तोंपे और फूट डालने की नीति न होती तो देश बहुत पहले होता आजाद
विशेष संवाददाता, भूतझोलकिया, भोपाल।भले ही नब्बे के दशक में एके 47 और एके 56 रायफल जैसे स्वचालित हथियार देश की सेना व पुलिस बेड़े में शामिल हुए हों मगर यह भी सच है दो सौ साल पहले ही अपने देश के क्रांतिकारियों ने ऐसे स्वचालित असलहे बना लिए थे जो तकनीकी तौर पर आज भी उन्नत माने जाते हैं। भीमराव अंबेडकर पुलिस अकादमी में ऐसे कई अनोखे हथियार मौजूद हैं।
1902 में स्थापित पुलिस अकादमी का संग्रहालय खुद में तमाम ऐतिहासिक घटनाओं को समेटे हुए है। यह संग्रहालय ब्रिटिश शासनकाल में वर्ष 1902 के पहले इलाहाबाद के पुलिस ट्रेनिंग सेंटर में था। 1857 की क्रांति में जिन हथियारों को अंग्रेजों ने क्रांतिकारियों के पास से बरामद किया उनमें अनूठे असलहों को इलाहाबाद के संग्रहालय में रखा। वहां से यह मुरादाबाद की पुलिस अकादमी में आ गए।
पुलिस अकादमी के एडीजी एके जैन कहते हैं कि संग्रहालय में 1857 से भी पहले के हथियार हैं। इनमें स्टिक गन, पेंसिल गन, 0.22 की स्वचालित पिस्टल, 0.25 की स्वचालित पिस्टल, बारह बोर और 315 बोर का रिवाल्वर, 303 बोर की अत्याधुनिक रायफल और बंदूकें अनूठी हैं। पिस्टल तो ऐसे हैं कि आप जेब में रखकर चल सकें और किसी को पता भी नहीं चल पाए। संग्रहालय में जो सबसे छोटी पिस्टल रखी है उसकी लंबाई एक उंगली के बराबर है। बारह बोर का रिवाल्वर देखकर तो आप चौंक जाएंगे। आज अपराधियों के पास से ऐसे असलहे बहुत कम ही बरामद होते हैं जिनसे कई गुना अच्छे असलहे दो सौ साल पहले ही यहां बन गए थे। स्टिक गन भी इतनी छोटी है, कि देखकर लगता ही नहीं कि पीतल का यह रूल है या कारतूस उगलने वाला शस्त्र।
एडीजी ने बताया कि खास तौर पर तीन सेंटीमीटर का कारतूस भरने वाली मशीन तो और भी चौंकाने वाली है जो हैंडपंप के आकार में बनी हुई है। एडीजी का मानना है कि अगर अंग्रेजों के पास अत्यधिक संख्या में तोपें नहीं होतीं और फूट डालने की रणनीति में वे कामयाब नहीं होते तो भारतीय सरजमीं पर क्रांतिकारियों द्वारा बिना आधुनिक मशीनों के तैयार गए इन शस्त्रों की बदौलत युद्ध शैली व मोचेबंर्दी से उन्हें और पहले देश से भागने को मजबूर किया जा सकता था।


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