत बनाना, शोध के लिए बजट की अतिरिक्त व्यवस्था, शिक्षा ऋण गारंटी योजना का सरलीकरण, प्रतिभावान व अभावग्रस्त विद्यार्थियों की मदद के लिए पचास करोड़ रुपए की निधि की स्थापना ,जिला स्तर के सभी आईटीआई को आदर्श संस्थान बनाना, आदिवासी बहुल क्षेत्र झाबुआ,शहडोल व नौगांव में नए इंजीनियरिंग कालेजों की स्थापना आदि कार्य शामिल हैं।