चाहते हैं सिर्फ कमाऊ पोस्टिंग
प्रमोद त्रिवेदी की स्टोरी....
भोपाल।जनप्रतिनिधि नेतागिरी करें तो बात समझ आती है, लेकिन वर्तमान में प्रदेश के अफसर नेतागिरी पर उतारू हो गए हैं। ये अफसर बाकायदा सत्तापक्ष के मंत्रियों के साथ लॉबिंग करके अपने हित साधते हैं। सरकार पर नौकरशाही हावी होने के आरोप लगते रहे हैं, लेकिन सत्तापक्ष हमेशा इन आरोपों को नकार देता है। लेकिन पुलिस ट्रेनिंग सेंटरों की समीक्षा बैठक में गृहमंत्री के वक्तव्य से जाहिर हो गया कि सरकार आईएएस से ही नहीं आईपीएस से भी परेशान है। इसमें खास बात ये है कि मलाईदार पदों की लालसा रखने वाले अधिकारी सरकार को झुका लेते हैं। यानि सरकार जानती है कि अधिकारी, कमाई के लिए कुछ पदों पर जाना चाहते हैं। फिर भी सरकार इन अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई तो दूर रोटेशन में तबादले भी नहीं कर पाती। गृहमंत्री ने खुद कहा कि तबादला करो तो ये लोग केंसिल करा लेते हैं। ऐसे में समझा जा सकता है कि प्रदेश सरकार पर नौकरशाही जनता के लिए खुद के भले के लिए पूरी तरह हावी है। यहीं कारण रहा पुलिस ट्रेनिंग सेंटर जैसे पद खाली रह जाते हैं और अन्य पदों के लिए मारा-मारी रहती है। सबसे बड़ा उदाहरण राजधानी में सामने आया। यहां तीन एसपी सिस्टम करने पर डायरेक्ट आईपीएस अफसर ने भोपाल में पदस्थापना लेने से इंकार कर दिया। इसके पहले भी एसएसपी सिस्टम में भी भोपाल पदस्थापना के लिए आईपीएस अधिकारियों के मना करने पर अन्यत्र तबादले की बात सामने आ चुकी है।
दो साल बाद का किसने देखा
गृहमंत्री ने पुलिस अधिकारियों को लालच दिया कि दो साल ट्रेनिंग सेंटर में बिताने पर मनमाफिक पदस्थापना दी जाएगी। लेकिन कई अधिकारियों का कहना है कि दो साल बीतने से पहले चुनाव हो चुकेंगे। ऐसे में दो साल बाद की स्थिति क्या होगी? इस तरह के मौखिक वादे कई बार हुए और नई सरकार और नए मंत्रियों ने उन्हें खारिज कर दिया। ऐसे में मनमाफिक पोस्टिंग के लिए मर्जी से तो दो साल लूप लाइन में रहने का बलिदान नहीं दिया जा सकता। दूसरी बात जब मलाईदारों पदों के लिए अभी भी अधिकारी सरकार को झुका लेते हैं तो बाद में ऐसा नहीं होगा, इसकी क्या गारंटी है। ऐसे में लूप लाइन वाले तो लूप में ही रह जाएंगें।
मेन्यूअल के खिलाफ
एक पुलिस अधिकारी ने बताया कि आईपीएस हो या राज्य सेवा का अधिकारी, कोई भी मनमानी पोस्टिंग के लिए दावा नहीं कर सकता। गृहमंत्री ने भले ही कह दिया हो, लेकिन नियमानुसार ऐसा कोई लिखित रोटेशन नहीं है और न सेवा शर्तों में शामिल है। कई बार अधिकारियों को कोर्ट से बार-बार तबादलों के खिलाफ स्टे लेना पड़ा है। सरकार खुद के बनाए नियमों से कभी भी मुकर जाती है। तबादला पद्धति इसीलिए लागू की गई कि अधिकारी एक ही जगह पर रहकर निजी लाभ के कार्य न कर सके। अधिकारी हो या कर्मचारी, शासन के नियमानुसार किसी विशेष जगह पर पदस्थ रहने के लिए दबाव नहीं बना सकता।
राजधानी में प्रमोटी से चला रहे काम
पुलिस विभाग में आईपीएस का दबाव इस कदर रहता है कि अधिकारी तबादला होने के बाद मनमानी पोस्टिंग न मिलने पर जाने से इंकार कर देते हैं। राजधानी में एसपी पोस्टिंग को लेकर कई बार इस तरह की मनमर्जी सरकार को झेलनी पड़ी है। एसएसपी सिस्टम के समय एक आईपीएस ने भोपाल पोस्टिंग लेने से साफ इंकार कर दिया था। उस आईपीएस का कहना था कि वह एसएसपी के अंडर काम नहीं करेगा। आईपीएस ने मुरैना पोस्टिंग के दौरान मुरैना क्षेत्र के एक कद्दावर सत्तापक्ष के मंत्री से दबाब डलवाकर अपना तबादला मध्यप्रदेश के दूसरे महानगर में करवा लिया था। यही हाल एसएसपी सिस्टम खत्म होने के बाद तीन एसपी सिस्टम में देखने मिला। राज्य सरकार की मर्जी पर कोई भी डायरेक्ट आईपीएस राजधानी में पदस्थ होने को तैयार नहीं हुआ तो सरकार को प्रमोटी आईपीएस को पदस्थ करना पड़ा।
हर अफसर की लॉबिंग
ऐसे कम ही अफसर होंगे जो नेताओं की तरह लॉबिंग न करते हों। कई अफसर तो दावा करते हैं कि उनकी फलां जगह पोस्टिंग होगी और फलां जगह भेजने की किसी में ताकत नहीं हैं। ऐसे कई अफसर हैं जिनके सत्तापक्ष के मंत्रियों से यारी रहती है और पोस्टिंग और तबादले रुकवाने में इन्हीं मंत्रियों की मदद से सरकार पर दबाव डलवाते हैं। कांग्रेस सरकार रहे या भाजपा, इनकी सेहत पर कोई असर नहीं होता। यानि अफसरी करते हुए भी फुल नेतागिरी करने वाले अफसरों की प्रदेश में भरमार है।
इन शाखाओं को समझते हैं लूप लाइन
- -पुलिस ट्रेनिंग सेंटर
- -सीआईडी
- -स्टेट क्राइम रिकार्ड ब्यूरो
- -विशेष शाखा
- -लोकायुक्त
- -ईओडब्लू
- -फायर
- -मुख्यालय में एआईजी
पावर और पैसे की चाहत
अफसरों की लॉबिंग होती है पावर और पैसे के लिए। लूप लाइन समझे जाने वाली शाखाओं में न तो अफसरों को ज्यादा सुविधा होती है और न रुतबा रहता है। ये अलग बात है कि हर शाखा का अपना महत्व है और हर शाखा में काम की कोई कमी नहीं रहती है। सीआईडी के एडीजी एमआर कृष्णा कहते हैं कि भले ही लोग सीआईडी को लूप लाइन कहें, लेकिन इस शाखा का महत्व भी कम नहीं आंका जा सकता। ये अलग बात है कि यहां स्टाफ और संसाधनों की कमी है, लेकिन काम की कोई कमी नहीं है। अफसरों को मन लगाकर काम करना चाहिए तो हर शाखा की उपयोगिता साबित हो सकती है। एक अन्य सीआईडी के वरिष्ठ अफसर कहते हैं कि फील्ड में काम करने वाले अफसरों की जमकर कमाई होती है। उन्हें सुविधाओं भी बहुत मिलती हैं और रुतबा भी रहता है। जिले में रहने वाले एसपी पर दो से तीन वाहन रहते हैं और क्षेत्र में रुतबा भी रहता है। साथ ही सत्तापक्ष से काम पड़ने पर नेता मदद भी करते हैं। वहीं सीआईडी, पुलिस ट्रेनिंग सेंटर जैसी शाखाओं में सुविधाएं बहुत कम हैं। न तो आॅफिस ढंग के हैं और न ही संसाधन। डीआईजी स्तर के अधिकारी के पास भी केवल एक वाहन की सुविधा होती है। सरकारी काम से अन्य जिले में जाने पर जिले के एसपी से वाहन और गार्ड के लिए गुहार लगानी पड़ती है। यहीं कारण है कि फील्ड में और मलाईदार पदों पर रहने वाला अफसर हमेशा इन्हीं पदों पर रहता है और लूप लाइन में पहुंच चुके अफसर की नौकरी ही लूपलाइन में निकल जाती है।


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