रविवार, 17 अगस्त 2014

साध्‍वी प्रज्ञा को लेकर यौन आकर्षण के चलते हुई संघ प्रचारक सुनील जोशी की हत्‍या


आरएसएस प्रचारक सुनील जोशी की 2007 में हुई हत्‍या की जांच कर रही राष्‍ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) ने मामले में सनसनीखेज खुलासा किया है। एनआईए का कहना है कि जोशी की हत्‍या की एक वजह साध्‍वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर के प्रति उनका यौन आकर्षण हो सकता है। अंग्रेजी अखबार इंडियन एक्‍सप्रेस ने इस बारे में रिपोर्ट छापी है। रिपोर्ट के मुताबिक, जांच एजेंसी मामले में अगले हफ्ते चार्जशीट दाखिल करने वाली है और इसमें साध्‍वी का नाम बतौर आरोपी शामिल किया जा सकता है। मध्‍य प्रदेश की देवास पुलिस बतौर आरोपी इस मामले में साध्‍वी का नाम पहले ही दर्ज कर चुकी है। प्रज्ञा ठाकुर 2008 के मालेगांव बम धमाकों की भी आरोपी हैं।
 
जोशी को लेकर चिंतित थीं प्रज्ञा
एनआईए का दावा है कि जोशी का प्रज्ञा ठाकुर के प्रति यौन आकर्षण था और यह उनकी हत्‍या का एक वजह बना। उधर, प्रज्ञा को इस बात की चिंता थी कि आतंकवादी वारदात को अंजाम देने की लिए जो योजनाएं बनाई गई थीं, कहीं जोशी उनका खुलासा कर सकते थे। एनआईए मामले में जो चार्टशीट दाखिल करने वाली है उसमें इस बात का जिक्र हो सकता है कि अजमेर ब्‍लास्‍ट के बारे में जोशी द्वारा जानकारियों को सार्वजनिक करने से रोकने के लिए प्रज्ञा ने आनंदराज कटारिया को करीब 10 दिनों तक अपने घर में रखा था। गौरतलब है कि देवास पुलिस ने कटारिया को आरोपी बनाया था, लेकिन जोशी मर्डर मामले में एनआईए की अंतिम लिस्‍ट में उनका नाम शामिल नहीं किया गया था।
 
पांच लोगों को आरोपी बनाएगी एनआईए
जोशी मर्डर केस की जांच में 2011 के बाद तब बदलाव आया जब मालेगांव ब्‍लास्‍ट मामले में मध्‍य प्रदेश के महू में कुछ गिरफ्तारियां हुईं और देवास पुलिस ने पहली चार्जशीट दाखिल की। एनआईए गिरफ्तार किए गए चार लोगों- राजेंद्र चौधरी, लोकेश शर्मा, जीतेंद्र शर्मा (भारतीय जनता युवा मोर्चा के नेता) और बलबीर सिंह को अब प्रज्ञा ठाकुर के साथ जोशी हत्‍याकांड मामले में आरोपी बनाएगी। जांच एजेंसी का दावा है कि राजेंद्र और लोकेश ने ही 29 दिसंबर 2007 की रात जोशी का कत्‍ल किया था। जीतेंद्र शर्मा ने इसके लिए पिस्‍तौल मुहैया कराई थी और बलबीर सिंह ने इसे छिपाया था।
 
रची जा रही थी हमले की साजिश
एनआई का यह भी दावा है कि लोकेश, राजेंद्र और जोशी एक बड़ी साजिश रच रहे थे और मुसलमानों को निशाना बनाकर ज्‍यादा से ज्‍यादा हमले करने की फिराक में थे।
संघ प्रचारक सुनील जोशी की हत्‍या 29 दिसंबर 2007 को कर दी गई थी।
 
सुनील जोशी आरएसएस के प्रचारक थे। जोशी पर समझौता एक्‍सप्रेस, मक्‍का मस्जिद और मालेगांव सहित करीब आठ बम धमाकों को अंजाम देने का आरोप था। मध्‍य प्रदेश के देवास में 29 दिसंबर 2007 की रात कथित तौर पर हिंदू संगठनों से जुड़े अपने ही लोगों ने उनकी हत्‍या कर दी थी। समझौता एक्‍सप्रेस बम धमाकों के आरोपी स्‍वामी असीमानंद के हवाले से मामले की जांच कर रही राष्‍ट्रीय जांच एजेंसी ने कहा था कि इस ट्रेन ब्‍लास्‍ट को अंजाम देने में जोशी की अहम भूमिका थी। राजस्थान एटीएस के मुताबिक सुनील जोशी अजमेर धमाकों के प्रमुख सूत्रधार थे और वह इन धमाकों के आरोप में गिरफ़्तार स्वामी असीमानंद के सतत संपर्क में थे।
 
जोशी पर यह भी आरोप थे कि उन्‍हें बम बनाने में महारत हासिल थी और वह एक खतरनाक अपराधी थे। रिपोर्टों के मुताबिक, उन पर दोहरे हत्‍याकांड का आरोप था, लेकिन सरकारी संरक्षण की वजह से वह बचते रहे। उनका नाम सबसे पहले क‍थित तौर पर 2003 में इंदौर के निनामा हत्याकांड में आया था। गौरतलब है कि कांग्रेस नेता प्यार सिंह निनामा और उनके भतीजे दिनेश निनामा की इंदौर जिले के मानपुर खुर्दी स्थित उनके घर में कर दी गई थी। तब जोशी के खिलाफ गिरफ्तारी का वारंट भी निकला था।

शनिवार, 16 अगस्त 2014

क्षत्रपों का किला ममता शक्ति के सामने विध्वंश

 15 अगस्त विशेष

दिग्गी के अभेद किले को एक वार में किया नेस्तानाबूद
क्षत्रपों को खूब लड़ी मर्दानी की तर्ज पर चटाई धूल
राजगढ़ लोकसभा में चाचौंड़ा विधायक ममता मीणा ने भारी जीत दर्ज करके बनाया इतिहास

भोपाल।
बेशक 15 अगस्त के दिन हम आजाद हुए थे, लेकिन 1947 से अब तक महिला सशक्तिकरण के प्रयास किए जा रहे हैं। महिलाओं को अब तक कमजोर माना जाता है तो ऐसे में कुछ ऐसी महिलाएं भी रहीं हैं, जो केवल अपनी शक्ति और सामर्थ के कारण पहचान बना चुकीं हैं। इसी लिए आजादी की इस बेला पर हम ऐसी ही महिला की बात करेंगे, जिनने सही मायनों में रजबाड़ों के शासन का अंत कर दिया और तमाम कयासों को दरकिनार करते हुए जनता का राज कायम किया।
जहां छोटे राजा और बड़े राजा की तूती बोलती हो। विरोधी उम्मीदवार में इन क्षत्रपों का डर सिर चढ़कर बोलता हो। यहां तक कि विरोधी उम्मीदवारों को हाथ पकड़कर पोलिंग बूथ से बाहर निकाल देते हों। जब पूरे प्रदेश में उमा भारती की लहर चल रही थी, तब भी इस विधानसभा में भगवा नहीं लहरा सका था। जीहां, हम उस विधानसभा की बात कर रहे हैं जहां से कांग्रेज अजेय रही है। इसकी विधानसभा की सीमा पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के गृह नगर राघौगढ़ से सटी है। इस विधानसभा के बारे में कहा जाता था कि राजा अपने किसी भी कारिंदे को खड़ा कर दें, जीत निश्चित होती थी। ऐसी तमाम कहानियां चौपालों पर रोज सुनने मिलती थीं। लेकिन किसी ने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि एक महिला झांसी की रानी की तर्ज पर चुनावी रण में शौर्य दिखाते हुए क्षत्रपों के गढ़ को पूरी तरह विध्वंस कर देगी। उस महिला का नाम है श्रीमती ममता रघुवीर सिंह मीणा। एक किसान की बेटी ने तमाम कयासों को दरकिनार करते हुए ऐतिहासिक मतो से इस विधानसभा से जीत हासिल की। जहां से मुख्यमंत्री रहते दिग्विजय सिंह लगभग 20 हजार मतों से जीत सके थे, उस विधानसभा से इस किसान की बेटी ने 34901 मतों से विरोधी को शिकस्त दी। संभवत: कई दशकों में इतने भारी मतो से जीतने वाली ये इकलौती उम्मीदवार थीं। यहां बता दें कि यहां पहले बेशक जातीय समीकरण हावी रहते हों, लेकिन इस चुनाव में जातीय समीकरण की कोई जगह नहीं थी। क्योंकि कांग्रेस से जो उम्मीदवार थे वो कांग्रेस के कद्दावर विधायक शिवनारायण मीणा थे। अपने विरोधी से लगभग दोगुने मत प्राप्त करने वाली ममता मीणा ने हर मोर्चे पर कांग्रेस को शिकस्त दी।

-कभी महिला को नहीं मिली कमान
कांग्रेस हो या भाजपा। कभी भी किसी पार्टी ने महिला को कमान सौंपने की हिम्मत नहीं दिखाई थी। 2008 के चुनाव में पहली बार भाजपा ने ममता मीणा को टिकट दिया। यहां बता दें कि भाजपा ने भी न तो उनका राजतिलक किया था और न ही उनके पुरखों की राजनीतिक विरासत का उत्तराधिकारी बनाया था। बल्कि जिला पंचायत चुनाव में निर्दलीय अध्यक्ष बनने की कुव्वत को देखते हुए ममता मीणा को टिकिट दिया था। ममता मीणा के पहले चाचौंड़ा विधानसभा सीट पर भाजपा उम्मीदवार की हालत खासी खराब रहती थी। उम्मीदवार न तो धन बल से टिक पाता था और न ही बाहूबल से। वहीं किले की राजनीति के कारण पहले से ही उम्मीदवार की हालत खस्ता होती थी। ये सच है कि घर के विरोधियों की चालें सही से न समझने के कारण इन्हें मामूली अंतर से 2008 में परायज मिली थी, लेकिन शिकस्त के बाद एक खूंखार घायल योद्धा की तरह इनने 2013 में वापसी की। इनके शौर्य के आगे न तो भिरतघाती टिक सके और न ही विरोधी।

-लक्ष्मीबाई के बाद फिर मिली महिला से मात
इतिहास गवाह है कि लक्ष्मीबाई से ग्वालियर महाराजा को युद्ध में घूल चटा दी थी। उस समय अंग्रेजों के सहारे से भले ही उन्हें ग्वालियर का शासन मिला हो, लेकिन एक महिला की शक्ति के कारण उन्हें भागना पड़ा था। उसी इतिहास को ममता मीणा ने दोहराया था जिला पंचायत चुनाव के समय। जिला पंचायत अध्यक्ष बनने में भी इनने राजा-महाराजा के तमाम समीकरण फेल कर दिए थे। कांग्रेस के जिला पंचायत सदस्यों की संख्या अध्यक्ष बनने के लिए पर्याप्त थी। इन सदस्यों में कुछ राजा केे समर्थक थे तो कुछ ग्वालियर महाराजा के। लेकिन राजा-महाराजा की रस्साकस्सी में अपने राजनीतिक कौशल और नेतृत्व क्षमता दिखाते हुए इस किसान की बेटी ने अध्यक्ष पद पर कब्जा जमाया और सफलता पूर्वक 5 साल तक किसानों की तकलीफ को दूर किया।

-शुरूआत से ही तीखे तेवर
जहां ममता मीणा के सामने राजनीति के चाणक्य और गुरू कहे जाने वाले राजनीतिज्ञ थे तो ममता मीणा ने राजनीति में कदम रखा था। न तो अनुभव और न ही उम्र। लेकिन धुरंधर को हमेशा मुंह की खानी पड़ी। कारण राजनीति की चालों की भले ही पूरी समझ न हो, लेकिन महिला के अंदर जो दूसरे के दुखों को दूर करने की क्षमता होती है वो शुरू से ही थी। उन्हें राजनीति नहीं करना थी, लोगों को क्षत्रपों के आतंक और पक्षपात से मुक्त करवाना था। न किसी का डर था और न मन में पद का लालच। ये अलग बात है कि बिना शक्ति के तो ईश्वर भी रक्षा नहीं कर सकते। तभी जिला पंचायत के बाद विधानसभा में तमाम पासें पलट दिए।
(श्री प्रमोद त्रिवेदी के ब्लॉग भूतझोलकिया से साभार)

दादा का विकल्प कहां से मिलेगा?

 *कांग्रेस-भाजपा के पास नहीं है संजय जगताप का विकल्प


नगर पालिका के चुनाव नजदीक हैं। ऐसे में कांग्रेस हो या भाजपा, जीतने वाले उम्मीदवारों पर चर्चा होना और उनमें जीतने की संभावनाएं तलाशना लाजमी है। हो सकता है कि समाचार प्रकाशित होने तक आरक्षण हो जाए और समीकरण बदल जाएं, लेकिन एक  बात तो तय है। वो है कांग्रेस और भाजपा के लिए सबसे बड़ी चुनौती है दत्तु भैया का परिवार। इतिहास गवाह है चाहे दिग्विजय सिंह का प्रभाव रहा हो या भगवा गढ़, दत्तु भैया परिवार के सामने हमेशा चारों खाने चित्त हुआ है। कुछ दशकों पहले दत्तु भैया ने ताल ठोंककर निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर विजय हासिल की थी तो पिछले चुनाव में उनकी बहू श्रीमती सुनंदा संजय जगताप ने कांग्रेस-भाजपा के तमाम समीकरण उलट कर रख दिए थे। ऐसे में प्रदेश में सत्ताधारी भाजपा के पास अपनी साख बचाने का एक ही विकल्प है संजय जगताप यानि दादा की ससम्मान घर वापसी। ऐसा नहीं है कि भाजपा के पास उम्मीदवारों को टोटा हो, लेकिन दादा के सामने नगर पालिका चुनाव जीतने की ताकत किसी भी उम्मीदवार या मोदी-शिवराज फैक्टर में नहीं दिखती। इसका कारण ऐसा नहीं है कि दत्तु भैया का परिवार किसी राज घराने से संबंध रखता हो या किसी दूसरी दुनिया से आया हो। इसका कारण है राजनीतिक ईमानदारी और नेतृत्व की अपार क्षमता। नेतृत्व से तात्पर्य केवल अपने दल के लोगों से नहीं वरन् आम आदमी को साथ लेकर चलने से है। यही कारण है कि नगरपालिका के 18 वार्डों में भले ही 8 पार्षद कांग्रेस के हों, लेकिन क्षेत्र के विकास में दादा ने कभी बदले की भावना से काम नहीं किया। इतना ही नहीं एक परिवार के मुखिया की तरह राजनीतिक विरोधियों की गलतियों को भी दादा ने हमेशा नजरअंदाज किया। यही कारण है कि प्रदेश सहित राजगढ़-ब्यावरा में भी भगवा फहरा रहा है लेकिन ब्यावरा नगरपालिका अध्यक्ष की कुर्सी केे लिए राजधानी में बैठे शीर्ष नेतृत्व के पास भी विकल्प नजर नहीं आ रहा है।

-भाजपा के पास विकल्प
भाजपा और दत्तु भैया के परिवार का पुराना नाता है। दत्तु भैया के खून में भाजपा और भगवा बसते हैं। ये अलग बात है कि राजनीतिक भेदभाव के कारण इन्होंने पार्टी छोड़ी, लेकिन ये भी सच है कि एक बुलावे पर इनकी घर वापिसी भी हुई। ऐसे में अगर व्यक्तिगत रंजिश को भुला दिया जाए तो भाजपा के पास संजय जगताप से बेहतर विकल्प नहीं है। सबसे बड़ी बात भाजपा के नेता इनसे भितरघात करेंगे तो भी नुकसान नहीं पहुंचा पाएंगें। लेकिन भाजपा और दादा के बीच सेतू का काम कौन करेगा? संगठन के पदाधिकारी और आरएसएस के लोग अगर ईमानदारी से चाहेंगे तो दादा की घर वापिसी संभव है।

कांग्रेस क्या कर सकती है?
अगर ब्यावरा नगरपालिका की बात की जा रही है तो स्वाभिक तौर पर कांग्रेस उम्मीदवार की बात भी करना उचित होगा। राजा का गढ़ टूट चुका है। कांग्रेस की स्थिति बेहतर भी नहीं कही जा सकती। लेकिन फिर भी कुछ उम्मीदवार ऐसे हैं जिनका पुराना रिकार्ड बेहतर रहा है। इसमें पूर्व अध्यक्ष दिलीप शिवहरे ही ऐसे उम्मीदवार हैं जो बहुत कम मतों से पराजित हुए। हलांकि कांग्रेसी खेमे की गुटबाजी उन्हें चित्त करती रही है। दिलीप शिवहरे कहते हैं कि व्यक्तिगत तौर पर संजय दादा मेरे बहुत अच्छे मित्र हैं। राजनीतिक तौर पर अगर चुनाव में मौका मिलता है तो कड़ा लेकर स्वच्छ मुकाबला होगा। किसी भी उम्मीदवार से व्यक्तिगत रंजिश नहीं होती। चुनावी मैदान के बाद सभी पारिवारिक सदस्य होते हैं।

कमजोरी भी है दादा में 
ऐसा नहीं है कि दादा में कोई कमजोरी नहीं है। लेकिन उनका बड़प्पन तमाम कमजोरियों पर भारी पड़ता है। दादा की सबसे बड़ी कमजोरी है राजनीतिक विरोधियों को भी पनपने देना। पिछले पांच सालों का इतिहास उठाकर देखें तो दादा ने 18 पार्षदों को बराबर आगे बढऩे का मौका दिया। दादा से पहले अध्यक्ष की अनुमति के बिना नगर पालिका में पत्ता नहीं हिलता था लेकिन दादा के समय पार्षदों को अपने वार्ड की समस्या के लिए दादा की तरफ से फ्री हैंड रहा। ये पार्षद सक्षम होने के बाद अध्यक्ष पद की दावेदारी भी कर सकते हैं। दूसरी कमजोरी है लाव लश्कर तैयार नहीं करना। दादा के पास अपार जनसमर्थन भले ही हो, लेकिन जब वो भाजपा में थे तब भी उनके पास भाजपा संगठन के पदाधिकारियों का बड़ा खेमा नहीं था। खेमेबाजी में माहिर न होने के कारण पार्टी उन्हें नजरअंदाज करती रही और उन्हें मजबूरन निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव मैदान में कूदना पड़ा।


ताकत भी कम नहीं
कमजोरी के बाद दादा की ताकत की बात करें तो वो है आम जनता से सीधा संवाद। हाईप्रोफाइल छवि को छोड़कर हमेशा एक ही तरह से रहना। दूसरी बात है विरोधियों का भी विरोध नहीं करना। इसका उदाहरण हैं कांग्रेसी पार्षद। तमाम कांग्रेसी पार्षद खुलकर कहते हैं कि अध्यक्ष पद के लिए दादा से अच्छा उम्मीदवार नहीं है। और अगर सीट सामान्य रही तो फिर से दादा ही अध्यक्ष बनेंगे। तीसरी ताकत है ईमानदारी। नगर पालिका को काजल की कोठरी कहा जाता है। इनके पहले के तमाम अध्यक्ष बेशक ईमानदार रहे होंगे, लेकिन उनकी पार्टी के लोगों ने ही कठघरे में खड़ा किया। लेकिन पिछले पांच सालों में एक बार भी दादा पर किसी तरह का आरोप नहीं लगा। चौथी बात है दलगत राजनीति से ऊपर उठकर कार्य करना। बेशक दादा निर्दलीय अध्यक्ष थे लेकिन उनकी पृष्ठभूमि भगवा है। ऐसे में उन्हें भाजपा-कांग्रेस में भेदभाव करना चाहिए था। पूर्व अध्यक्षों ने तो भेदभाव खुलकर किया था। लेकिन दादा के समय में ऐसा नहीं हुआ।

क्या ऐसा रेल बजट कभी सुना है?

अच्छे दिन रहे हों या बुरे दिन। किसी भी पार्टी की सरकार रही हो। लेकिन क्या किसी को भी याद है कि ऐसा रेल बजट कभी पेश हुआ हो? संभवत: हर स्वतंत्र सोच वाले व्यक्ति का एक ही जबाव होगा- नहीं। लोकसभा में तो हमारे चुने गए माननीय बैठकर लाइव देख रहे थे और ताली ठोंक रहे थे, लेकिन बाकी लोगों ने टीवी और पेपर के माध्यम से बजट को पूरा समझा और पढ़ा। खूब मंथन किया। लेकिन एक बात बजट के कई दिनों बाद तक समझ नहीं आया कि रेल बजट में किसको क्या मिला? हम मान लें कि हमारे देश में जनरल टिकिट पर यात्रा करने वाले सबसे ज्यादा हैं तो उनका जरूर ध्यान रखा गया होगा? लेकिन जबाव एक ही है नहीं। चलिए गरीबों को छोडि़ए, बिजनेसमैन के लिए तो कुछ होगा ही, वो तो किराया भी खूब चुकाते हैं और टैक्स भी देते हैं। लेकिन यहां भी एक ही जबाव है नहीं। हो सकता है ट्रेनों में वेटिंग मैनेज करने के लिए कोई योजना आई हो, लेकिन यहां भी सरकार फिसड्डी।
अब आगे बढ़ते हैं और देखते हैं कि स्टेशन पर शायद सुविधाओं में तो कुछ इजाफा हुआ होगा तो फिर भी जबाव आता है- नहीं। तो फिर इस बजट में बुलेट ट्रेन के सपने के अलावा क्या है? हमने केवल कुछ प्रदेशों के मुखियाओं से दोस्ती निभाते हुए कुछ एक ट्रेनों की घोषणा तो मध्यप्रदेश जैसे प्रदेश से दुश्मनी निभाते हुए ठेंगा दिखाया है। माना कि मध्यप्रदेश में शिवराज सिंह से मोदी जी की नहीं बनती, सुषमा स्वराज भी मोदी को खटकती हैं तो इसका मतलब मध्यप्रदेश को ट्रेन नहीं दी तो ठीक, इज्जत रखने के लिए कुछ घोषणाओं का झुंनझुना ही दे देते।
मतलब साफ है कि हम स्टेशन पर यात्री को साफ पीने का पानी भी नहीं दे पाए। जनरल के यात्रियों को जानवरों की तरह यात्रा करने की मजबूरी अभी भी रहेगी। जिस मॉडल स्टेशन अहमदाबाद की बात करते हैं, उस स्टेशन पर नलों में खारा पानी आता है। गर्मियों में नलों से उबलते पानी के समान गर्म पानी निकलता है। तो फिर हम किस विकास और बदलाव की बात सोचें। पैसेंजर ट्रेन में बैठने के बाद यात्रा पूरी होने की कोई गारंटी नहीं होती है। ट्रेन दुर्घटना के बाद जनरल यात्रियों को मुआवजा न देना पड़े, इसके लिए मृतकों की जेबों से टिकट निकाल लिया जाता है।
विश्व में मंदी का दौर है। विश्व के लगभग सभी देश मंदी से जूझ रहे हैं। लेकिन हिंदुस्तान न तो अमरिका की तरह हर बेरोजगार को 30 हजार रुपए महीना भत्ता देता है और न ही आंख बंद करके होम लोन देता है। अमरीका भले ही थोक में हजारों लोगों को नौकरी से निकाल देता हो, लेकिन हमारे देश में ऐसे हालात न कभी बने हैं और न ही बनने की संभावना दिखती है। ऐसे में हिंदुस्तान के हालात बेहतर कहे जा सकते हैं। खैर, फिलहाल हम रेल मंत्रालय की बात करें तो यह कमाने का जरिया नहीं है, बल्कि लोगों को आम सुविधा मुहैया कराने वाला स्वास्थ्य, सड़क, बिजली, पानी की तरह का एक विभाग है। इसमें न तो पहले कभी फायदे का गणित देखा गया और न ही अब देखा जाना चाहिए। फिर रेल मंत्रालय कंगाल या लखपति कहे जाने का सवाल ही नहीं उठता है। ऐसे में रेलमंत्री के बयान पर तरस ही आता है कि रेल मंत्रालय के पास पैसा नहीं है। ठीक है अगर रेल मंत्रालय के पास पैसा नहीं है तो फिर हमने बढ़ा-चढ़ाकर घोषणाएं कैसे कर दीं? हम पहले से चल रही टे्रनों को समय पर चला नहीं पा रहे हैं और बात करते हैं बुलेट ट्रेन की। हमारे पास अंग्रेजों के जमाने के रेल पुल हैं और कई ट्रेक इतने पुराने हो गए हैं कि टे्रेन रेंगने को मजबूर हो जाती हैं। कई क्षेत्रों में रेल लाइन नहीं हैं और कई क्षेत्र ऐसे भी हैं जहां सिंगल लाइन से काम चला रहे हैं। ऐसे में हम बात करते हैं बुलेट ट्रेन की। ये सही है कि देश में विकास के लिए बुलेट ट्रेन चाहिए, लेकिन बुलेट ट्रेन के लिए ट्रेक कहां से आएगा। जाहिर है न तो ट्रेक होगा और न ही बुलेट टे्रन चलेगी। माना कि कभी विदेशी निवेश से बुलेट ट्रेन चलाने में सफल भी हो गए तो इसमें यात्रा कौन कर पाएगा? पूंजीपति या आम आदमी? वो आम लोग तो कतई यात्रा नहीं कर सकेंगे जो बमुश्किल जनरल का टिकिट खरीद पाते हैं।  जाहिर है केवल पूंजीपति और वो जनप्रतिनिधि जो सरकार के खर्चे पर यात्रा करते हैं। यानि आम आदमी के लिए कुछ भी नहीं। किराया तो हम पहले ही 14 फीसदी से ज्यादा बढ़ा चुके हैं, लेकिन स्टेशनों पर पीने के पानी की सुविधा भी नहीं दे सके।

अहमदाबाद कैसा मॉडल
बड़े जोर-शोर से कहा जा रहा है कि अहमदाबाद की तरह स्टेशनों पर सुविधाएं बढ़ाई जाएंगीं। लेकिन जो लोग अहमदाबाद स्टेशन देखकर आए हैं वे बता सकते हैं कि स्टेशन के पानी को पचाना हर किसी के बस की बात नहीं है। इस स्टेशन के नलों से पीने का पानी खारा निकलता है। साफ-सफाई से लेकर किसी भी क्षेत्र की बात की जाए तो आम स्टेशनों की तरह ही है। ऐसे मॉडल से विकास की बात करें तो फिर तो हो गया विकास।
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ऐसी कैसी दुश्मनी
कहते हैं कि राजनीति में स्थायी दोस्त और दुश्मन नहीं होते। अब आडवाणी, सुषमा को ही ले लो। मजबूरन मोदी का नेतृत्व स्वीकारना ही पड़ा। लेकिन मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री की लोकप्रियता मोदी को गले नहीं उतर रही है। ऐसे में विदिशा सांसद सुषमा स्वराज भी मध्यप्रदेश से चुनकर आईं हैं, तो दुश्मनी पक्की वाली हो गई। यही कारण है कि रेल बजट में मध्यप्रदेश को पूरी तरह दरकिनार किया गया। इतने बुरे हालात तो यूपीए शासनकाल में भी नहीं रहे। दरअसल मोदी ने गुजरात में रिपीट होने के बाद पीएम पद का सपना देखा तो शिवराज ने ही देखा। ऐसे में संघ के समर्थन के कारण भले ही मोदी बाजी मार ले गए हों, लेकिन शिवराज से बदला लेने के लिए मध्यप्रदेश से पक्षपात की बात कुछ अजीब है। जनता की बात की जाए तो 29 में से 27 सीटें भाजपा की झोली में गईं। कम से कम जनता के वोटों का ध्यान तो रखना ही था, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

व्यापमं घोटाला या शिवराज घोटाला या भाजपा घोटाला

पाइंटर:

अगर युवा भविष्य हैं तो मध्यप्रदेश का भविष्य हो गया बर्बाद
व्यापमं घोटाला- दो दशक पहले अंकुरित बीज एक दशक में वट वृक्ष बन गया
पीएमटी हो या सरकारी नौकरियां, लाखों होनहार युवाओं का भविष्य बर्बाद
बोफोर्स, टूजी, कोयला से भी बड़ा शिवराज (व्यापमं) घोटाला
युवा पुकार रहे- अन्ना अब तुम कहां हो, अब हमें भी विकल्प बता दो
इस घोटाले में भविष्य बर्बादी का आंकलन संभव नहीं है

इंट्रो:

किसान की 4 महीने की मेहनत की फसल देखकर हमारे सीएम रोने लगते हैं। उन्हें गले लगाते हैं।  मुआवजा देते हैं। लेकिन उनकी सरकार के व्यापमं घोटाले में लाखों छात्रों का पूरा जीवन बर्बाद हो गया। यहां फसल नहीं पूरा खेत ही तबाह हो गया। लेकिन न तो मुखिया की आंख में आंसू हैं और न ही उन परीक्षार्थियों को गले लगाया गया जिन्हें कड़ी मेहनत के बाद भी डॉक्टर बनने के लिए दाखिला नहीं मिला या कई सालों की मेहनत के बाद बेरोजगार रह गए। खुद को बचाने के चक्कर में सरकार ये भी भूल गई कि एक बार इनके जीवन बर्बादी का कुछ आंकलन तो करना चाहिए था। इनकी पीर (पीड़ा) कम करने का कोई तो रास्ता निकालना था। देश के इतिहास में न तो व्यापमं जैसा लाखों युवाएं के भविष्य को बर्बाद करने वाला घोटाला हुआ है न ही ऐसी उम्मीद करनी चाहिए। 


भोपाल। पिछले कुछ सालों में केंद्र और राज्य में इतनी गड़बडिय़ां-घोटालों के खुलासे हुए कि लोगों ने ज्यादा ध्यान देना ही बंद कर दिया। राजीव सरकार के बोफोर्स कांड की गूंज आज भी सुनाई देती है।
अटल सरकार में जब तहलका डॉट कॉम ने रक्षा घोटाले का खुलासा किया था तो बड़ा हंगामा हुआ था। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष बंगारू लक्ष्मण ने जब केवल एक लाख रुपए की रिश्वत ही बड़े मान से स्वीकार की थी तब भी लोगों को आश्चर्य हुआ था। इसके बाद कांग्रेस शासनकाल के टूजी, कॉमनवेल्थ गेम्स और कैग की मनमानी का कोयला घोटाला(कैग की मनमानी इसलिए क्योंकि अगर कोयला खदानें चालू होती तो इतना नुकसान होता यानि नुकसान या घोटाला होने से बच गया)। घोटाला कोई भी हो, देश का नुकसान तो होता ही है, लेकिन घोटाले की प्रकृति बताती है कि उससे सीधे तौर पर किसको नुकसान होता है। इन घोटालों की दो खासियत थीं। पहली- इनकी राशि हजारों करोड़ में आंकी गई। दूसरी-इनका आम आदमी की जिंदगी से सीधा कोई संबंध नहीं था। यानि आजाद भारत के किसी भी घोटाले से सीधे तौर पर आम आदमी का भविष्य बर्बाद नहीं हो सकता था।
लेकिन हमारे देश का एक ऐसा प्रदेश है जहां घोटाले की न तो रकम आंकी जा सकती और न ही गंभीरता। सबसे बड़ी बात है बर्बादी। तो इस घोटाले में रुपयों की नहीं भविष्य की बर्बादी हुई है। वो भविष्य भी देश के नौजवानों का, युवाओं का। दुर्भाग्य ये है कि ये घोटाला ऐसे प्रदेश में हुआ जो देश का हृदय स्थल कहा जाता है। यानि अपना मध्यप्रदेश। व्यवसायिक परीक्षा मंडल और नेताओं की मिली भगत का घोटाला। इससे डॉक्टर बनने का सपना देखने वाले और मेहनत की दम पर परीक्षा की तैयारी कर नौकरी हासिल करने वाले युवाओं का जीवन तबाह हो गया। इसके जिम्मेदार हैं हमारे प्रदेश के खेवनहार, जिन्हें हम दो दशक से सत्ता की बागडोर सौंपते चले आ रहे हैं। वो कांग्रेस के भी हैं और भाजपा के भी। कुछ नेता-अधिकारी गिरफ्तार हो गए तो कुछ छात्रों के साथ उनके अभिभावकों को भी पकड़ लिया गया। लेकिन 2009 से घोटाले को दबाने की कोशिश करने वाले नेताओं की गिरेबान पर हाथ डालने की आज भी किसी में हिम्मत नहीं है।

शुरूआत तो 20 साल पुरानी है
व्यापमं घोटाला भले ही 5 साल पहले से उजागर होना शुरू हुआ हो, लेकिन इसकी नींव तो करीबन दो दशक पहले कांग्रेस शासनकाल में रखी जा चुकी थी। ये बात अलग है कि उस समय इतनी सावधानी रखी जाती थी कि पकड़े न जाएं। दूसरी बात बड़ी रकम ली जाती थी लेकिन केवल रसूखदार अफसरों के माध्यम से। डेंटिस्ट डॉ. अनुराग साहू बताते हैं कि ऐसे छात्र पीएमटी में पास हो जाते थे तो 12 वीं में बमुश्किल पास हो सके हों। हमें बड़ा आश्चर्य होता था। हमारे जैसे सैंकड़ों छात्र कड़ी मेहनत के बाद भी पीएमटी में कम नंबर के कारण डेंटिस्ट या पशु चिकित्सक बने। जाहिर है कांग्रेस हर बात में कोर्ट जाती है लेकिन व्यापमं घोटाले में सीबीआई जांच के लिए कोर्ट नहीं गई। दिग्गी ने हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीस को पत्र तो लिखा, लेकिन एक साल बाद भी व्यापमं घोटाले की सीबीआई जांच के लिए कोई पत्र या याचिका नहीं लगा रहे हैं। ऐसा क्यों? परते जब उधड़ती हैं तो कई राज खुद व खुद बाहर आ जाते हैं। ये भी हो सकता है कि कई लोग 10 साल की नौकरी के बाद पकड़े जाएं। नीयत साफ किसी की भी नहीं है, इसीलिए आरोप केवल बयानों तक सीमित हैं।

एक कसम पहले भी खाई थी
मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को पूर्व राज्यसभा सांसद रघुनंदन शर्मा ने घोषणावीर कहा था। श्री चौहान का कसमे-वादों का इतिहास भी पुराना है। उन्होंने नर्मदा जल में कमर-कमर तक पानी में खड़े रहकर कसम खाई थी कि आजीवन कुंवारे रहकर प्रदेश की जनता की सेवा करेंगे। खैर नर्मदा का पानी बह गया तो कसम भी बह गई। लेकिन अभी  विधानसभा में भी एक कसम खा गए। अगर व्यापमं घोटाले में उनका या उनके परिवार का कोई भी सदस्य दोषी होगा तो वो सन्यास ले लेंगे। उनके मंत्री मण्डल परिवार का तो नहीं कहा होगा, वरना सन्यास हो गया होता। लेकिन जब हर बात में दागी होने का सबूत मांगते हैं तो अपनी ईमानदारी का भी सबूत दें। सीधे 20 साल की सीबीआई जांच और जांच एजेंसी को हर तरह से मदद। फिर पता चलेगा कि सन्यास का क्या हश्र होगा?

आखिर मिश्रा ने क्यों नहीं बचाया
डम्पर घोटाले को उजागर करने में जनसम्पर्क विभाग के एक अधिकारी की महती भूमिका थी। वो अधिकारी उस समय पूर्व उपमुख्यमंत्री दिवंगत श्रीमती जमुना देवी के स्टाफ में था। बाद में लक्ष्मीकांत शर्मा ने खनिज के मामले में उलझने पर इस अधिकारी को अपने स्टॉफ में पदस्थ किया। उस समय जमना देवी ने इस कर्मचारी के लिए रूठ कर सरकार को गाड़ी और स्टॉफ वापिस कर दिया था। इस अधिकारी ने अपने मीडिया में पाले गए गुर्गों के जरिए पहले खनिज मामले में छपने वाली खबरों के
मामले में राजीनामा करवाया और फिर इस अहसान का अहसास दिलाकर खूब दोहन किया। इस अधिकारी के बारे में बता दें कि ये बाबू से भर्ती हुआ और आईएएस अवार्ड के लिए इसका नाम राज्य सरकार ने भेजा था। ये अलग बात है कि मामला अभी पेंडिंग में है। व्यापमं घोटाले में जो खास बात उभरकर आ रही है वो है कि इस अधिकारी को लक्ष्मीकांत शर्मा के स्टाफ में शामिल होने के बाद भी इस घोटाले की भनक कैसे नहीं लगी? अगर भनक लगी भी तो फिर इस बार मंत्री की मदद क्यों नहीं कर पाया? और अगर मदद कर भी दी तो खुद का दामन कैसे बचाया? लक्ष्मीकांत शर्मा से जुड़े सूत्र बताते हैं कि इस अधिकारी ने अपना पाला बहुत पहले बदल लिया था।

युवा भविष्य का क्या हो सकता है मुआवजा?
सरकार के नुमाइंदों ने जो भी किया हो, लेकिन युवाओं के भविष्य बर्बादी पर पुख्ता कदम उठाने की आवश्यकता है। जब किसी दुर्घटना पर मुआवजा दिया जाता है तो भविष्य बर्बादी पर क्यों नहीं? ये सही है कि व्यापमं घोटाले की भरपाई कभी भी संभव नहीं होगी, लेकिन उस समय परीक्षा में बैठे और घोटालेबाजों के कारण पिछडऩे वाले युवाओं को नौकरी देने जैसा कदम उठाया जा सकता है। लेकिन ये उस समय हो पाएगा, जब सीएम खुद को बचाने में ताकत न लगाकर युवाओं के भविष्य पर फोकस करें।


युवा चाहते हैं इन सवालों का जबाव

पहला सवाल- यह सही है कि केंद्र के टूजी, कॉमनवेल्थ, कोयला घोटाले के लिए कांग्रेस सरकार, प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और कांग्रेस की राष्ट्रीय अध्यक्ष सोनिया गांधी जिम्मेदार थीं तो व्यापमं घोटाले के लिए भाजपा, मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और पूर्व प्रदेश अध्यक्ष प्रभात झा, वर्तमान प्रदेश अध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर और सत्ता का कंट्रोलर संघ अपनी जिम्मेदारी से क्यों भाग रहे हैं। विपक्षी पार्टी कांग्रेस भी सही सवाल दागने में चुप क्यों?
दूसरा सवाल- अगर सत्ता के मुखिया को घोटाले में किसी बात का डर नहीं था तो 2009 में जानकारी होने के बाद किसी सक्षम एजेंसी को जांच क्यों नहीं सौंपी? फिर से उसी व्यापमं में 2012 में बड़े स्तर पर गड़बड़ी का इंतजाम किया गया और फिर इंतजार दुश्मनों को ठिकाने लगाने का। 2014 तक किस बात का इंतजार किया? 2013 में जब सरकार के वरिष्ठ मंत्रियों की संलिप्तता सामने आ गई तो सीधे सीबीआई जांच की मांग क्यों नहीं की गई। मतलब साफ था। पहले सबूत मिटाओ, फिर सीबीआई को जांच सौंपो। वहीं कांग्रेस के दिग्गी राजा तो हर बात पर सीबीआई जांच की पैरवी करते हैं तो शुरू से सीबीआई जांच के लिए
खुद की सरकार यानि केंद्र सरकार से अनुरोध क्यों नहीं किया? साफ बात है कि यहां शिवराज और दिग्विजय सिंह की अंदरूनी यारी थी।
तीसरा सवाल- अगर लक्ष्मीकांत शर्मा को दोषी माना गया था और केवल पीए के बयान और सूची भेजने से उन्हें गिरफ्तार किया गया तो पीए तो शिवराज सिंह चौहान का भी गिरफ्तार हुआ। फिर लक्ष्मीकांत दोषी तो सीएम कैसे निर्दोष?
चौथा सवाल- अगर लक्ष्मीकांत शुरू से दोषी थे तो उन्हें गिरफ्तार क्यों नहीं किया गया? कोर्ट से उनके संबंध में आदेश लेने की प्रक्रिया क्यों अपनाई गई?
पांचवा सवाल- पिछले 10 सालों में जिन युवाओं का भविष्य बर्बाद हुआ, उनके लिए सरकार के पास कोई भी योजना क्यों नहीं? जो योग्य होने के बाद भी पीएमटी में चुने नहीं जा सके या जो योग्य होने के बाद भी नौकरी नहीं पा सके, उनके भविष्य के मामले में भाजपा मौन क्यों?
छठवा सवाल-प्रदेश सरकार के अधीन जांच एजेंसी कैसे निष्पक्ष जांच कर सकती है? जब सीबीआई पर आरोप लग सकते हैं तो एसटीएफ के अधिकारियों को तो कम से कम 5 साल सरकार के साथ ही गुजारने हैं। ऐसे में निष्पक्ष जांच आयोग का गठन समय रहते क्यों नहीं किया गया?

सबसे बड़ा और अहम सवाल- अगर मंत्रीमंडल का मुखिया सीएम तो अपने मंत्रियों के घोटाले का जिम्मेदार कौन? अगर शिवराज बहुत भावुक हैं और किसान की एक साल की फसल बर्बाद होने पर रो पड़ते हैं, प्रकृति की नाइंसाफी पर आंसू बहाते हैं और मुआवजा की घोषणा करते हैं तो फिर उनके मंत्रियों और अधिकारियों की करतूत से युवाओं के पूरे जीवन बर्बाद होने पर कोई मुआवजा क्यों नहीं? युवाओं के भविष्य को बर्बाद करके उनके मां-बाप को तीर्थ कराने से कौन सा पाप धुलेगा।

शनिवार, 15 सितंबर 2012

एफडीआई से किसानों की बल्ले-बल्ले



प्रमोद त्रिवेदी, भोपाल। भले ही एफडीआई के नाम का तूफान मचा रखा हो, लेकिन हकीकतन एफडीआई देश की तरक्की के लिए मील का पत्थर साबित होगा। खासकर देश के किसानों को बिचौलिए से मुक्ति मिलेगी और उसे उपज का पूरा दाम मिलेगा। वहीं 30 प्रतिशत घरेलू उत्पाद खरीदने की शर्त पर घरेलू उत्पादकों को भी अच्छा खासा लाभ होगा। लेकिन विपक्ष ने अपना काम किया और सरकार की हर नीति की तरह इसका विरोध किया। तृणमूल हमेशा की तरह विरोध करके सरकार को ब्लैकमेल का प्रयास कर रही है, लेकिन सरकार को मुलायम, माया से गुप्त समर्थन मिल चुका है। इसलिए किसी भी हायतौबा से कुछ नहीं होना। शेयर मार्केट की तेजी से जाहिर है कि सरकार हर हाल में स्थिर है। सूत्र बताते हैं कि विदेशी गुप्तचर एजेंसी भी सरकार की स्थिरता पर रिसर्च करके अपने देशों को खबर कर चुकी हैं। भाजपा शासित राज्यों में सांप छछूंदर की स्थिति है। वो एफडीआई को प्रदेश में नहीं आने देंगे तो विकास रुकेगा और आने देंगे तो विरोध करने की दोगुली नीति उजागर होगी।                                                                                                                                          सरकार ने सीसीईए की बैठक में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) को लेकर दो अहम फैसले लिए हैं। एक फैसले में सरकार ने मल्टी ब्रांड रिटेल में 51 फीसदी निवेश को मंजूरी दे दी है। हालांकि, केंद्र सरकार ने किराने में विदेशी निवेश को लेकर राज्य सरकार को छूट भी दी है। राज्य सरकार अपने यहां आउटलेट खोलने की इजाजत देने में स्वतंत्र होंगे। वहीं, देसी एयरलाइंस में विदेशी एयरलाइंस के निवेश को भी सरकार ने हरी झंडी दिखा दी है। हालांकि, सरकार के इन फैसलों का तृणमूल पार्टी विरोध कर रही है।

सीसीईए बैठक में लिये गए फैसले में सरकार ने 5 कंपनियों को देशी एयरलाइंस में निवेश की इजाजत दी है। दिलचस्प है कि किसी एक देश की कंपनी द्वारा दूसरे देश में किये जाने वाले प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को एफडीआई कहा जाता है। ऐसे में निवेश में निवेशक को दूसरे देश की कंपनी के मैनेजमेंट में कुछ हिस्सा मिल जाता है। हालांकि, यह हिस्सा 51 फीसदी से कम होता है। आमतौर पर किसी निवेश को एफडीआई का दर्जा दिलाने के लिए निवेशक को कंपनी में न्यूनतम 10 फीसदी शेयर खरीदने पड़ते हैं।

केंद्र सरकार के इस फैसला के तृणमूल कांग्रेस ने तीखा विरोध किया है। पार्टी के नेता कुणाल घोष ने कहा कि हमारी पार्टी और ममता बनर्जी इस फैसले का पुरजोर विरोध करती हैं। कुणाल ने कहा कि हमारे पास संसद में इतनी संख्या नहीं है कि हम फैसलों को रोक सकें लेकिन हमें खुलकर इसका विरोध तो कर ही सकते हैं। कांग्रेस के पास संख्याबल है और यूपीए में उन्हीं की चलती है। कुणाल घोष ने यह भी कहा कि ममता बनर्जी की सरकार ऐसी किसी भी पॉलिसी को पश्चिम बंगाल में लागू नहीं करेगी।

विदेशी निवेश को किस तरह लागू किया जाना है यह राज्य सरकारें तय करेंगी। आर्थिक सुधारों के नाम पर लिए गए केंद्र सरकार के इस फैसले की बीजेपी और सीपीआई ने तीखी आचोलना की है। विपक्ष ने कहा है कि यूपीए अपनी नाकामियों को छुपाने के लिए गलत फैसले ले रही है।

आम आदमी को होगा ये फायदा


  • देश के कई राज्य एफडीआई के खिलाफ हैं। वहीं, कई संगठन भी इसका विरोध जता रहे हैं, लेकिन इन सबके बीच आम आदमी को जहां इससे कुछ नुकसान होने के साथ-साथ फायदा भी मिलेगा। इन फायदों में-
  • एफडीआई से अगले तीन साल में रिटेल सेक्टर में एक करोड़ नई नौकरियां मिलेंगी।
  • किसानों को बिचौलियों से मुक्ति मिलेगी और अपने सामान की सही कीमत भी। कंस्यूमर तक जो चीज 20 रुपये में पहुंचती है, उसकी कीमत उसे पैदा करने वाले किसान को महज 4 रुपये मिल पाती है। बाकी का पैसा आढ़ती और बिचौलियों के पेट में जाता है। अब कंपनियां सीधे किसानों से चीजें खरीदेंगी, जिससे किसानों का फायदा बढ़ेगा और बिचौलियों द्वारा किया जाने वाला शोषण कम होगा। 
  • विदेशी कंपनियां द्वारा सप्लाई चेन सुधारने से खाद्य सामग्री का खराब होना रुकेगा।।
  • सामान कम खराब होने से खाद्य महंगाई सुधरेगी। 
  • विदेशी कंपनियों को न्यूनतम 30 फीसदी सामान घरेलू बाजार से ही लेना होगा। इससे देश में  लोगों की आय बढ़ेगी। इससे औद्योगिक विकास दर भी सुधरेगी।
  • देश की बड़ी कंपनियों को पहले ही रिटेल में आने की इजाजत है। चीन हो या फिर इंडोनेशिया जहां भी रिटेल में एफडीआई को मंजूरी दी गई वहां एग्रो-प्रोसेसिंग इंडस्ट्री के दिन फिर गए।


शनिवार, 8 सितंबर 2012

सेक्सी ठग कोमल है दो बच्चों की मां....



खुद के बच्चों को डॉक्टर नहीं बना सकी ठग कोमल

अपराध संवाददाता, भोपाल। पूरे देश के लोगों को मेडीकल में एडमीशन दिलाने के लिए दलाली और ठगी करने वाली पूनम खुद के बच्चों को डॉक्टर नहीं बना सकी। कोमल की फितरतों की वजह से वो बच्चों पर ध्यान नहीं दे सकी और वो पढ़ने-लिखने में फिसड्डी हो गए। लिहाजा कोमल ने एक बेटे को एमबीए और दूसरे का बीबीए में एडमीशन करवा दिया। कोमल के दोनों बेटे इंदौर में पढ़ते हैं।

रिमांड के दौरान पूछताछ में भोपाल पुलिस ने कोमल के कई राज पर से पर्दा उठाया। कोमल का जन्म 1970 में सफदरगंज दिल्ली में हुआ। उसके पिता एसके सलवान सेना के रिटायर्ड अफसर हैं। कोमल का छोटा भाई बाबी सलवान फ्रांस में टाटा कंपनी का जोनल सेल्समेन है। उसकी ससुराल भोपाल की गुलमोहर कॉलोनी में है। कोमल की पढ़ाई भोपाल में हुई। उसकी शादी जबलपुर के पंकज पांडे से हुई। कोमल के दो बेटे है। बड़ा अभिनव इंदौर से एमबीए कर रहा है, जबकि छोटा शांतनु बीबीए का छात्र है। कोमल ने 1990 से लेकर वर्ष 2000 तक एनजीओ में काम किया। इसके बाद वह सतना में रहने लगी। इस दौरान वह रेडक्रास में काम करती थी। इसके बाद कोमल 2003 में जबलपुर आ गई, लेकिन वह 2006 से भोपाल समेत कई शहरों के मेडिकल कॉलेजों में एडमिशन दिलाने के गोरखधंधे में लिप्त हो गई। मेडिकल कॉलेजों में पीजी सीट का सौदा एक से लेकर डेढ़ करोड़ रुपए में किया जाता है। यह भारी-भरकम रकम कॉलेज प्रबंधन अपने दलालों के माध्यम से छात्रों से वसूलते हैं। इस गोरखधंधे में कॉलेज के कर्मचारियों की भी मिलीभगत होती है। यह सिंडिकेट ऐसे छात्रों की तलाश करता है, जो मोटी रकम देकर पीजी करना चाहते हैं। सारा लेन-देन नकद में होता है। निशातपुरा पुलिस के रिमांड पर चल रही कोमल के साथी जावेद की पुलिस को तलाश है। उसकी खोजबीन में पुलिस की टीमें लगी हुई हैं। कोमल की रिमांड अवधि शनिवार को समाप्त हो रही है। इस बीच कोमल से पिपरिया समेत कुछ स्थानों की पुलिस पूछताछ कर चुकी है। कोमल को पांच सितंबर को गिरफ्तार किया गया था, जिसका आज रिमांड खत्म होने पर अदालत में पेश किया गया।
00सारे कॉलेजों में कोमल की धाक 
एसपी अरविंद सक्सेना ने बताया कि कोमल पांडे से की जा रही पूछताछ में उसने बताया कि वह कोई दो दर्जन छात्र-छात्राओं को मेडिकल कॉलेजों में एडमिशन दिला चुकी हैं। एसपी ने कहा कि कोमल का दावा है कि उसका नेटवर्क चिरायु, पीपुल्स व इंदौर के श्री अरविंदो और उज्जैन के आडीर्गार्डी मेडिकल कॉलेज समेत प्रदेश के कई इंजीनियरिंग कॉलेजों में है। अति महत्वाकांक्षी व आत्म विश्वास से लबरेज कोमल पांडे के कई बैंकों में खाते हैं। फिलहाल केनरा, आईडीबीआई, यूको, भोपाल को-आपरेटिव व इंडसुइंड समेत सात बैंकों में उसके खातों की जानकारी मिली है। खुद को भारतीय विप्र समाज की महिला इकाई की प्रदेशाध्यक्ष बताने वाली कोमल पांडे बहुजन समाज पार्टी में भी पदाधिकारी रह चुकी है। उसने बताया कि बसपा में उसका इतना दखल था कि अगर उसके पास पर्याप्त धनराशि होती, तो विधानसभा चुनाव में वह संजीव सक्सेना को बीएसपी से टिकट नहीं लेने देते, बल्कि खुद चुनाव लड़ती। किंतु पैसों की कमी ने उसके अरमानों पर पानी फेर दिया था, इस कारण उसने कमाई का शार्टकट रास्ता अपना लिया। इस कमाई से कोमल ने घर की खूब शान-शौकत ब़ढ़ाई। उसके पास दो नैनों व एक मारुति तथा एक फोर्ड कंपनी की आइकान कार है। कोमल का कहना है कि उसे एक नैनो कार कोलार रोड स्थित स्वर्ण सुख ज्वेलर्स की दुकान से इनाम में मिली है।
00खुद को डॉक्टर बताती थी कोमल
कोमल बेहद शातिर दिमाग की औरत है। उसने पैथालॉजी का डिप्लोमा किया है। इसके बाद नाम के आगे डाक्टर लिखना शुरू कर दिया। उसने कई जगह पर खुद का नाम डॉ. शुभ्रा भी बताया था। कोमल ने मुरैना, सतना, पिपरिया समेत कई शहरों में अपनी पैठ बना ली थी। वह डॉक्टर के रूप में मिलती थी। इस कारण उसकी बातों पर एडमिशन कराने वालों को सहज भरोसा हो जाता था। कोमल ने बताया कि वह मेडिकल पीजी सीट के लिए 1 करोड़ 40 लाख रुपए तक वसूल चुकी है। ऐसी रकम कॉलेज के अलावा एडमिशन रैकेट चलाने वालों के बीच में बंट जाती है।


गुरुवार, 6 सितंबर 2012

रईसों को इंदौर का आरामदायक सफर कराएगी वाल्वो


भोपाल। इंदौर-भोपाल के बीच वॉल्वो बस के टिकट सिर्फ आॅनलाइन ही बुक किए जा सकेंगे। इस रूट पर शुरूआत में चार बसें चलेंगी जिनमें से दो बुधवार को इंदौर पहुंच गई। माना जा रहा है कि जल्द ही इनको चलाने की तारीख तय कर दी जाएगी।

बस का संचालन अटल इंदौर सिटी ट्रांसपोर्ट सर्विसेस लिमिटेड (एआईसीटीएसएल) ही करेगा। एक बस में 53 यात्री बैठ सकेंगे और प्रति यात्री किराया लगभग 350 रुपए रहेगा। इंदौर से भोपाल की दूरी यह लगभग 3.30 घंटे में तय करेगी। एआईसीटीएसएल के सीईओ चंद्रमौलि शुक्ला ने बताया बसों के परमिट की प्रक्रिया चल रही है जो इस हफ्ते पूरी हो जाएगी। बची दो बसें एक-दो दिन में आ जाएंगी। इसके बाद लोकार्पण का कार्यक्रम तय कर बसें शुरू कर देंगे। फिलहाल टाइम-टेबल तय नहीं हुआ है।

मनचाही सीट ले सकेंगे

www.charteredbus.in वेबसाइट पर यात्री अपनी मनचाही सीट बुक करा सकेंगे। > इंदौर से यह बस सिटी बस आॅफिस से शिवाजी प्रतिमा-बायपास लिंक रोड होते हुए रिंगरोड के रेडिसन चौराहा, एमआर-10 व बायपास होते हुए भोपाल जाएगी।

- भोपाल में यह बस लालघाटी और जवाहर चौक होते हुए हबीबगंज स्थित इंटरस्टेट बस टर्मिनस तक चलेगी।

ताकतवर इंजन, सुपर लक्जरी सीट

  • - इस आधुनिक बस में 340 बीएचपी का ताकतवर इंजन लगा है जो बस के एसी को भी प्रभावी बनाता है। 
  • > 1.10 करोड़ रुपए प्रति बस की कीमत वाले इस वाहन में मल्टी-एक्सल लगा है जिससे गड्ढों पर चलने के दौरान यात्री को दचके नहीं लगते।

सेक्स और धन के मिश्रण से कोमल बनना चाहती थी नेता


हर फितरत में माहिर थी कोमल

कोमल पाण्डे
 भोपाल। मेडीकल कॉलेज में दाखिला हो या किसी की नौकरी लगना हो, कोमल पांडे हर काम को चुटकियों में करवाने में माहिर थी। ग्राहक को जाल में फंसाने मेकअप में लिपटे चेहरे से ऐसी कातिल मुस्कान फेंकती थी कि लोग उसके विश्वास के दीवाने हो जाते थे। लोगों को ठगने के लिए अलग-अलग नाम और पद का इस्तेमाल बड़ी आसानी से करती थी। उम्र के ढलान पर वो एक बड़ा चुनाव लड़ने के लिए रुपयों का इंतजाम कर रही थी। इन रुपयों के इंतजाम के लिए उसे जो मिला उसे ही ठग लिया। पुलिस की पूछताछ में कोमल पांडे के कई राज उजागर होते जा रहे हैं। राजधानी के अलावा सतना, पिपरिया, जबलपुर सहित करीबन आधा दर्जन जिलों की पुलिस को कोमल की तलाश थी।
मेडीकल कॉलेज में दाखिले के नाम पर कई छात्रों को लाखों की चपत लगाने वाली कोमल पांडे को पिपरिया पुलिस ने बुधवार को अपनी हिरासत में लिया। हालांकि अभी वह निशातपुरा पुलिस की रिमांड पर है। उसे पिपरिया पुलिस भी रिमांड पर लेने की कार्रवाई कर रही है। इसके बाद दूसरे जिलों की पुलिस भी रिमांड पर लेकर कोमल से ठगी के राज उगलवाएगी। कोमल पांडे के खिलाफ मुरैना, सतना में भी धोखाधड़ी के मामले उजागर हुए हैं। महिला इतनी शातिर है कि उसने महापौर का चुनाव लड़ने के लिए कांग्रेस कमेटी को पत्र लिखा था। नेतागिरी की आड़ में वह कई लोगों को झांसा दे चुकी है। निशातपुरा थाना प्रभारी एके वाजपेयी ने बताया कि पिपरिया पुलिस ने बुधवार को कोमल पांडे को हिरासत में ले लिया है। पुलिस उसे अदालत से रिमांड पर लेने की कार्रवाई भी कर रही है। इसके अलावा महिला के खिलाफ मुरैना व सतना में भी धोखाधड़ी करने के मामले उजागर हुए हैं। कोमल ने वहां के छात्रों को भी एमबीबीएस में दाखिले के नाम पर लाखों रुपए की चपत लगाई है। लक्जरी गाड़ियों में सफर करने व शान शौकत से रहने वाली कोमल पांडे के सहयोगियों की तलाश में पुलिस की दो टीमें लगाई हैं। इनमें से एक टीम ग्वालियर के लिए रवाना हो गई है। सूत्रों के मुताबिक आरोपी महिला ने सतना के डीसी पटेल नामक व्यक्ति से उनके बेटे का एडमीशन कराने के लिए साढ़े 5 लाख रुपए लिए थे। लेकिन जब काम नहीं हुआ, तो उन्हें दो चेक थमा दिए गए थे। किंतु दोनों चेक वाउंस हो गए थे। इस मामले में फरियादी ने अदालत की शरण ली। न्यायालय में भी कोमल के खिलाफ एक धोखाधड़ी का मामला चल रहा है। किंतु उसका पता सही नहीं होने के कारण नोटिस सर्व नहीं हो पाया था। अब सतना व मुरैना पुलिस भी कोमल से पूछताछ करने जल्दी भोपाल आने वाली है।

सोमवार, 3 सितंबर 2012

ये है ओसामा की मौत की हकीकत...नेवी सील कमांडो का खुलासा...



विशेष संवाददाता, भोपाल।
अमेरिका लाख कहे कि ओसामा मुठभेड़ में मारा गया। जबकि हकीकत ये है कि नेवी सील कमांडो ने जो सामने आया उसे भून दिया। बिना संघर्ष के ही कुख्यात कट्टर आतंकवादी कुत्ते की मौत मारा गया। नेवी सील कमांडो मार्क बाइसोनेट की किताब से अलकायदा सरगना के खात्मे की पूरी कहानी सामने आ गई है। 'नो ईजी डे : द फर्स्ट हैंड अकाउंट आॅफ द मिशन दैट किल्ड ओसामा बिन लादेन' नाम की इस किताब को बाइसोनेट ने मार्क ओवन के नाम से लिखा है। यह किताब 4 सितंबर को लांच होगी, लेकिन आॅपरेशन जेरोनिमो की पूरी कहानी मीडिया में आ चुकी है, तो आइए जानें बाइसोनेट की जुबानी 'आॅपरेशन ओसामा' की कहानी..

अफगानिस्तान के जलालाबाद सैन्य ठिकाने से 24 नेवी सील कमांडो 1 मई 2011 की रात दो ब्लैक हॉक हेलीकॉप्टरों में सवार होकर पाकिस्तान के एबटाबाद की ओर बढ़े। कमांडोज को तीन टीमों में बांटा गया था। हमें मालूम था कि 'वजीरिस्तान हवेली' में लादेन के अलावा उसका बेटा खालिद, संदेशवाहक अहमद अल कुवैती और कुवैती का भाई अबरार भी होंगे। एबटाबाद पहुंचते ही एक ब्लैक हॉक दुर्घटनाग्रस्त हो गया। खुशकिस्मती से उसमें सवार कमांडोज सुरक्षित थे। दूसरे हेलीकॉप्टर में सवार सभी कमांडोज हवेली की छत पर उतर चुके थे। हमारे पास 'आॅपरेशन जेरानिमो' को अंजाम देने के लिए 30 मिनट थे। मैं और मेरी टीम परिसर में मौजूद गेस्ट हाउस की ओर बढ़ी। हमें बताया गया था कि लादेन का संदेश वाहक अहमद अल कुवैती परिवार के साथ यहीं पर रहता है। इसके बाद कमांडो ने दरवाजे के ऊपर बनी खिड़की को निशाना बनाकर पहला राउंड फायर किया। एक साथी ने अरबी में कुवैती से बाहर आने को कहा। कुछ देर बाद दरवाजा खुला और महिला बाहर आई। उसके हाथों में कुछ था, हमें लगा कि वह बम है, लेकिन उसकी गोद में नवजात था। वह कुवैती की पत्नी मरियम थी। उसके पीछे तीन बच्चे खड़े थे। उसने बताया कि कुवैती मर चुका है, लेकिन मैंने बेडरूम के दरवाजे पर हलचल देखी और कुवैती पर कई गोलियां दागीं। गेस्ट हाउस सुरक्षित करने के बाद टीम परिसर के मुख्य हिस्से की ओर बढ़ी। टीम का नेतृत्व करने वाले 'प्वाइंट मैन' ने खिड़की से किसी को झांकते देखा। उसने बिना देर किए उसे गोली मारी, वह अबरार था। उसकी पत्नी बुशरा उसे बचाने में मारी गई। अब परिसर का 'फर्स्ट लेवल' सुरक्षित था।

सेकेंड लेवल में खालिद और थर्ड में लादेन को उड़ाया

कमाडोज ने कुछ देर में 'सेकेंड लेवल' में घुसने के लिए एक गेट उड़ा दिया। जब मैं सेकेंड लेवल पर पहुंचा तो देखा एक बॉडी लटकी है। वह लादेन का बेटा खालिद था। इसके बाद टीम 'थर्ड लेवल' यानी तीसरी मंजिल की ओर बढ़ी। मैं सीढ़ियों पर था तभी गोली चलने की आवाज सुनाई दी। प्वांइट मैन ने बताया कि खिड़की से कोई झांक रहा था, इसलिए उसने गोली चलाई, लेकिन उसे नहीं पता था गोली लगी या नहीं? वह आदमी एक कमरे की ओर भागा। कुछ देर रुककर हम कमरे की ओर बढ़े और देखा कि दो महिलाएं एक आदमी से लिपटकर रो रही थीं। मैंने और एक अन्य कमांडो ने उसके सीने पर कई राउंड फायर किए। मैंने उसका खून से सना चेहरा साफ किया और कुछ फोटो खींचे। पहचान के लिए हमने वहां मौजूद एक लड़की से पूछा यह कौन है? उसने जवाब दिया ओसामा बिन लादेन।

शुक्रवार, 31 अगस्त 2012

50 रुपए में 8 लाख का इलाज.... मध्यप्रदेश स्थापना दिवस से पुलिसकर्मियों को मिलेगी सौगात


प्रमोद त्रिवेदी


भोपाल। मध्यप्रदेश स्थापना दिवस 2012 से पुलिसकर्मियों और उनके परिजनों का प्रदेश सहित देश के बड़े अस्पतालों में किसी भी गंभीर बीमारी पर मुफ्त में इलाज हो सकेगा। इसके लिए प्रत्येक पुलिसकर्मी के वेतन से 50 रुपए मासिक काटे जाएंगें। यानि साल में 600 रुपए कटवाने पर एक साल में 8 लाख तक इलाज मिल सकेगा। इस योजना से सभी पुलिसकर्मियों को लाभ मिलेगा। खासकर सिपाही से लेकर एएसआई स्तर तक के कम वेतन वाले पुलिसकर्मियों के लिए ये योजना जीवनदायिनी साबित होगी।
प्रदेश के पुलिस अधिकारियों-कर्मचारियों का समय पर इलाज कराने और मेडिकल रिएम्बर्समेंट की परेशानियों से निजात दिलाने के मकसद से कर्नाटक और आंध्रप्रदेश की तर्ज पर मध्यप्रदेश पुलिस स्वास्थ्य सुरक्षा योजना लागू की जाएगी। गृहमंत्री उमाशंकर गुप्ता ने योजना का प्रारूप शीघ्र बनाने को कहा है। उन्होंने कहा कि पुलिस बल की स्वास्थ्य सुरक्षा के लिए प्रस्तावित योजना उनका मनोबल ब़ढ़ाने में सहायक होगी। गृहमंत्री ने कहा कि सभी प्रक्रियाएँ समय पर पूरी करें, जिससे एक नवम्बर से मध्यप्रदेश स्थापना दिवस पर योजना प्रारंभ की जा सके। योजना के क्रियान्वयन के लिए एक ट्रस्ट गठित किया जाएगा। ट्रस्ट की प्रबंध समिति के अध्यक्ष पुलिस महानिदेशक होंगे। समिति में एक उपाध्यक्ष, सचिव और 12 सदस्य होंगे।अंशदानयोजना में प्रत्येक पुलिस कर्मचारी को 50 रुपए प्रतिमाह अंशदान देना होगा। प्रदेश पुलिस में लगभग 80 हजार अधिकारी-कर्मचारी हैं। योजना में प्रत्येक सदस्य, उसकी पत्नी और बच्चों को एक वित्तीय वर्ष में 8 लाख रुपए तक के इलाज की पात्रता रहेगी। शासन के नियमानुसार चिकित्सा प्रतिपूर्ति शासन सीधे ट्रस्ट को करेगी। प्रदेश के भीतर 30  तथा बाहर के 31 अस्पतालों में उनका इलाज हो सकेगा।

प्रदेश के बड़े अस्पताल
 इंदौर का बाम्बे हॉस्पिटल, सिनर्जी हॉस्पिटल एवं हार्डिया नेत्र चिकित्सालय, भोपाल का चिरायु, पीपुल्स, भोपाल मेमोरियल, जवाहर लाल हॉस्पिटल एवं रिसर्च सेंटर, जबलपुर का भण्डारी, जामदार, जबलपुर हॉस्पिटल, नेशनल हॉस्पिटल, ग्वालियर का सहारा हॉस्पिटल, बि़ड़ला हॉस्पिटल एवं कैंसर हॉस्पिटल, उज्जैन का आरडी गार्डी मेडिकल कॉलेज एवं बिरला हॉस्पिटल और एपेक्स हॉस्पिटल देवास, सीएचएल जैन दिवाकर हॉस्पिटल रतलाम, शारदा हॉस्पिटल खरगोन, कमला जैन हॉस्पिटल मंदसौर, गोमाबाई हॉस्पिटल नीमच, प्रकाश हॉस्पिटल खण्डवा, अरिहंत हॉस्पिटल इटारसी, नाहर नर्सिंग होम छिन्दवा़ड़ा, मिशन हॉस्पिटल पाढर बैतूल और बिरला हॉस्पिटल सतना शामिल हैं।

देश के नामचीन अस्पताल
नई दिल्ली के एम्स, जेपी पंत, एस्कार्ट एवं अपोलो, मुम्बई का जसलोक, टाटा मेमोरियल, नानावटी, बाम्बे एवं लीलावती, चेन्नाई का अपोलो, पनाडालिया कार्डियो फाउण्डेशन एवं शंकर नेत्रालय, हैदराबाद का निजाम इंस्टीट्यूट, मेडिसिन केयर एशियन इंस्टीट्यूट, लखनऊ का पीजीआई, हैदराबाद का अपोलो, ब़ड़ौदा का भाईलाल अमीन, अहमदाबाद का साल, गुड़गांव का मेदान्ता, जयपुर का महावीर और नागपुर का अनरेजा हॉस्पिटल, योकार्ड, अरिज, महात्मा आई, फरीदाबाद का फोर्टिस, मदुरई का अरविंद आई केयर और बैंगलुरू का जिमहेंस, नारायण एवं कोलम्बिया हॉस्पिटल शामिल है।

करीबन 5 करोड़ तो पुलिसकर्मियों से हो जाएगा इकट्ठा
पुलिसकर्मियों के इलाज के लिए स्वास्थ्य सुरक्षा योजना में हर साल प्रत्येक पुलिसकर्मी से 600 रुपए साल के मान से प्रदश्ो के 80 हजार पुलिसकर्मियों से 4 करोड़ 80 लाख रुपए इकट्ठा हो जाएगा। इस राशि का ब्याज मिलकर पुलिस विभाग के पास तकरीबन 6 करोड़ रुपए इकट्ठा हो जाएगा। प्रत्येक पुलिसकर्मी को एक वित्तीय वर्ष में 8 लाख रुपए के इलाज तक की पात्रता रहेगी। ऐसे में पुलिसकर्मियों को मिलने वाले मेडीकल क्लेम में कटौती होगी। इससे पुलिस विभाग को रुपए की बचत होगी और जो पुलिसकर्मियों से राशि इकत्रित होगी उसी से सालाना इलाज हो सकेगा। पुलिस विभाग एक बीमा कम्पनी से भी इस बारे में बात कर रही है। ऐसे में अंशदान, बीमाकम्पनी को देकर पुलिस विभाग वेफिक्र हो जाएगा। अंशदान की राशि से ज्यादा का इलाज होने पर बीमा कम्पनी भुगतान करेगी और इलाज कम को होगा तो बीमा कम्पनी को लाभ मिलेगा। बीमा कम्पनी इस रुपए को इन्वेस्ट करके अन्य स्त्रोतों से कमाई भी कर सकेगी।

एक बेवफा, वफा चाहती थी, मिली मौत




भिलाई की सुनीता अपनी मर्जी से जीने वाली आधुनिक ख्याल युवती थी। खुद को आधुनिक और आजाद ख्याल मानने वाली सुनीता ने पढ़ाई के बाद कॉल सेंटर में नौकरी शुरु कर दी और जिनेंद्र से प्यार करते हुए अपनी मर्जी से शादी भी कर ली। लेकिन आजाद ख्याली के चलते शादी के महज 6 माह के भीतर ही उसका दिल पति के दोस्त योगेंद्र पर आ गया और पति को छोड़ योगेंद्र के साथ रातें गुजारने लगी। अवैध संबंधों के चलते सुनीता गर्भवती हुई तो योगेंद्र पर शादी के लिए दबाव बनाया, लेकिन योगेंद्र ने साफ इंकार दिया। योगेंद्र पर ज्यादा दबाव डाला तो योगेंद्र ने सुनीता की हत्या कर दी। ये हकीकत है पिछले हफ्ते भोपाल स्टेशन के पास मृत मिली सुनीता की। ऐसे दर्जनों उदाहरण हैं जहां प्यार, आधुनिकता और आजाद ख्यालों के नाम पर अवैध संबंध पनपते हैं और उनका परिणाम हत्या जैसे जघन्य अपराध होता है। समाजशास्त्री इसका कारण वासनात्मक प्रवृत्ति और सामाजिक वर्जनाओं का तार-तार होना मानते हैं। हाईप्रोफाइल ही नहीं मध्यमवर्गीय और निम्नवर्गीय परिवारों में भौतिक चकाचौंध में संबंधों के महत्व को खत्म कर दिया है।

प्रमोद त्रिवेदी, भोपाल


पति-पत्नी का रिश्ता जन्म-जन्मांतर का कहा जाता है, लेकिन अब सात फेरों का महत्व और आपसी विश्वास की जगह वासनात्मक प्रवृति ने ले ली है। हाईप्रोफाइल में रिश्तों के महत्व को कमतर आंकने की बात सामने आई, लेकिन करीबन एक दर्जन घटनाएं ऐसी हैं जिनमें मध्यमवर्गीय और निम्नवर्गीय परिवार तबाह हुए हैं। इनकी तबाही का कारण बने अवैध संबंध। इनमें कहीं अवैध संबंधों के चलते पत्नी ने पति की हत्या कर दी तो कहीं युवक ने अपनी प्रेमिका की। समाज में इस तरह के अपराध होते रहे हैं, लेकिन कुछ सालों में ऐसी घटनाओं में अचानक इजाफा हुआ है। अपराध विशेषज्ञ कहते हैं कि ऐसी हत्याएं या अपराध सामाजिक अपराध की श्रेणी में आते हैं। ऐसे अपराधों को कानून रोक नहीं सकता। इन्हें केवल समाज ही रोक सकती है। आधुनिकता की मनमानी परिभाषा निकालने वाले समाज का एक तबका खुद भी तबाह हो रहा है और सामाजिक मूल्यों को भी खत्म कर रहा है।
छह माह में ही भर गया था पति से दिल
रेलवे स्टेशन के पास 20 अगस्त को बैग में एक युवती की लाश मिली थी। मंगलवारा पुलिस ने हत्या का अपराध दर्ज कर जांच शुरू की, तो मृतका की पहचान भिलाई निवासी सुनीता पांडे के रूप में हुई थी। जांच के दौरान पता चला कि वह इंदौर के एक काल सेंटर में काम करती थी। उसका साथ में काम करने वाले झाबुआ निवासी जिनेंद्र तिवारी से प्रेम प्रसंग था। दोनों ने 14 माह पहले मंदिर में शादी कर ली थी। लेकिन यह संबंध ज्यादा दिन नहीं चल सका और छह माह बाद ही दोनों अलग हो गए। अति महत्वाकांक्षा, खुलापन और शारीरिक संबंधों को महत्व देना इस युवती के लिए जानलेवा साबित हुआ। युवती का दिल शादी के चंद दिन बाद ही पति के दोस्त पर आ गया और उससे भी शारीरिक संबंध बना लिए। सुनीता के जीवन में जिनेंद्र तिवारी का दोस्त योगेंद्र गुप्ता आ गया। उनके बीच शारीरिक संबंध स्थापित हो गए। सुनीता खुले विचारों की तेज तर्रार युवती थी। उसने योगेंद्र पर शादी के लिए दबाव डालना शुरू कर दिया। बेरोजगार योगेंद्र शादी करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था। वह आनाकानी कर बात टाल देता था। इस बीच सुनीता गर्भवती हो गई। उसे चार माह का गर्भ था। उसने योगेंद्र को धमकी दी थी कि अगर जल्दी शादी नहीं की, तो वह उसे कहीं का नहीं छोड़ेगी। इससे वह परेशान होकर अपने गांव करैरा शिवपुरी चला गया। सुनीता भी अपने घर चली गई। उसने 15 अगस्त को फोन करके योगेंद्र को महेंद्रा फायनेंस कंपनी में नौकरी लगवाने के नाम पर भोपाल बुलवाया। वह 16 अगस्त को बस स्टैंड पर पंचवटी होटल में ठहर गया। उधर परिजनों को सुनीता यह कह कर भोपाल आ गई कि उसे पीएफ फंड निकालना है। वह 17 अगस्त की सुबह भोपाल आई। इसके बाद वह योगेंद्र को हबीबगंज रेलवे स्टेशन के पास महेंद्रा फायनेंस कंपनी में इंटरव्यू दिलाने भी ले गई। इसके बाद दोनों शहर में सैर सपाटा करते रहे। उन्होंने फिल्म भी देखी। 18 और 19 अगस्त की दरम्यानी रात योगेंद्र ने पंचवटी होटल में सोते समय रजाई से सुनीता का मुंह दबाकर हत्या कर दी। सुबह लाश को ठिकाने लगाने के लिए उसे रेलवे स्टेशन से एक पिट्टू बैग खरीदा और उसमें शव रखकर आॅटो रिक्शा से हमीद मंजिल के खंडहर में ठिकाने लगा दिया। पुलिस ने आरोपी योगेंद्र गुप्ता को गिरफ्तार कर लिया है।

मारकर तालाब में फेंका
 निशातपुरा थाने के नबीबाग में रहने वाले रामबाबू की लाश 29 नबम्बर 2010 को दामखेड़ा के सीवेज तालाब में खून से लथपथ मिली। पुलिस की जांच में सामने आया कि अवैध संबंधों के चलते रामबाबू की हत्या उसकी पत्नी ने प्रेमी महेंद्र मीना और रंजीत तोमर के साथ मिलकर कर दी और लाश को फेंक दिया था।

विरोध किया तो गला घोंटा
बैरसिया में रहने वाले तोरण सिंह की पत्नी के अवैध संबंध पड़ोस में रहने वाले प्रतिपाल सिंह से हो गए। तोरण सिंह को पता चला तो उसने विमला को समझाया, लेकिन विमला नहीं मानी। इसके बाद 15 नबम्वर 2009 को विमला ने प्रतिपाल सिंह की मदद से गलाघोंटकर तोरण सिंह की हत्या कर दी। इस मामले में विमला को आजीवन कारावास की सजा हुई है।

आजाद रहना चाहती थी पत्नी
विश्वकर्मा नगर में रहने वाले मांगीलाल की हत्या भी उसकी पत्नी ने की। मांगीलाल की पत्नी ममता गिरी के अवैध संबंध मांगीलाल के दोस्त जयप्रकाश से बन गए। मांगीलाल को अवैध संबंधों का पता नहीं था, लेकिन ममता गिरी ने मांगीलाल को रास्ते से हटाकर आजाद जिंदगी जीने का सपना देखा। ममता ने जयप्रकाश से फोन करवाकर मांगीलाल को बुलवाया और प्रेमी की मदद से गलारेत कर हत्या कर दी।

हवस ने करवाई हत्या
कोहेफिजा में रहने वाली रेखा का उसका पति राहुल बहुत चाहता था। रेखा के कहने पर ही राहुल भोपाल आया और सिक्यूरिटी गार्ड की नौकरी करने लगा। लेकिन वासना की भूखी रेखा के राहुल के दोस्त अटल और सुरेंद्र सिंह से संबंध हो गए। रेखा ने 21 अप्रैल 2012 को अटल और सुरेंद्र के साथ मिलकर राहुल की हत्या कर दी।

कुल्हाड़ी से काटा
शिवनगर में रहने वाले देवीसिंह की 26 अप्रेल 2012 को कुल्हाड़ी मारकर हत्या कर दी गई। पुलिस जांच में सामने आया कि देवी सिंह की हत्या रजनी और उसके भाई गोकुल ने की है। पुलिस के अनुसार रजनी के संबंधों का पता देवीसिंह को चला तो रजनी ने देवी सिंह की हत्या कर दी।

बेटे के सामने पति को मारा
बैरसिया निवासी धनवीर की 4 अगस्त 2012 की रात अज्ञात हत्यारों ने हत्या कर दी। पुलिस ने मामले की जांच की तो सामने आया कि धनवीर की पत्नी बनारसी के सोनू सक्सेना नाम के युवक से अवैध संबंध हैं। इसके बाद धनवीर के बेटे ने बताया कि रात के समय सोनू और बनारसी ने मिलकर धनवीर को मौत के घाट उतार दिया। धनवीर को बनारसी के अवैध संबंधों की जानकारी नहीं थी, लेकिन बनारसी आजादी से सोनू सक्सेना के साथ रहना चाहती थी।

शराब मिलाकर कर दी हत्या
करोद के पीपल चौक पर रहने वाले आॅटो चालक की लाश पीपुल्स हास्पिटल भानपुरा पर मिली। पुलिस ने मामले की तफ्शीश की तो सामने आया कि अवैध संबंधों के चलते आटो चालक की पत्नी निधि ने ही अपने प्रेमी राजेश और भूपेंद्र के साथ मिलकर आटो चालक की हत्या की है। आरोपियों ने आटो चालक को शराब पिलाई और गलाघोंटकर हत्या कर दी।
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समाज में बदलाव आता है। लोग आधुनिक ख्यालों में जीना चाहते हैं, लेकिन आधुनिकता का मतलब ये कतई नहीं है कि सामाजिक मर्यादाओं को तोड़ा जाए। आधुनिक ख्यालों में समाज की उन्नति की बात होती है। हर वर्ग को समान अधिकार और महिलाओं के सम्मान और अधिकारों की बात होती है। लेकिन कोई भी आधुनिक समाज अश्लीलता और अवैध संबंधों को बढ़ावा देने की वकालात नहीं करता। युवा पीढ़ि भटकती जा रही है। वो आधुनिकता और आजादी का मतलब हवस, वासना और मनमानी मान रही है। यही समाज को विपरीत दिशा में ले जाने के लिए जिम्मेदार है। खासकर अभिभावकों का सम्मान खत्म हो रहा है। लोग अपने बुजुर्गों की बात नहीं मानते और मनमर्जी से शारीरिक आकर्षण के चलते शादी कर लेते हैं। इसके बाद आकर्षण खत्म होता है तो इस तरह के अपराध होते हैं। इसमें सबसे चिंताजनक है मध्यमवर्ग और निम्न वर्ग में इस तरह के अपराधों की बढ़ोतरी। शिक्षा के अभाव और आर्थिक विषमताओं के कारण भी समाज में इस तरह के अपराध होते हैं। चैनलों पर भी हिंसक और समाज का लज्जित करने वाले धारावाहिक और फिल्में आ रही हैं। ये लोगों को सही रास्ता दिखाने की जगह भटकाने का काम कर रहीं हैं।
डॉ. आरके शर्मा, समाजशास्त्री

सात करोड़ जनता का श्रवणकुमार....हरि दर्शन कराएगा हमारा शिव



बुजुर्गों को तीर्थ कराने वाली दुनिया की पहली शिव सरकार

कोई रामेश्वरम जाएगा तो कोई अजमेर शरीफ

श्रवण कुमार की कहानियां सुनी थीं, लेकिन श्रवण कैसा था ये आज देखने को मिल गया। श्रवण ने तो केवल अपने माता-पिता को तीर्थ दर्शन करवाए थे लेकिन हमारे मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने तो प्रदेश के हर घर के माता-पिता को तीर्थ दर्शन कराने का बीड़ा उठा लिया। ऐसी यात्रा जिसमें न तो जात-पात का भेदभाव है और न किसी आयवर्ग और मजहब का। चाहे अमीर हो या गरीब, सबके लिए मुख्यमंत्री तीर्थ कराने का संकल्प ले चुके हैं और उसे पूरा भी कर रहे हैं। पहली यात्रा 3 सितम्बर को जा रही है। बुजुर्ग इस यात्रा को लेकर उत्साहित हैं और बुजुर्गों के परिजन बेफिक्र होकर तीर्थ दर्शन को भेज रहे हैं। लेकिन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान अपने एक हजार बुजुर्गों की यात्रा की तैयारियों को लेकर एक पल भी चैन से नहीं बैठ रहे। बुजुर्गों की हर सुविधा के लिए बिंदुबार समीक्षा कर रहे हैं और हर अधिकारी को चेता दिया है कि हमारे बुजुर्गों को किसी तरह की तकलीफ न हो जाए। 

प्रमोद त्रिवेदी

प्रदेश के हर बुजुर्ग की आत्मा से बस केवल दुआएं ही निकल रही हैं। जो फर्ज हमारे सगे बेटे नहीं निभा पाते वो हमारा लाड़ला शिवराज सिंह निभा रहा है। शिवराज सरकार का एक ऐसा फैसला जो प्रदेश नहीं दुनिया के लिए मिसाल बन गया। दुनिया की पहली सरकार बन गई जिसने बुजुर्गों को सरकार के खर्च पर तीर्थ कराने की योजना बनाई और तत्काल अमलीजामा भी पहना दिया। मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान ने तीर्थ-दर्शन पर जाने वाले प्रथम जत्थे की तैयारियों की बिन्दुवार समीक्षा करते हुए अधिकारियों को निर्देश दिए कि बुजुर्गों की सभी जरूरतों का ख्याल रखा जाय। सुनिश्चित किया जाए कि रास्ते में किसी को यात्रा संबंधी कोई कठिनाई नहीं आने पाए। मध्यप्रदेश सरकार की अनूठी पहल के जरिए 3 सितम्बर को प्रदेश के बुजुर्गों को ससम्मान रामेश्वरम तीर्थ-दर्शन के लिए रवाना किया जाएगा। मुख्यमंत्री तीर्थ-दर्शन योजना में यह सिलसिला आगे निरंतर जारी रहेगा। शासकीय खर्चे पर हरि-दर्शन की लालसा पूरी करवाने वाला और सभी धर्म एवं मजहब के तीर्थों पर ले जाने वाला मध्यप्रदेश देश का ही नहीं पूरी दुनिया का पहला राज्य है। पहली तीर्थ-यात्रा की सभी तैयारियां पूरी हो गयी हैं।
धर्मस्व एवं जनसंपर्क मंत्री लक्ष्मीकांत शर्मा ने व्यवस्थाओं की जानकारी देते हुए बताया कि तीर्थ-यात्रियों का पहला जत्था भोपाल के हबीबगंज स्टेशन से 3 सितम्बर को शाम 5.30 बजे रवाना होगा। इस अवसर पर तीर्थ-यात्रा में जाने वाले बुजुर्ग यात्रियों के सम्मान में दोपहर 3 बजे रेलवे स्टेशन प्रांगण में समारोह का आयोजन किया जाएगा। समारोह में प्रसिद्ध भजन गायक अनूप जलोटा अपनी प्रस्तुति देंगे। यात्री दल के साथ प्रदेश की पुलिस का एक चार का सुरक्षा बल, आवश्यक दवाओं सहित चिकित्सा दल, कैमरामेन, वीडियोग्राफर के साथ ही प्रत्येक बोगी में 69 तीर्थ-यात्री होंगे। तीर्थ-यात्रियों के साथ एक शासकीय और दो रेलवे कर्मचारी तैनात किए जा रहे हैं। इस रेल गाड़ी में 18 कोच होंगे जो सीधे भोपाल से रामेश्वरम् जाएगी। रामेश्वरम से वापिसी के मार्ग में बैतूल, इटारसी और होशंगाबाद स्टेशनों पर रेल गाड़ी रूकेगी।
सारी व्यवस्था सरकार के खर्च पर
रामेश्वरम की इस प्रथम यात्रा के बाद आगे जो भी तीर्थ-यात्रा हो उसमें तीर्थ-यात्रियों को रेल मार्ग पर पड़ने वाले प्रमुख दर्शनीय स्थलों में भी घुमाया जाएगा। इसके लिए मुख्य तीर्थ-स्थल के मार्ग में पड़ने वाले दर्शनीय-स्थलों का पहले से चयन कर लिया गया है और सारी व्यवस्थाएं पहले से कर दी गई हैं। 18 कोच वाली इस गाड़ी में 15 कोच स्लीपर के होंगे। वहीं 1 पेंट्री कार एवं दो एसएलआर कोच होंगे। ट्रेन में यात्रियों को सुबह की चाय, नाश्ता, दोपहर का खाना, शाम की चाय और रात का खाना आईआरसीटीसी (प्रदेश सरकार से अधिकृत) की तरफ से दिया जाएगा। इसके लिए यात्रियों को कोई शुल्क अदा नहीं करना होगा। रामेश्वरम में होटल में ठहरने के दौरान बिस्तर और भोजन की व्यवस्था की गई है। यात्रियों को किसी भी स्थान पर कोई परेशानी ना हो इसके लिए प्रत्येक कोच में गाइड रहेंगे। एक हजार यात्रियों के आने-जाने की व्यवस्था की है। उन्होंने बताया कि रामेश्वरम में एक हजार यात्रियों को एक ही होटल में ठहराना संभव नहीं होगा। इसके लिए अलग-अलग होटल की व्यवस्था है। होटल में यात्रियों के लिए नाश्ता, भोजन और बिस्तर की व्यवस्था की गई है। इसके अलावा अन्य स्थानों पर घुमाने के लिए बस की व्यवस्था भी सरकार के निर्देश परआईआरसीटीसी ने की है।
अगली यात्रा अजमेर शरीफ
 मुख्यमंत्री तीर्थ-दर्शन योजना की दूसरी यात्रा के लिए ट्रेन 13 सितंबर को अजमेर शरीफ के लिए रवाना होगी। जिसमें यात्रा में भोपाल, होशंगाबाद और उज्जैन संभाग के 977 वृद्धजन शामिल होंगे। अजमेर शरीफ यात्रा के लिए आवेदन 3 सितम्बर तक लिए जाएंगे। आवेदन निकटतम तहसील,उप तहसील अथवा कलेक्टर द्वारा निर्धारित अन्य स्थानों पर जमा किए जा सकते हैं। अजमेर शरीफ की तीर्थ-यात्रा में जिला राजगढ़ से 48, विदिशा से 71, भोपाल से 244, सीहोर से 63, रायसेन से 58, बैतूल से 18, हरदा से 16, होशंगाबाद से 25, उज्जैन से 110, शाजापुर से 81, देवास से 78, रतलाम से 72, मंदसौर से 61 और नीमच से 32 यात्री शामिल होंगे।

पुलिस अधिकारियों के आगे झुकी सरकार,..: दो साल रुको फिर खाओ मलाई


 चाहते हैं सिर्फ कमाऊ पोस्टिंग


केवल दो साल निकाल लो, फिर जहां चाहोगे पोस्टिंग दे दूंगा। आप लोगों का तबादला ट्रेनिंग सेंटर जैसी जगहों पर कर दो तो जुगाड़ लगाकर केंसिल करवा लेते हो। ये कहना पड़ा प्रदेश के गृहमंत्री उमाशंकर गुप्ता को। दरअसल, ट्रेनिंग सेंटर और सीआईडी जैसी करीबन आधा दर्जन पुलिस की शाखाओं को अधिकारी लूप लाइन समझते हैं, क्योंकि इनमें कमाई नहीं होती। जाहिर है कि जिले में और पुलिस विभाग की अन्य शाखाओं में पुलिस अधिकारी जमकर अवैध कमाई करते हैं। इतना ही नहीं वकौल गृहमंत्री सरकार के चाहने पर भी अपनी मर्जी के खिलाफ तबादला नहीं लेते। पुलिस अधिकारियों की मनमानी से परेशान गृहमंत्री के अच्छी पोस्टिंग के लालच में भी कोई पुलिस अधिकारी नहीं फंस रहा। इसका कारण है दो साल पूरे होने से पहले चुनाव हो जाएंगे और नए गृहमंत्री के हाथ में भविष्य का फैसला होगा। आईपीएस के आग सरकार की मजबूरी, मलाईदार पदों पर जुगाड़ लगाने के कारण बिगड़ती कानून व्यवस्था और हावी नौकरशाही पर फोकस करती

 प्रमोद त्रिवेदी की स्टोरी....

 भोपाल। 
जनप्रतिनिधि नेतागिरी करें तो बात समझ आती है, लेकिन वर्तमान में प्रदेश के अफसर नेतागिरी पर उतारू हो गए हैं। ये अफसर बाकायदा सत्तापक्ष के मंत्रियों के साथ लॉबिंग करके अपने हित साधते हैं। सरकार पर नौकरशाही हावी होने के आरोप लगते रहे हैं, लेकिन सत्तापक्ष हमेशा इन आरोपों को नकार देता है। लेकिन पुलिस ट्रेनिंग सेंटरों की समीक्षा बैठक में गृहमंत्री के वक्तव्य से जाहिर हो गया कि सरकार आईएएस से ही नहीं आईपीएस से भी परेशान है। इसमें खास बात ये है कि मलाईदार पदों की लालसा रखने वाले अधिकारी सरकार को झुका लेते हैं। यानि सरकार जानती है कि अधिकारी, कमाई के लिए कुछ पदों पर जाना चाहते हैं। फिर भी सरकार इन अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई तो दूर रोटेशन में तबादले भी नहीं कर पाती। गृहमंत्री ने खुद कहा कि तबादला करो तो ये लोग केंसिल करा लेते हैं। ऐसे में समझा जा सकता है कि प्रदेश सरकार पर नौकरशाही जनता के लिए खुद के भले के लिए पूरी तरह हावी है। यहीं कारण रहा पुलिस ट्रेनिंग सेंटर जैसे पद खाली रह जाते हैं और अन्य पदों के लिए मारा-मारी रहती है। सबसे बड़ा उदाहरण राजधानी में सामने आया। यहां तीन एसपी सिस्टम करने पर डायरेक्ट आईपीएस अफसर ने भोपाल में पदस्थापना लेने से इंकार कर दिया। इसके पहले भी एसएसपी सिस्टम में भी भोपाल पदस्थापना के लिए आईपीएस अधिकारियों के मना करने पर अन्यत्र तबादले की बात सामने आ चुकी है।
दो साल बाद का किसने देखा
गृहमंत्री ने पुलिस अधिकारियों को लालच दिया कि दो साल ट्रेनिंग सेंटर में बिताने पर मनमाफिक पदस्थापना दी जाएगी। लेकिन कई अधिकारियों का कहना है कि दो साल बीतने से पहले चुनाव हो चुकेंगे। ऐसे में दो साल बाद की स्थिति क्या होगी? इस तरह के मौखिक वादे कई बार हुए और नई सरकार और नए मंत्रियों ने उन्हें खारिज कर दिया। ऐसे में मनमाफिक पोस्टिंग के लिए मर्जी से तो दो साल लूप लाइन में रहने का बलिदान नहीं दिया जा सकता। दूसरी बात जब मलाईदारों पदों के लिए अभी भी अधिकारी सरकार को झुका लेते हैं तो बाद में ऐसा नहीं होगा, इसकी क्या गारंटी है। ऐसे में लूप लाइन वाले तो लूप में ही रह जाएंगें।
मेन्यूअल के खिलाफ
एक पुलिस अधिकारी ने बताया कि आईपीएस हो या राज्य सेवा का अधिकारी, कोई भी मनमानी पोस्टिंग के लिए दावा नहीं कर सकता। गृहमंत्री ने भले ही कह दिया हो, लेकिन नियमानुसार ऐसा कोई लिखित रोटेशन नहीं है और न सेवा शर्तों में शामिल है। कई बार अधिकारियों को कोर्ट से बार-बार तबादलों के खिलाफ स्टे लेना पड़ा है। सरकार खुद के बनाए नियमों से कभी भी मुकर जाती है। तबादला पद्धति इसीलिए लागू की गई कि अधिकारी एक ही जगह पर रहकर निजी लाभ के कार्य न कर सके। अधिकारी हो या कर्मचारी, शासन के नियमानुसार किसी विशेष जगह पर पदस्थ रहने के लिए दबाव नहीं बना सकता।
राजधानी में प्रमोटी से चला रहे काम
पुलिस विभाग में आईपीएस का दबाव इस कदर रहता है कि अधिकारी तबादला होने के बाद मनमानी पोस्टिंग न मिलने पर जाने से इंकार कर देते हैं। राजधानी में एसपी पोस्टिंग को लेकर कई बार इस तरह की मनमर्जी सरकार को झेलनी पड़ी है। एसएसपी सिस्टम के समय एक आईपीएस ने भोपाल पोस्टिंग लेने से साफ इंकार कर दिया था। उस आईपीएस का कहना था कि वह एसएसपी के अंडर काम नहीं करेगा। आईपीएस ने मुरैना पोस्टिंग के दौरान मुरैना क्षेत्र के एक कद्दावर सत्तापक्ष के मंत्री से दबाब डलवाकर अपना तबादला मध्यप्रदेश के दूसरे महानगर में करवा लिया था। यही हाल एसएसपी सिस्टम खत्म होने के बाद तीन एसपी सिस्टम में देखने मिला। राज्य सरकार की मर्जी पर कोई भी डायरेक्ट आईपीएस राजधानी में पदस्थ होने को तैयार नहीं हुआ तो सरकार को प्रमोटी आईपीएस को पदस्थ करना पड़ा।
हर अफसर की लॉबिंग
ऐसे कम ही अफसर होंगे जो नेताओं की तरह लॉबिंग न करते हों। कई अफसर तो दावा करते हैं कि उनकी फलां जगह पोस्टिंग होगी और फलां जगह भेजने की किसी में ताकत नहीं हैं। ऐसे कई अफसर हैं जिनके सत्तापक्ष के मंत्रियों से यारी रहती है और पोस्टिंग और तबादले रुकवाने में इन्हीं मंत्रियों की मदद से सरकार पर दबाव डलवाते हैं। कांग्रेस सरकार रहे या भाजपा, इनकी सेहत पर कोई असर नहीं होता। यानि अफसरी करते हुए भी फुल नेतागिरी करने वाले अफसरों की प्रदेश में भरमार है।

इन शाखाओं को समझते हैं लूप लाइन


  • -पुलिस ट्रेनिंग सेंटर
  • -सीआईडी
  • -स्टेट क्राइम रिकार्ड ब्यूरो
  • -विशेष शाखा
  • -लोकायुक्त 
  • -ईओडब्लू
  • -फायर
  • -मुख्यालय में एआईजी


पावर और पैसे की चाहत
अफसरों की लॉबिंग होती है पावर और पैसे के लिए। लूप लाइन समझे जाने वाली शाखाओं में न तो अफसरों को ज्यादा सुविधा होती है और न रुतबा रहता है। ये अलग बात है कि हर शाखा का अपना महत्व है और हर शाखा में काम की कोई कमी नहीं रहती है। सीआईडी के एडीजी एमआर कृष्णा कहते हैं कि भले ही लोग सीआईडी को लूप लाइन कहें, लेकिन इस शाखा का महत्व भी कम नहीं आंका जा सकता। ये अलग बात है कि यहां स्टाफ और संसाधनों की कमी है, लेकिन काम की कोई कमी नहीं है। अफसरों को मन लगाकर काम करना चाहिए तो हर शाखा की उपयोगिता साबित हो सकती है। एक अन्य सीआईडी के वरिष्ठ अफसर कहते हैं कि फील्ड में काम करने वाले अफसरों की जमकर कमाई होती है। उन्हें सुविधाओं भी बहुत मिलती हैं और रुतबा भी रहता है। जिले में रहने वाले एसपी पर दो से तीन वाहन रहते हैं और क्षेत्र में रुतबा भी रहता है। साथ ही सत्तापक्ष से काम पड़ने पर नेता मदद भी करते हैं। वहीं सीआईडी, पुलिस ट्रेनिंग सेंटर जैसी शाखाओं में सुविधाएं बहुत कम हैं। न तो आॅफिस ढंग के हैं और न ही संसाधन। डीआईजी स्तर के अधिकारी के पास भी केवल एक वाहन की सुविधा होती है। सरकारी काम से अन्य जिले में जाने पर जिले के एसपी से वाहन और गार्ड के लिए गुहार लगानी पड़ती है। यहीं कारण है कि फील्ड में और मलाईदार पदों पर रहने वाला अफसर हमेशा इन्हीं पदों पर रहता है और लूप लाइन में पहुंच चुके अफसर की नौकरी ही लूपलाइन में निकल जाती है।

शेहला मसूद हत्याकांड....गवाहों को पुलिस करेगी कोर्ट में हाजिर



भोपाल। गुरुवार को शेहला मसूद हत्याकांड में ट्रायल के दौरान शेहला के पिता और एक अन्य रिश्तेदार की गवाही थी, लेकिन दोनों हाजिर नहीं हुए। इन लोगों ने कोर्ट में आवेदन भी नहीं लगाया। सीबीआई और जाहिदा के वकील के अनुरोध पर दोनों गवाहों के खिलाफ कोर्ट ने जमानती वारंट जारी किया है। जमानती वारंट पर भी गवाह हाजिर नहीं हुए तो कोर्ट गिरफ्तारी वारंट जारी करेगा और शेहला के पिता को पुलिस कोर्ट में हाजिर करेगी।
शहला मसूद हत्याकांड में सीबीआई विशेष न्यायालय में ट्रायल शुरू नहीं हो सकी। सीबीआई द्वारा प्रस्तुत ट्रायल प्रोग्राम के मुताबिक गुरुवार को मृतका शहला के पिता सुल्तान मसूद व एक अन्य रिश्तेदार गवाही के लिए नहीं पहुंचे। कोर्ट ने इसे गंभीरता से लेते हुए दोनों के खिलाफ जमानती वारंट जारी किए हैं। शुक्रवार को दो अन्य गवाहों के बयान दर्ज किए जाएंगे। सीबीआई विशेष कोर्ट में न्यायाधीश अनुपम श्रीवास्तव के समक्ष गुरुवार को शहला हत्याकांड की दो दिनी सुनवाई प्रारंभ हुई। पहले दिन सीबीआई द्वारा प्रस्तुत दो गवाहों के बयान दर्ज किए जाने थे। इनमें शहला के पिता सुल्तान मसूद व दूसरे परिजन सैय्यद साहिल हुसैन के बयान होने थे। पाँचों आरोपियों जाहिदा परवेज, सबा फारुखी, ताबिश, इरफान व शाकिब डेंजर को भी पेश किया गया था। कोर्ट द्वारा दोपहर तक गवाहों का इंतजार किया गया। इसके बाद सीबीआई के विशेष लोक अभियोजक हेमंत शुक्ला से दोनों के उपस्थित होने की संभावाओं पर पूछा गया। कोर्ट ने कहा कि ट्रायल के लिए गवाहों को कोर्ट में उपस्थित कराने की जिम्मेदारी सीबीआई की है। यह सुनिश्चित किया जाए कि गवाह समय पर कोर्ट में मौजूद रहें। इसी बीच आरोपियों की ओर से मौजूद अभिभाषक परवेज आलम व सुनील श्रीवास्तव ने कहा कि आरोपी जेल में बंद हैं। ट्रायल के लिए नियत तिथि पर गवाह उपस्थित नहीं होंगे तो प्रकरण की सुनवाई में देरी होगी। उन्होंने दोनों के खिलाफ जमानती वारंट जारी करने की मांग की। सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद कोर्ट ने जमानती वारंट जारी किए। सुनवाई शुक्रवार को भी जारी रहेगी। इस दिन एमआर उईके व अन्य गवाहों के बयान होंगे। क्षेत्राधिकार का मामला हाई कोर्ट में विचाराधीन प्रकरण से जुड़े सभी पक्ष सुनवाई भोपाल में चाहते हैं। इसके लिए कोर्ट में आवेदन भी लगाए गए थे, जिन्हें खारिज किया जा चुका है। हाल ही में दो आरोपियों द्वारा क्षेत्राधिकार को लेकर हाई कोर्ट में याचिका दायर की गई है। जिस पर सुनवाई होना है।

गुरुवार, 30 अगस्त 2012

कभी भी हैक हो जाएगा हमारा देश


भोपाल।भारत की संवेदनशील सरकारी और निजी वेबसाइटों पर हैकिंग का खतरा मंडरा रहा है। साइबर सुरक्षा एजेंसियों ने इस संबंध में इंटरनेट उपभोक्ताओं और आॅपरेटरों के लिए अलर्ट भी जारी किया है। डिस्ट्रीब्यूटिड डिनायल आॅफ सर्विस [डीडीओएस] के माध्यम से होने वाले इन साइबर हमलों से बचने के लिए इंटरनेट उपभोक्ताओं को कंप्यूटर सुरक्षा प्रणाली व फायरवाल को और दुरुस्त करने की सलाह दी गई है।
कंप्यूटर सुरक्षा से जुड़ी घटनाओं से निपटने वाली संस्था इंडियन इमरजेंसी रेस्पांस टीम [सीईआरटी-आइएन] द्वारा जारी चेतावनी में कहा गया है, 'हैकर समूहों द्वारा डीडीओएस के जरिये महत्वपूर्ण सरकारी और निजी संगठनों की वेबसाइटों पर साइबर हमले की घटनाएं सामने आ रही हैं। इसे देखते हुए पर्याप्त सुरक्षा उपाय अपनाना आवश्यक है।' डीडीओएस साइबर हमले से प्रभावित कंप्यूटरों पर मुहैया की जा रही सेवाएं बाधित हो जाती हैं। साइबर सुरक्षा विशेषज्ञों के मुताबिक हैकरों के इस हमले से विशेष साइबर सुरक्षा टूल को नियमित रूप से अपडेट कर बचा जा सकता है।
देश की महत्वपूर्ण वेबसाइटों पर लगातार हो रहे साइबर हमले की घटनाओं पर बजट सत्र के दौरान सरकार ने एक रिपोर्ट भी पेश की थी। इसके अनुसार 2011 में 13 हजार और 2009 में करीब आठ हजार साइबर हमले की घटनाएं सामने आईं। राज्यसभा में एक प्रश्न के लिखित जवाब में संचार व सूचना तकनीक राज्य मंत्री सचिन पायलट ने सीईआरटी-आइएन की रिपोर्ट के हवाले से बताया था कि पिछले साल साइबर हमलों में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई।

एके 47 से भी बेहतरीन थे क्रांतिकारियों के हथियार



तोंपे और फूट डालने की नीति न होती तो देश बहुत पहले होता आजाद

विशेष संवाददाता, भूतझोलकिया, भोपाल।

भले ही नब्बे के दशक में एके 47 और एके 56 रायफल जैसे स्वचालित हथियार देश की सेना व पुलिस बेड़े में शामिल हुए हों मगर यह भी सच है दो सौ साल पहले ही अपने देश के क्रांतिकारियों ने ऐसे स्वचालित असलहे बना लिए थे जो तकनीकी तौर पर आज भी उन्नत माने जाते हैं। भीमराव अंबेडकर पुलिस अकादमी में ऐसे कई अनोखे हथियार मौजूद हैं।
1902 में स्थापित पुलिस अकादमी का संग्रहालय खुद में तमाम ऐतिहासिक घटनाओं को समेटे हुए है। यह संग्रहालय ब्रिटिश शासनकाल में वर्ष 1902 के पहले इलाहाबाद के पुलिस ट्रेनिंग सेंटर में था। 1857 की क्रांति में जिन हथियारों को अंग्रेजों ने क्रांतिकारियों के पास से बरामद किया उनमें अनूठे असलहों को इलाहाबाद के संग्रहालय में रखा। वहां से यह मुरादाबाद की पुलिस अकादमी में आ गए।
पुलिस अकादमी के एडीजी एके जैन कहते हैं कि संग्रहालय में 1857 से भी पहले के हथियार हैं। इनमें स्टिक गन, पेंसिल गन, 0.22 की स्वचालित पिस्टल, 0.25 की स्वचालित पिस्टल, बारह बोर और 315 बोर का रिवाल्वर, 303 बोर की अत्याधुनिक रायफल और बंदूकें अनूठी हैं। पिस्टल तो ऐसे हैं कि आप जेब में रखकर चल सकें और किसी को पता भी नहीं चल पाए। संग्रहालय में जो सबसे छोटी पिस्टल रखी है उसकी लंबाई एक उंगली के बराबर है। बारह बोर का रिवाल्वर देखकर तो आप चौंक जाएंगे। आज अपराधियों के पास से ऐसे असलहे बहुत कम ही बरामद होते हैं जिनसे कई गुना अच्छे असलहे दो सौ साल पहले ही यहां बन गए थे। स्टिक गन भी इतनी छोटी है, कि देखकर लगता ही नहीं कि पीतल का यह रूल है या कारतूस उगलने वाला शस्त्र।
एडीजी ने बताया कि खास तौर पर तीन सेंटीमीटर का कारतूस भरने वाली मशीन तो और भी चौंकाने वाली है जो हैंडपंप के आकार में बनी हुई है। एडीजी का मानना है कि अगर अंग्रेजों के पास अत्यधिक संख्या में तोपें नहीं होतीं और फूट डालने की रणनीति में वे कामयाब नहीं होते तो भारतीय सरजमीं पर क्रांतिकारियों द्वारा बिना आधुनिक मशीनों के तैयार गए इन शस्त्रों की बदौलत युद्ध शैली व मोचेबंर्दी से उन्हें और पहले देश से भागने को मजबूर किया जा सकता था।







शुक्रवार, 24 अगस्त 2012

पीडब्लूडी की निगरानी करेगा जीपीएस सॉफ्टवेयर


मुख्य संवाददाता, भोपाल। प्रदेश में लोक निर्माण विभाग में ई-मेजरमेंट व्यवस्था लागू होगी। इसके लिए रियल टाइम जीपीएस आधारित साफ्टवेयर विकसित किया गया है। पायलेट प्रोजेक्ट के रूप में भोपाल डिवीजन क्रमांक दो में यह व्यवस्था लागू होगी। मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान ने इसे पूरे प्रदेश में लागू करने के निर्देश दिए हैं। यह व्यवस्था देश में सबसे पहले मध्यप्रदेश में शुरू की जा रही है। लोक निर्माण विभाग की समीक्षा बैठक में मुख्यमंत्री ने निर्देश दिए कि वर्षा के दौरान खराब हुई सड़कों को ठीक करने का काम तुरंत शुरू किया जाए। बैठक में मुख्य सचिव श्री आर.परशुराम भी मौजूद थे।
श्री चौहान ने बैठक में सड़क निर्माण संबंधी कार्यों की समीक्षा करते हुए कहा कि शहरी क्षेत्रों में जहाँ सड़कों पर जल-जमाव के कारण सड़कें हमेशा क्षतिग्रस्त होती है वहाँ सीमेंट-कांक्रीट की सड़कें बनाए तथा ड्रेनेज की समुचित व्यवस्था करें। उन्होंने निर्माण कार्यों में गुणवत्ता पर विशेष ध्यान देने और कार्य पूर्ण होते ही भुगतान का होना सुनिश्चित करने को कहा। मुख्यमंत्री ने सड़क निर्माण के कार्य समयबद्ध योजना बनाकर पूरे करने को कहा। उन्होंने शासकीय सर्किट हाउस तथा रेस्ट हाउस के मैटेनेंस की पर्याप्त व्यवस्थाओं पर बल दिया। उन्होंने कहा कि सड़के निर्माण के कार्यों में तेजी के साथ गुणवत्ता पर ध्यान देते हुए कार्य करें। मुख्य सचिव परशुराम ने कहा कि सिंहस्थ के मद्देनजर देवास, उज्जैन, बड़नगर और उज्जैन-मक्सी मार्ग को फोर लेन करने की योजना बनायी जाए।
बैठक में बताया गया कि लोक निर्माण विभाग चालू माली साल में कुल 2,950 किलोमीटर लम्बाई की सड़कें बनाएगा तथा 4,474 किलोमीटर सड़कों का नवीनीकरण करेगा। केंद्रीय सड़क निधि के तहत देश में सबसे ज्यादा कार्य मध्यप्रदेश में हुए हैं। केंद्रीय सड़क निधि के कार्य में स्टेट फंड से भी राशि लगायी गई है। संभाग के सभी जिलों को टू लेन सड़कों से जोड़ने के कार्य 48 जिलों में पूरे हो गए हैं तथा 2 जिलों में निमार्णाधीन है। इसी तरह जिले के सभी विकास खण्ड को जिला मुख्यालय से पक्की सड़कों से जोड़ने का कार्य पूरा हो गया है। विभाग में अधिकारी-कर्मचारियों के प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। बैठक प्रमुख सचिव लोक निर्माण विभाग केके सिंह, प्रमुख सचिव वित्त अजयनाथ, मुख्यमंत्री के सचिव हरिरंजनराव सहित विभागीय अधिकारी उपस्थित थे।

टेली मेडिसिन से लैस होंगे प्रदेश के मेडीकल कॉलेज



मुख्य संवाददाता, भोपाल। प्रदेश के मेडिकल कॉलेजों में जल्दी ही टेली-मेडिसिन सुविधा शुरू होगी। पहले चरण में भोपाल, इन्दौर, ग्वालियर और जबलपुर के मेडिकल कॉलेजों में तथा दूसरे चरण में रीवा, सागर के मेडिकल कॉलेजों में यह व्यवस्था शुरू होगी। टेली-मेडिसिन के बाद यह मेडिकल कॉलेज रिर्सोस सेंटर के रूप में काम करेंगे और शासकीय चिकित्सालय इनसे संबद्ध रहेंगे। यह जानकारी मुख्यमंत्री  शिवराज सिंह चौहान द्वारा आज यहाँ की गयी चिकित्सा शिक्षा विभाग की समीक्षा में दी गई। बैठक में चिकित्सा शिक्षा राज्य मंत्री  महेन्द्र हार्डिया और मुख्य सचिव  आर. परशुराम भी उपस्थित थे।
मुख्यमंत्री चौहान ने बैठक में कहा कि मेडिकल कॉलेजों में हृदय रोग, कैंसर रोग जैसी गंभीर बीमारियों के ईलाज की विशेषज्ञ सुविधाएं स्थापित की जायें। मेडिकल कॉलेजों में अलग से विभाग बनाये जायें। इन रोगों के लिए प्रदेश के एक मेडिकल कॉलेज में एम्स की तरह हर बीमारी के इलाज की व्यवस्था की जाये तथा अन्य मेडिकल कॉलेजों में अलग-अलग रोगों की सुपर-स्पेशलिटी सुविधाएं उपलब्ध करवायी जायें जिससे गरीब लोगों को इलाज की बेहतर सुविधाएं मिल सकेगी। उन्होंने निर्देश दिये कि शासकीय अस्पतालों में मरीजों के लिए जेनेरिक दवाइयाँ खरीदी जाय। साथ ही सभी मेडिकल कॉलेजों में आधुनिक मेडिकल सुविधाएँ उपलब्ध करवाने का कार्य समय-सीमा में किया जाए।
बताया गया कि चिकित्सा महाविद्यालयों को नेशनल नॉलेज नेटवर्क से जोड़ा जाएगा। चिकित्सा महाविद्यालयों में बीते छह माह में सहायक प्राध्यापकों सहित 150 पद भरे गए हैं। संचालनालय स्तर पर निर्माण कार्यों की मॉनीटरिंग और समीक्षा के लिए प्रोजेक्ट सेल बनाया जाएगा। मेडिकल कॉलेज से जुड़े अस्पतालों में प्रबंधन के लिए हास्पिटल मैनेजमेंट विशेषज्ञों की मदद ली जाएगी। पोस्ट ग्रेजुएट कोर्स में प्रवेश के लिए आॅनलाईन कांउसलिंग की गयी है। बैठक में चिकित्सा महाविद्यालयों के उन्नयन के लिए की गयी कारार्वाई की जानकारी दी गई। बैठक में प्रमुख सचिव चिकित्सा शिक्षा  अजय तिर्की और प्रमुख सचिव वित्त  अजयनाथ सहित विभागीय अधिकारी मौजूद थे।

पटवारी की पहचान बस्ता नहीं लैपटॉप होगी



भोपाल। प्रदेश में जल्दी ही भू-प्रबंधन मिशन लागू होगा। मिशन की रूपरेखा बनाई जा रही है। इसके बाद भू-अभिलेख के काम में तेजी आएगी। भूमि संबंधी आंकड़ों, भूमि मापन और रिकार्ड में शुद्धता के लिए सभी पटवारियों को लैपटाप दिए जाएंगे। इसमें भूमि संबंधी प्रविष्टियों में गलतियां होने की संभावना कम हो जाएगी। यह जानकारी आज यहाँ मंत्रालय में राजस्व विभाग की समीक्षा में दी गई। मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान ने विभाग की वर्तमान योजनाओं और भविष्य की कार्य योजनाओं की समीक्षा की।
मुख्यमंत्री श्री चौहान ने नई पुनर्वास नीति का प्रारूप शीघ्र प्रस्तुत करने के निर्देश दिए। उन्होंने खसरे और बी-1 दस्तावेज की इलेक्ट्रानिक प्रतियाँ उपलब्ध करवाने के निर्देश देते हुए कहा कि राजस्व सेवा को बेहतर बनाने के लिए राष्ट्रीय भू-अभिलेख प्रबंधन कार्यक्रम में नक्शों के डिजिटाईजेशन के काम में तेजी लाना जरूरी है। बैठक में बताया गया कि तहसीलदार और नायब तहसीलदार के पदों की भर्ती प्रक्रिया जल्दी शुरू होगी। अशासकीय संस्थाओं के लिए भूमि आवंटन की नीति बनाई जा रही है। लोक सेवा प्रदाय व्यवस्था के जरिए राजस्व सेवाओं का बेहतर प्रदाय किया जा रहा है।
बैठक में राजस्व मंत्री श्री करण सिंह वर्मा, मुख्य सचिव आर परशुराम, प्रमुख सचिव राजस्व बीपी सिंह, राजस्व आयुक्त एचएल त्रिवेदी, राजस्व सचिव अजीत केसरी, आयुक्त भू-अभिलेख राजीव रंजन एवं वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित थे।